Date: 21 March 2019

अयोध्या विवाद में मध्यस्थता की राह

By Sachivalaya :11-03-2019 08:46


क्या मध्यस्थता के रास्ते यह उद्देश्य हासिल किया जा सकेगा? जवाब में कुछ लोग सवाल करते हैं कि क्या आस्था व विश्वास के नाम पर भड़काये गये सारे विवादों में इस प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है? भारत जैसे देश में, जिसमें अनगिनत आस्थाएं और विश्वास विद्यमान है, ऐसी प्रक्रियाएं कठिनाइयों को दूर करने में सहायक होंगी या आस्थाओं व विश्वासों को महत्व देने की प्रवृत्ति से राजनीति के साम्प्रदायीकरण का ही विस्तार होगा? क्या कुछ लोग इसे अपनी आस्थाओं की विजय मानकर इसका अनुचित लाभ उठाकर पूरी राजनीति में ही साम्प्रदायिकता को निर्णायक बनाने का प्रयत्न नहीं करेंगे? ऐसा हुआ तो संविधान में दिये गये सारे उद्देश्य ही निरर्थक हो जायेंगे। यदि यह पंचनिर्णय नहीं बल्कि मध्यस्थता माना जाय तब तो अन्त में निर्णय न्यायालय को ही करना होगा।

अयोध्या विवाद की सुनवाई कर रही सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने विवाद के 'स्थायी समाधान' के लिए अपनी निगरानी में ऑन कैमरा लेकिन गोपनीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाने का फैसला किया है। इसके लिए उसने सेवानिवृत्त जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता में मध्यस्थों का जो तीन सदस्यीय पैनल बनाया है, उसके अन्य दो सदस्य 'आर्ट आफ लिविंग' के श्री श्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचु हैं। ज्ञातव्य है कि इससे पहले विवाद की सुनवाई के लिए न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ बनी थी, जिसे बाद में संविधान पीठ का दर्जा देने के लिए बढ़ाकर पांच सदस्यीय कर दिया गया। अब उसकी निगरानी में मध्यस्थता को सुनवाई न कहें तो भी इस सम्बन्धी सारा विचार-विमर्श अयोध्या में ही होना है, जिसकी सारी व्यवस्था राज्य को करनी होगी।

इसे लेकर लोगों के दिमाग में अभी से सवाल उठ रहा है कि क्या इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय भी पक्षकारों के न्याय पाने के अधिकार की पूर्ति में असफल हो रहा है और इसीलिए उसे मध्यस्थता का सहारा लेना पड़ रहा है? यह सवाल इसलिए भी उत्तर की मांग करता है कि पीठ केे एक न्यायाधीश ने न्यायालय में सार्वजनिक रूप से कहा कि यह महज जमीन के एक टुकड़े का विवाद नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और भावनाओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे अलग ढंग से देखकर निर्णय का रास्ता निकाला जा रहा है। यह ऐसा मामला है जो आरम्भ से लेकर अब तक विभिन्न बिडम्बनाओं से ग्रस्त रहा है। 

सच्चाई यह है कि यह विवाद 22-23 दिसम्बर, 1949 की रात के घटनाक्रमों की बाबत अयोध्या के एक पुलिस की उस रिपोर्ट से अस्तित्व में आया, जिसमें इंस्पेक्टर का कहना था कि कुछ लोगों ने अनुचित रूप से घुसकर मस्जिद में मूर्ति रख दी। इसके बाद सम्बन्धित मस्जिद को धारा-145 के तहत कुर्क करके धारा-146 में स्वामित्व विवाद के निपटारे के लिए दीवानी न्यायालय को सौंप दिया गया था। मूर्ति रखने वालों पर मुकदमा चला तो उन्हें इसलिए मुक्त कर दिया गया कि उन्होंने मंदिर समझकर मूर्ति रखी थी। 

1983 के बाद इस विवाद में राजनीतिक दलों और विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों का समावेश हुआ तो उन्होंने इसे आन्दोलन का रूप दिया और भीड़ भी जुटानी शुरू की। तब न्यायालय ने इसे निपटाने के लिए अपने बन्द दरवाजे खोले और विवाद से चिंतित सरकार बिना फैसले के इस परद्वारा शिलान्यास की अनुमति भी दी गयी। यहां बताना जरूरी है कि 1987 में अयोध्या फैजाबाद के वरिष्ठ मुस्लिमों ने इस विवाद के खात्मे के लिए विवादित मस्जिद या कि ढांचे को 11-11 फीट ऊंची दीवारों से घेर देने तथा उस स्थान से मन्दिर निर्माण आरम्भ करने को लेकर अपनी सहमति दी थी, जिसमें कहा गया था निर्मोही अखाड़ा 1885 में जहां स्थित चबूतरे पर छत डालने का मुकदमा हार चुका था वहां से आरम्भ हो। इन मुस्लिमों का कहना था कि यह आन्दोलन वास्तव में उनके समुदाय को मुख्य धारा से काटने के लिए है, इसलिए जितनी जल्दी इसका पटाक्षेप हो और मंदिर बन जाये, उनके लिए उतना ही अच्छा होगा। बाद में ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्योंकि दूसरा पक्ष विवाद के राजनीतिक इस्तेमाल पर आमादा था। तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक ने इसे राजनीति का ऐसा साधन माना था, जो मंदिर की उपयोगिता और आवश्यकता से अलग था। इस समझौते के मुख्यकर्ता योगी अवैद्यनाथ तथा जस्टिस देवकी नन्दन अग्रवाल, नृत्यगोपाल दास, रामचन्द्रदास परमहंस सहित 13 विहिप के लोग थे।

