बांग्लादेश में कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी से बैन हटा:हसीना सरकार का फैसला पलटा

Updated on 29-08-2024 05:00 PM

बांग्लादेश में अंतरिम सरकार ने बुधवार को जमात-ए-इस्लामी पार्टी पर लगा बैन हटा दिया। जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी है। हसीना सरकार ने 1 अगस्त को इस पर बैन लगाया था। इस पर छात्र आंदोलन के दौरान दंगे भड़काने का आरोप लगा था।

बांग्लादेश के गृह मंत्रालय ने एक नोटिस जारी कर कहा कि जमात-ए-इस्लामी पार्टी और उसके सहयोगियों के आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के कोई सबूत नहीं है। इसलिए उन पर लगा बैन हटाया जा रहा है।

जमात-ए-इस्लामी पार्टी के चुनाव लड़ने पर 2013 से रोक है
हाईकोर्ट ने 2013 में जमात-ए-इस्लामी पार्टी के घोषणा पत्र को संविधान का उल्लंघन करने वाला बताया था। इसके बाद पार्टी के चुनाव लड़ने पर बैन लगा दिया गया था। 2018 में चुनाव आयोग ने जमात का रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया था।

इस पर लगा बैन भले ही अंतरिम सरकार ने हटा दिया है, मगर उसके चुनाव लड़ने पर बैन अभी भी लागू है। जमात-ए-इस्लामी पार्टी के नेताओं ने सोमवार को इंडियन मीडिया कॉरेसपोंडेंट्स एसोसिएशन बांग्लादेश के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की। इस दौरान पार्टी के वकील शिशिर मोनिर ने कहा कि पार्टी अगले हफ्तें चुनाव लड़ने का बैन हटवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेगी।

मीटिंग में पार्टी के नेता डॉ शफिकुर रहमान ने भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर भी जोर दिया। शफिकुर ने कहा,“जमात के भारत के साथ पुराने संबंध रहे हैं। हम भारत के साथ रिश्तों को और बेहतर बनाना चाहते हैं। हमें उम्मीद हैं भारत भी ऐसा ही चाहेगा।”

भारत के बंटवारे का विरोध करती थी पार्टी, फिर पाकिस्तान समर्थक बनी
जमात-ए-इस्लामी पार्टी की स्थापना 1941 में ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। भारत की आजादी के आंदोलन के दौरान पार्टी बंटवारे का विरोध करती थी। पार्टी का मानना था कि बंटवारे से मुस्लिम एकता को खतरा होगा। इससे देश के मुस्लिम अलग हो जाएंगे। पार्टी इस पर जिन्ना की मुस्लिम लीग के विचारों को विरोध करती थी।

हालांकि आजादी के बाद पार्टी नेताओं ने मुस्लीम लीग का समर्थन किया। पार्टी का रुख हमेशा से पाकिस्तान समर्थक रहा है। यह शरिया कानून को लागू करवाने की मांग भी करती रही हैं।

पार्टी ने 1971 में अलग बांग्लादेश बनने का विरोध किया था। इसने बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन के खिलाफ अभियान भी चलाए थे। जमात के लीडर्स पर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने और अल्पसंख्यकों पर हमले के आरोप लगते रहे हैं।

शेख हसीना पर अब तक 75 केस हुए
बांग्लादेश में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना पर अब तक 75 केस दर्ज हो चुके हैं। बांग्ला अखबार द डेली स्टार के मुताबिक, हसीना पर मंगलवार को ढाका कोर्ट में 3 नए केस दर्ज हुए। इससे पहले, उन पर बोगुरा में हत्या का एक केस दर्ज हुआ था।

हसीना पर 63 हत्या के, 7 नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध के, 3 किडनैपिंग के और 2 अन्य मामले दर्ज हैं। उन पर छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के लिए, इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल बांग्लादेश में भी जांच जारी है।

शेख हसीना ने 2010 में इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (ICT) की स्थापना की थी। इस ट्रिब्यूनल की स्थापना 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की जांच के लिए की गई थी।

अंतरिम सरकार ने कट्टरपंथी संगठन के लीडर को किया रिहा
इससे पहले मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने सोमवार (26 अगस्त) को कट्टरपंथी संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) के प्रमुख जशीमुद्दीन रहमानी को पैरोल पर रिहा कर दिया था।

इस गुट के संबंध आतंकी संगठन अलक़ायदा से भी जुड़ते हैं। शेख हसीना सरकार ने 2015 में अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) पर बैन लगा दिया था। इस संगठन पर भारत में भी आतंकवाद फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। भारत में संगठन के कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है।

जशीमुद्दीन को एक ब्लॉगर की हत्या के लिए उकसाने का मामले में 5 साल जेल की सजा हुई थी। इसी साल जनवरी में उसकी रिहाई हुई थी, मगर एक अन्य मामले में उसे जेल भेज दिया गया था।


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