Date: 21 March 2019

नागरिकता संशोधन विधेयक या धार्मिक कार्ड

By Sachivalaya :11-01-2019 07:51


नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के जरिए मोदी सरकार भले ही पड़ोसी देशों में सताए हुए अल्पसंख्यकों की रहनुमा बनने का प्रयास कर रही है, लेकिन यह बात साफ नजर आ रही है कि यह विधेयक उसके लिए चुनाव में काम आने वाला धार्मिक कार्ड है। आपको बता दें कि नागरिकता संशोधन बिल जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अ$फगानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। दूसरे शब्दों में कहें तो गैरमुस्लिम धर्मावलंबियों को भारतीय नागरिकता देने का रास्ता इस विधेयक के जरिए खुलता है। शर्त यह है कि वे भारत में शरणार्थी हों, यानी अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान में धर्म के आधार पर सताए गए हों और अपने देश को छोड़नेे पर मजबूर किए गए हों।

पहली नजर में देखें तो नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिए मोदी सरकार खुद को विशाल, उदार दिल वाली दिखाना चाहती है, जिसके मन में पड़ोसी देशों के पीड़ितों के लिए इतनी दया है कि वह उन्हें न केवल अपने देश में पनाह देने बल्कि उन्हें भारतीय नागरिक बनाने भी तैयार है, फिर चाहे इसके लिए उसे नागरिकता देने के नियमों में संशोधन क्यों न करना पड़े। पहले शरणार्थी 12 साल तक भारत में रह जाएं, तो फिर वैध दस्तावेज के आधार पर उन्हें नागरिकता देने का प्रावधान था, अब इस अवधि को घटाकर 6 साल कर दिया गया है।

लेकिन मोदी सरकार की यह दरियादिली केवल मुस्लिम बहुल देशों यानी अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के लिए ही है, श्रीलंका या नेपाल इसमें नहीं हंै। और म्यांमार से जान बचाकर आए रोहिंग्या मुसलमान तो भाजपा को हमेशा ही खटकते हैं। साफ नजर आ रहा है कि भाजपा धार्मिक कार्ड खेल रही है, लेकिन फिर भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह संसद में कहते हैं कि इस विधेयक को लेकर भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं. इसके पीछे की सोच यह है कि उत्पीड़न के शिकार पलायनकर्ता देश में कहीं भी हों, नागरिकता के लिए आवेदन कर सकें और किसी भी राज्य में नागरिक बनकर रह सकें। इस बारे में जिम्मेदारी केवल असम, या पूर्वोत्तर की नहीं होगी, बल्कि पूरे देश की होगी। गृहमंत्री की बात को मान लें तो भी यह सवाल तो उठता ही है कि क्यों प्रधानमंत्री ने केवल असम में इस बारे में चर्चा की। हाल ही में वे असम के सिलचर गए थे और वहां उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक को लोगों की भावनाओं और जिंदगियों से जुड़ा बताया था। क्या मोदीजी यह नहीं जानते हैं कि असम के मूल निवासियों और बांग्लादेश से आए लोगों के बीच किस तरह का टकराव है। 

असम में एनडीए की सहयोगी रही असमगण परिषद ने भी इस मुद्दे पर अपना विरोध जताते हुए एनडीए से अलग होने की घोषणा कर दी। वहां के छात्र संगठन, राजनैतिक दल और भाजपा के भी कुछ लोग इस मसले पर मोदी सरकार से इत्तेफाक नहीं रखते हैं और लगातार विरोध कर रहे हैं। लेकिन सरकार आने वाले चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण का फायदा देख रही है। सरकार इस बात को भी नजरअंदाज कर रही है कि यह विधेयक 1985 के असम समझौते को अमान्य करेगा। जिसके तहत 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने की बात कही गई थी, भले ही उसका धर्म कोई हो। और सबसे बड़ी बात यह विधेयक संविधान की भावना के विपरीत है, क्योंकि इसमें धार्मिक आधार पर नागरिकता देने की बात कही जा रही है। जबकि धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के आर्टिकल 14 की मूल भावना के खिलाफ है जो बराबरी के अधिकार की व्याख्या करता है।

भाजपा इस विधेयक को पारित करवाने में सियासी लाभ देख रही है, लेकिन असम के लोगों में यह भावना पनप रही है कि इससे असमिया संस्कृति, अस्मिता, भाषा खत्म हो जाएगी। 2014 में प.बंगाल में मोदीजी ने एक चुनावी रैली में बांग्लादेशी घुसपैठियों से बोरिया-बिस्तर बांधने को कहा था, इसका लाभ उन्हें प.बंगाल में तो खास नहीं मिला लेकिन उसके बाद हुए असम विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिल गया। भाजपा का विश्वास धार्मिक कार्ड की उपयोगिता पर और बढ़ गया। लेकिन जिस असम ने भाजपा को विधानसभा चुनाव में हाथोंहाथ लिया वहीं अब नागरिकता संशोधन विधेयक पर मोदीजी का विरोध हो रहा है। कहीं इस बार भाजपा को लेने के देने न पड़ जाएं।  
 

Source:Agency

 

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