Date: 17 December 2018

कब आंखें खोलेंगे कांग्रेस और वामदल

By Sachivalaya :06-03-2018 08:10


पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनावी नतीजों ने देश के सियासी नक्शे को बदलकर रख दिया है। होली के पहले जहां उपचुनाव में कांग्रेस जीत से लाल-गुलाबी हुई, तो होली के बाद भाजपा को अपना केसरिया रंग और फैलाने का मौका मिल गया। त्रिपुरा में बहुमत और नगालैंड में गठबंधन के साथ वह सरकार बनाने जा रही है और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मेघालय में जोड़-तोड़ की उसकी कोशिशें जारी हैं। मेघालय में भाजपा को मात्र 2 सीटें मिली हैं, लेकिन फिर भी वह सरकार बनाने की कोशिश में लगी है, इससे उसकी सत्ता की भूख जाहिर होती है। इससे पहले मणिपुर, गोवा और बिहार में वह यह कारनामा दिखा चुकी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल जारजजर रोकर इसे अनैतिक बताते रहें, लेकिन उनका रोना, रूठना या शिकायत करना ही पर्याप्त नहीं है। भाजपा एक के बाद दूसरे राज्य पर भगवा झंडा लहरा रही है और आप केवल दुहाई-दुहाई करते रहिए।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस दंभी अंदाज में जीत के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित किया, उससे नजर आता है कि उनके मन में एकछत्र शासन की कैसी अदम्य इच्छा है। वे बात भले लोकतंत्र की करें, लेकिन अपने अलावा कोई और पार्टी शायद उन्हें मंजूर नहीं है। इसलिए पहले कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया, अब कह रहे हैं कि लेफ्ट इज नाट राइट। क्या राइट है, क्या रांग, इसका फैसला तो उन्हें जनता के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। लेकिन राजनीति का दौर भी ऐसा चल पड़ा है कि जनता के मन की बात सुनने के लिए दलों के पास समय ही नहीं है। आज कांग्रेस और वामदल जिस दुर्गति का शिकार हुए हैं। यह जनता की नब्ज को न समझ पाने का ही नतीजा है। प.बंगाल में 34 साल की सत्ता के बाद वामदल ऐसी बाहर हुई कि लगातार दो विधानसभा चुनाव हार गई और अब उसका कैडर वहां कमजोर हो गया है। जबकि तृणमूल कांग्रेस के बाद भाजपा वहां तेजी से उभर रही है।

त्रिपुरा में भी 25 साल के शासन को माणिक सरकार नहीं बचा पाए। आखिर वे अकेले क्या कर लेते? माकपा के बड़े नेता राजनीति की जगह केवल विचारधारा की बारीकियों में उलझे रहे और इस बात को समझ ही नहींपाए कि जनता, खासकर युवा किस तरह का बदलाव चाहता है। जबकि भाजपा ने बकौल मोदीजी नो वन से वन की यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न की। इसके पीछे  केवल मोदी का करिश्मा नहीं है, जैसा भाजपा समर्थकों का मानना है, बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत भाजपा राज्यों में अपना दायरा बढ़ा रही है। जहां जैसी जरूरत होती है, वैसी बिसात बिछाकर अपनी बाजी चलती है। जैसे पूर्वोत्तर में उसका जनाधार एकदम सीमित था, तो यहां पहले उसने असम को हथियाने का काम किया। असम में आधार बढ़ाने के लिए नरेंद्र मोदी ने 2016 में बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने का नारा दिया था। उनका यह नारा बीजेपी के पक्ष में गया। दो साल बाद वही फार्मूला भाजपा ने त्रिपुरा में आजमाया और नतीजा भी असम जैसी बंपर जीत के तौर पर देखने को मिला।

 केंद्र सरकार ने 1955 के सिटिजनशिप एक्ट में धर्म के आधार पर संशोधन करने की बात कही ताकि बांग्लादेश से आने वाले हिंदू जो अवैध घुसपैठिये कहलाते थे, उन्हें भारत की नागरिकता मिल सके। भाजपा का यह प्रयास बहुसंख्यक समुदाय को लुभाने वाला था, जिसकी काट लेफ्ट की सरकार नहीं तलाश सकी। इसके बाद बारी आई यहां के मूल निवासी आदिवासी समुदाय की, जो अब अल्पसंख्यक बन गए हैं। भाजपा यह जानती थी कि त्रिपुरा में आदिवासियों के लिए आरक्षित 20 सीटों पर कब्जा जमाए बगैर लेफ्ट को यहां से उखाड़ना मुश्किल होगा। ऐसे में उसने पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ गठबंधन किया, जो अलग आदिवासी राज्य की मांग करता रहा है। इस तरह बंगाली हिंदुओं समेत आदिवासियों को साथ जोड़ने का काम भाजपा ने किया। नगालैंड और मेघालय में ईसाइयों की बहुलता है और यहां की राजनीति पर चर्च का प्रभाव है। इस पर भाजपा ने अपनी रणनीति बदली। गौमांस का मुद्दा, जिस पर देश में हत्याएं हो चुकी हैं, वह यहां किनारे कर दिया गया।

 
भाजपा के स्थानीय नेताओं ने नगालैंड में यहां तक कहा कि वे भी इसाई हैं और सांस्कृतिक अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। भाजपा अब प्रचारित कर रही है कि वह हिंदुत्व की राजनीति नहीं करती है और सभी धर्मों के लोग उसे स्वीकार रहे हैं। लेकिन भाजपा और संघ ने पूर्वोत्तर में हिंदू राष्ट्रवाद के अपने अजेंडे को वहां की छोटी पार्टियों की मदद से आगे बढ़ाने की रणनीति तैयार की है ताकि चर्च ग्रुप्स की काट निकाली जा सके। संघ के नेता, कार्यकर्ता लंबे अरसे से पूर्वोत्तर में अपना प्रभाव बढ़ाने के मिशन में जुटे हुए थे, जिसमें वे सफल दिख रहे हैं।

वाम नेताओं को भी इस की जानकारी होगी, लेकिन बावजूद इसके वे अपना जनाधार बचाने में नहीं जुटे। यही हाल कांग्रेस का भी रहा। बार-बार ऐसा लगता है कि राहुल गांधी आधे-अधूरे मन से राजनीति करते हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में हिमाचल की सत्ता आसानी से भाजपा के हवाले कर दी। इस बार त्रिपुरा में उसका बुरा हाल हुआ ही, मेघालय में भी सरकार बचाने की चुनौती उसके सामने है। इस कठिन समय में राहुल गांधी देश से बाहर चले गए और अपने दूतों को मेघालय भेज दिया। क्या अब राजनीति इतनी आसान रह गई है कि कोई सत्ता थाली में परोस कर आपको देगा? कांग्रेस हो या वामदल, केवल भाजपा की आलोचना कर वे अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते है।

उन्हें  जनता के सामने अपना मिशन, अपना एजेंडा भी पेश करना होगा। देश में अब भी एक वर्ग ऐसा है जो भाजपा का अंधभक्त नहीं है, जो लोकतंत्र की विविधता में विश्वास रखता है, लेकिन इस वर्ग को नेतृत्व का भरोसा दिलाने वाले नेता ही नहींरहेंगे, तो लोकतंत्र में तानाशाही के खतरे को कौन रोकेगा?
 

Source:Agency

 

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