छ: दिसम्बर, 1992 को पी.वी. नरसिंहराव के प्रधानमंत्रित्वकाल में विवाद बाबरी मस्जिद के विध्वंस तक जा पहुंचा तो वे उसके समाधान के लिए अयोध्या विशिष्ट क्षेत्र अधिग्रहण अध्यादेश लाये, जो बाद में संसद द्वारा पारित कानून बन गया। इसके तहत अधिग्रहीत भूमि पर अयोध्या  राममंदिर, मस्जिद, पुस्तकालय, वाचनालय व संग्रहालय के साथ सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण होना था। बाद में मुसलमानों का यह दावा सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने नहीं माना कि मस्जिद का अधिग्रहण नहीं हो सकता। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बावजूद उसे लेकर विवाद इसलिए समाप्त नहीं हो पाया क्योंकि अधिग्रहण कानून में राज्य द्वारा की गई सम्बन्धित मुकदमे की समाप्ति को असंवैधानिक माना गया। कारण यह कि उसमें प्रभावितों के न्याय पाने की किसी वैकल्पिक व्यवस्था का पूर्णत: अभाव था। इसके चलते यह विवाद फिर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यों की पीठ के हवाले हो गया, जो पहले भी इस पर विचार कर रही थी। उसने इसे रामलला विराजमान, सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा के पक्ष में तीन बराबर बराबर भागों में बांटने के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ 14 अपीलें सर्वोच्च न्यायालय में दायर और विचाराधीन हैं।

 सर्वोच्च न्यायालय पहले भी इच्छा व्यक्त कर चुका था कि विवाद का आपसी सहमति से निपटारा हो जाए। ऐसा संभव नहीं हुआ तो सुनवाई कर रही न्यायालय की पीठ ने इसे जमीन और कब्जे का मामला मानकर सुनवाई आरम्भ की। लेकिन अब उसे विवाद को मध्यस्थता के रास्ते सुलझाने की नयी तजवीज सूझी है, जिस पर उसने यह कहकर अमल शुरू किया है कि एक प्रतिशत भी उम्मीद हो तो इस रास्ते पर चला जाना चाहिए। क्योंकि इसके लिए सभी पक्षों द्वारा सहमति और नियुक्ति आवश्यक नहीं मानी जाती। मध्यस्थता के निर्णय पर असहमति हो, तब भी वह लागू होगा और उसके खिलाफ  कोई अपील भी नहीं की जा सकेगी। 

लेकिन इस सिलसिले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि विवाद के साम्प्रदायिक स्वरूप धारण कर लेने और आस्था व विश्वास से जोड़ दिये जाने के बाद भी न्यायालय इसका निर्णय करने के बजाय आस्था विश्वास ही प्रमुख तत्व है तो इनकी संख्या अनगिनत है किस धारा को स्वीकार्य या अस्वीकार्य माना जाय? मध्यस्थ को सौंपना उचित समझे, तो क्या इसे न्यायिक प्रक्रिया की जीत माना जायेगा? न्यायालय भी इस प्रकार असमर्थता व्यक्त करने लगे तो फिर नागरिकों या कि पक्षकारों के न्याय पाने के अधिकार की पूर्ति कैसे सम्भव हो पायेगी? 

प्रसंगवश, इस विवाद का निपटारा जहां कुछ लोग अपने विश्वासों के अनुसार चाहते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष के सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के कई नेताओं ने पहले ही यह घोषणा कर दी है कि फैसला हमारे पक्ष में हो जाये तो भी हम भविष्य में वहां मस्जिद बनाने नहीं जा रहे। लेकिन उन्हीं के समुदाय में कुछ लोग इसे पराजय की मनोवृत्ति की संज्ञा देते हैं। कई लोगों को सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस कलीफुल्ला को मध्यस्थता पैनल का अध्यक्ष बनाये जाने के पीछे यह 'दूरंदेशीÓ भी दिख रही है कि फैसला करने वाला उसी विश्वास का हो, जिसके वह विपरीत है, तो विपरीत होने के बावजूद वह न्यायपूर्ण भी दिखेगा और असंतोष को भी कम करेगा। फिलहाल, देश की जनता आम तौर पर यही चाहती है कि जिस विवाद को राजनीतिक मुद्दा बनाकर कुछ लोग लाभ उठाने में लगे हैं, उसे समाप्त होना ही चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश को भविष्य में राजनीतिक लाभ उठाने के ऐसे विवादों व प्रवृत्तियों से मुक्ति मिल सके। 

क्या मध्यस्थता के रास्ते यह उद्देश्य हासिल किया जा सकेगा? जवाब में कुछ लोग सवाल करते हैं कि क्या आस्था व विश्वास के नाम पर भड़काये गये सारे विवादों में इस प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है? भारत जैसे देश में, जिसमें अनगिनत आस्थाएं और विश्वास विद्यमान है, ऐसी प्रक्रियाएं कठिनाइयों को दूर करने में सहायक होंगी या आस्थाओं व विश्वासों को महत्व देने की प्रवृत्ति से राजनीति के साम्प्रदायीकरण का ही विस्तार होगा? क्या कुछ लोग इसे अपनी आस्थाओं की विजय मानकर इसका अनुचित लाभ उठाकर पूरी राजनीति में ही साम्प्रदायिकता को निर्णायक बनाने का प्रयत्न नहीं करेंगे? ऐसा हुआ तो संविधान में दिये गये सारे उद्देश्य ही निरर्थक हो जायेंगे। यदि यह पंचनिर्णय नहीं बल्कि मध्यस्थता माना जाय तब तो अन्त में निर्णय न्यायालय को ही करना होगा।

Source:Agency

 

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