बिहार, यूपी, राजस्थान, असम... देश की ग्रोथ को अब रफ्तार दे रहे हैं 'बीमारू' राज्य

Updated on 27-11-2025 01:46 PM
नई दिल्ली: भारत की आर्थिक रफ्तार अब कम आय वाले या उभरते राज्यों की ओर बढ़ रही है। ये राज्य अब तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और अमीर राज्यों के साथ फासला कम कर रहे हैं। एचएसबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह 'ग्रोथ कन्वर्जेंस' कोरोना महामारी से पहले के वर्षों (FY13 से FY19) से बिल्कुल अलग है। तब अमीर राज्य ज्यादा तेजी से बढ़ रहे थे। यह कन्वर्जेंस आय बढ़ने की वजह से हो रहा है न कि आबादी कम होने की वजह से। हालांकि, कैश ट्रांसफर जैसी लोकलुभावन योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने से यह रफ्तार धीमी पड़ सकती है।

राज्यों द्वारा पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर में की गई भारी बढ़ोतरी ने इस बदलाव को बढ़ावा दिया है। असम, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों ने ज्यादा पब्लिक कैपेक्स के साथ-साथ अच्छी आर्थिक तरक्की भी दिखाई है। पब्लिक कैपेक्स से इन्फ्रास्ट्रक्चर बेहतर होता है और यह बताता है कि सरकार की नीतियां स्थिर हैं। इससे और ज्यादा प्राइवेट इन्वेस्टमेंट भी आता है। राज्यों की मजबूत आमदनी ने इस नए निवेश चक्र को संभव बनाया है। जब उभरते राज्यों की आमदनी अच्छी होती है, तो वे ज्यादातर कैपेक्स पर ही खर्च करते हैं। महामारी के बाद केंद्र से मिलने वाले ज्यादा फंड ने राज्यों की वित्तीय स्थिति को मजबूत किया और निवेश में मदद की।

बिहार नंबर 1

सबसे ज्यादा तेजी उभरते राज्यों से आ रही है। FY23 से FY25 के बीच, बिहार ने 10.3% और उत्तर प्रदेश ने 9.0% की रियल GSDP ग्रोथ दर्ज की है, जो भारत की औसत 7.8% से ज्यादा है। बिहार ने FY25 में एक बड़ा मुकाम हासिल किया, जब GVA में इंडस्ट्री का हिस्सा पहली बार एग्रीकल्चर के 22.4% से बढ़कर 23.2% हो गया। उत्तर प्रदेश में FY17 से FY25 के बीच इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी जैसे हाई-टेक सामानों और सेवाओं के एक्सपोर्ट में जबरदस्त उछाल देखा गया है।एचएसबीसी की रिपोर्ट के अनुसार इस बात के सबूत हैं कि महामारी के बाद के दौर में कम आय वाले राज्यों का विकास तेजी पकड़ रहा है। अगर यह जारी रहा, तो राष्ट्रीय विकास दर ऊंची बनी रह सकती है। रिपोर्ट इसका श्रेय सोलो-स्वैन ग्रोथ मॉडल को देती है। इसके अनुसार जिन देशों या राज्यों में कैपिटल-लेबर रेशियो कम होता है, वे तेजी से बढ़ते हैं। एचएसबीसी के चीफ इंडिया इकनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा, 'तो अमीर देश/राज्य अपनी 'सीमा' के करीब हैं, इसलिए वे धीरे-धीरे बढ़ते हैं। गरीब वाले अपनी सीमा से बहुत दूर हैं, इसलिए पूंजी जोड़ने से बड़े फायदे मिलते हैं और विकास तेजी से होना चाहिए।'

क्या है खतरा?

इस कैपेक्स को बनाए रखने में कुछ खतरे भी हैं। केंद्र की टैक्स आमदनी की ग्रोथ धीमी हो रही है, क्योंकि टैक्स की दरें कम की गई हैं और नॉमिनल GDP ग्रोथ भी कमजोर है। इससे राज्यों को मिलने वाले टैक्स में कमी आएगी, क्योंकि वे केंद्र के बांटने योग्य पूल का 41% हिस्सा पाते हैं। वहीं कैश ट्रांसफर स्कीमें चालू खर्च को बढ़ा रही हैं और वित्तीय घाटे को बढ़ा रही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्यों ने FY25 में आमदनी घटने के बावजूद कैपेक्स में कटौती नहीं की, बल्कि घाटा बढ़ाकर इसे संभाला। लेकिन अब घाटा काफी बढ़ गया है। अगर आमदनी और कमजोर हुई या लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च बढ़ता रहा, तो कैपेक्स सबसे पहले प्रभावित हो सकता है, जिससे यह शुरू हुआ विकास का साथ-साथ चलना रुक जाएगा।

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