Date: 21 March 2019

भूपेश सरकार से संस्कृति कर्मियों को उम्मीदें

By Sachivalaya :11-02-2019 08:28


अब जब भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस की नयी सरकार प्रदेश में आसीन है तो प्रदेश के सारे साहित्यकार, कलाकार, लोक कलाकार, बुद्धिजीवी, सहृदय जो इन अठारह वर्षोंे में संस्कृति विभाग का 'खूब तमाशा' देख चुके हैं, उन्हें यह उम्मीद है कि यह नयी सरकार पुरातत्व विभाग से संस्कृति विभाग को न केवल पृथक करेगी वरन देश के अन्य प्रदेशों की तरह छत्तीसगढ़ राज्य में भी साहित्य परिषद्, लोक कला परिषद्, फिल्म विकास निगम की स्थापना की घोषणा कर प्रदेश में साहित्य संस्कृति तथा कला के क्षेत्र में कुछ बेहतर करने की दिशा में पहल करेगी।

छत्तीसगढ़ राज्य के उदय से लेकर अब तक के अठारह वर्षों पर नजर डालें तो कांग्रेस के मुख्यमंत्री अजीत जोगी के प्रारम्भिक तीन वर्ष और बाद में भाजपा मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के पंद्रह वर्ष प्रदेश के साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में विराट शून्य का काल रहा है। इन अठारह वर्षों में न तो राज्य में साहित्य परिषद, कला परिषद तथा लोक कला परिषद की स्थापना हुई और न ही इन क्षेत्रों में किसी यादगार या विशिष्ट कार्यक्रमों का आयोजन ही। विडम्बना यह है कि इन अठारह वर्षों में साहित्य, संस्कृति और कला भी महंत घासीदास संग्रहालय में केवल पुरातत्व की वस्तु बनकर ही रह गये।

साहित्य एवं संस्कृति के नाम पर इन अठारह वर्षों में जो कुछ भी संस्कृति विभाग द्वारा परोसा गया उसे याद कर हम केवल ग्लानि से भर सकते हैं। इन अठारह में वर्षों में संस्कृति विभाग न तो छत्तीसगढ़ की अक्षुण्ण एवं समृद्ध लोक संस्कृति नाचा, भरथरी, चंदैनी, लोरिक चंदा, रतनपुरिया गम्मत, भतरा नाट को संरक्षित कर पाया और न ही कथक के सुप्रसिद्ध रायगढ़ घराना तथा कार्तिक राम जी के अवदान को ही सहेज कर रख पाया। हां, इस बीच एक अपठनीय और स्तरहीन पत्रिका 'बिहनिया' का प्रकाशन वहां से अवश्य होता रहा है।

आप इन अठारह वर्षों को और विशेषकर पंद्रह वर्षों को याद कीजिये कि कत्थक और ओडिसी नृत्य के नाम पर संस्कृति विभाग किस तरह प्रदेश के आला अधिकारियों की धर्मपत्नियों को खुश करने में और उनकी चाटुकारिता करने में लगा रहा है। प्रदेश के कला प्रेमी दर्शक इन पत्नियों के अलावा न तो देश की किसी अन्य सुप्रसिद्ध ओडिसी और कथक नृत्यांगनाओं के नृत्य देख पाये और न ही शास्त्रीय नृत्य में मोहिनी अट्टम और भरत नाट्यम जैसे और भी नृत्य की सुदंर शाखाएं हैं, इसे समझ पाये।

नाटक के क्षेत्र में विशेषकर भारतीय रंगमंच में हबीब तनवीर, पं.सत्यदेव दुबे तथा शंकर शेष जैसी प्रतिभाएं छत्तीसगढ़ की ही देन हैं। संस्कृति विभाग इन नाट्य विभूतियों के समग्र अवदान को रेखांकित किये जाने की दिशा में न तो इन वर्षों में कोई कार्यक्रम कर पाया और न ही उन्हें स्मरण करना ही कभी आवश्यक समझा।

