बिना मान्यता LLB में कराया दाखिला, फीस भी नहीं लौटाई:उपभोक्ता आयोग का IES यूनिवर्सिटी को आदेश, लौटाने होंगे 55 हजार रुपए

Updated on 10-09-2025 03:08 PM

राजगढ़ जिले के ब्यावरा तहसील के गांव गुजरीबे निवासी जितेंद्र सौंधिया ने भोपाल की आईईएस यूनिवर्सिटी में तीन वर्षीय एलएलबी (LLB) कोर्स में दाखिला लिया। लेकिन जल्द ही यह सपना टूट गया। वजह यह कि जिस कोर्स में उनका एडमिशन हुआ था, उसकी यूनिवर्सिटी को मान्यता ही नहीं थी। आयोग की बेंच के अध्यक्ष योगेश दत्त शुक्ल और सदस्या डॉ. प्रतिभा पांडेय ने अब आईईएस यूनिवर्सिटी के खिलाफ एकपक्षीय फैसला सुनाया है।

जितेंद्र सौंधिया ने 31 मार्च 2023 को यूनिवर्सिटी में एलएलबी कोर्स का रजिस्ट्रेशन कराया और 55,000 रुपए शुल्क भी जमा किया। दाखिले के दौरान उन्होंने अपने मूल दस्तावेज अंकसूचियां, जाति प्रमाण पत्र, चरित्र प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र आदि भी यूनिवर्सिटी को सौंप दिए। भरोसा दिलाया गया कि एडमिशन कन्फर्म है, कक्षाएं जल्द शुरू होंगी।

लंबे इंतजार के बाद भी कक्षाएं शुरू नहीं हुईं। उन्होंने कई बार मौखिक और टेलीफोन से विश्वविद्यालय प्रबंधन से बात की, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। अंततः जब उन्होंने यूनिवर्सिटी की वेबसाइट देखी तो साफ हो गया कि आईईएस यूनिवर्सिटी को एलएलबी कोर्स संचालित करने की मान्यता ही नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम के कारण जितेंद्र सौंधिया का एक शैक्षणिक वर्ष बर्बाद हो गया। आयोग ने माना कि इससे उन्हें मानसिक और आर्थिक दोनों तरह का नुकसान उठाना पड़ा है।

आयोग में पहुंचा मामला विश्वविद्यालय से फीस और दस्तावेज मांगने पर भी जब उन्हें कोई जवाब नहीं मिला तो जितेंद्र ने 3 मार्च 2025 को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग भोपाल क्रमांक-1 में परिवाद दायर किया। नोटिस तामील होने के बावजूद विश्वविद्यालय आयोग में पेश नहीं हुआ। ऐसे में आयोग ने मामले की एकपक्षीय सुनवाई की। 1 सितंबर 2025 को आयोग ने फैसला सुनाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय ने बिना मान्यता के एडमिशन लेकर छात्र के साथ धोखाधड़ी की है। यह न केवल अनुचित व्यापार प्रथा है बल्कि स्पष्ट रूप से सेवा में कमी भी है।

आदेश में क्या कहा गया

  • विश्वविद्यालय छात्र को जमा की गई 55,000 रुपए फीस 9% वार्षिक ब्याज सहित लौटाए।
  • 10,000 रुपए क्षतिपूर्ति मानसिक कष्ट और सेवा में कमी के लिए अदा करे।
  • 3,000 रुपए मुकदमेबाजी खर्च के रूप में अलग से दे।
  • यदि आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो माह के भीतर राशि नहीं लौटाई जाती तो ब्याज की गणना परिवाद दायर करने की तारीख (3 मार्च 2025) से होगी।


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