साहित्य में ठा. जगमोहन सिंह, माधव राव सप्रे, बाबू रेवा राम, लोचन प्रसाद पांडे, मुकुटधर पांडे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा तथा शानी जैसी विभूतियों पर संस्कृति विभाग ने इन अठारह वर्षों में क्या किया है, यह हम सब जानते हैं। हर वर्ष राज्य स्थापना दिवस पर जो चौबीस राजकीय सम्मान रेवड़ियों की तरह ही बांटे जाते रहे हैं तथा इन पुरस्कारों के लिए जिस तरह की समितियां बनाई जाती हैं, वह भी संस्कृति विभाग का एक काला अध्याय है। चौबीस पुरस्कारों के नाम पर अड़तालीस लाख रुपये की जिस तरह से बंदरबांट होती रही है उसे अब तत्काल समाप्त किए जाने की आवश्यकता है।

अब जरा पद्म पुरस्कारों पर नजर डालें तो प्रदेश के इन अठारह वर्षों में साहित्य में विनोद कुमार शुक्ल को इसके उपयुक्त नहीं पाया गया बल्कि एक मंचीय और हंसोड़ कवि को इसके लिए उपयुक्त पाया गया मूर्ति कला के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध घड़वा कलाकार उपेक्षित रह जाता है और एक दूसरा जुगाड़ लगाकर बाजी मार ले जाता है। छत्तीसगढ़ी फिल्म में मनु नायक जैसे महान निदेशक को छोड़कर पद्म श्री किसे प्रदान किया गया यह सब जानते हैं।

भरथरी की अप्रतिम गायिका सुरूज बाई खांडे की जगह छत्तीसगढ़ी फिल्मों की गायिका की झोली में यह सम्मान चला जाता है। किरमानी घराने के विश्वप्रसिद्ध सितार वादक बुधादित्य मुखर्जी इस बीच अपनी उपेक्षा और अपमान से दुखी होकर छत्तीसगढ़ छोड़कर जाने में ही अपना भला समझते हैं।

अब जब भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस की नयी सरकार प्रदेश में आसीन है तो प्रदेश के सारे साहित्यकार, कलाकार, लोक कलाकार, बुद्धिजीवी, सहृदय जो इन अठारह वर्षोंे में संस्कृति विभाग का 'खूब तमाशाÓ देख चुके हैं, उन्हें यह उम्मीद है कि यह नयी सरकार पुरातत्व विभाग से संस्कृति विभाग को न केवल पृथक करेगी वरन देश के अन्य प्रदेशों की तरह छत्तीसगढ़ राज्य में भी साहित्य परिषद्, लोक कला परिषद्, फिल्म विकास निगम की स्थापना की घोषणा कर प्रदेश में साहित्य संस्कृति तथा कला के क्षेत्र में कुछ बेहतर करने की दिशा में पहल करेगी।

इस सरकार से यह उम्मीद भी की जानी चाहिए कि राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर प्रदान किए जाने वाले चौबीस सम्मानों को तत्काल समाप्त किये जाने की दिशा में भी यथेष्ट निर्णय लेगी जिसके फलस्वरूप हर वर्ष अड़तालीस लाख रुपए की बंदरबांट पर भी विराम लग सकेगा।
सम्पूर्ण देश की निगाह छत्तीसगढ़ की इस नयी सरकार और इसके मुखिया भूपेश बघेल पर लगी हुई है कि यह सरकार प्रदेश में साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में नया और बेहतर क्या करने जा रही है। प्रदेश में किसानों का कर्ज माफ  करने और किसानों के धान को पच्चीस सौ प्रति क्ंिवटल की दर से खरीदने की पहल कर वैसे ही भूपेश बघेल की सरकार ने सम्पूर्ण देश में एक जनतांत्रिक सरकार होने का परिचय तो दे ही दिया है। इसलिए भूपेश बघेल और इसकी सरकार से साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में कुछ बेहतर करने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। 
किसी भी राष्ट्र या राज्य का सर्वांगीण विकास साहित्य और संस्कृति की उपेक्षा संभव नहीं है। राज्य एवं राज्य के नागरिकों को गढ़ने और संवारने में साहित्य और संस्कृति की भूमिका हमेशा अक्षुण्ण होती है।    
 

Source:Agency

 

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