भूमिहार के सहारे कांग्रेस की यूपी को साधने की कोशिश, अजय राय का क्यों टूटा था BJP से दिल

Updated on 18-08-2023 01:17 PM
वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी के एक बड़े भूमिहार चेहरे अजय राय को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कमान दे दी है। भले ही इस जाति वर्ग का यूपी की राजनीति में अधिक बर्चस्व नहीं रहा हो, लेकिन यह वर्ग अपनी अलग जगह बनाता दिखता है। कांग्रेस ने पिछले दिनों में लगातार यूपी में प्रयोग किए, लेकिन प्रदेश की सत्ता से करीब साढ़े तीन दशक से दूर पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के संगठन को मजबूती देने के लिए अजय राय को सामने लाया गया है। कांग्रेस मानकर चल रही है कि अजय राय पार्टी के अंदरूनी मतभेदों को निपटाकर संगठन को एक बार फिर भाजपा के मुकाबले में खड़ा करने में सफल होंगे। अजय राय इस प्रकार का दावा भी कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने के बाद वे भाजपा को उत्तर प्रदेश में उसके पुराने स्थान पर वापस भेजने का दावा किया गया है। बृजलाल खाबरी की जगह पर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने संबंधी नोटिस पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से जारी किया गया है।

दलित से सवर्ण राजनीति की तरफ कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी ने बृजलाल खाबरी को पिछले साल प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी थी। इसके बाद से दावा किया जा रहा था कि पार्टी सवर्ण के साथ-साथ दलित राजनीति को साधने का प्रयास करेगी। खाबरी ने अध्यक्ष बनने के बाद अपने इरादे भी साफ कर दिए थे। उन्होंने कहा था कि मैं ऐसी जाति से आता हूं, जिसे कभी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। ऐसे में दलितों के सम्मान का मुद्दा उठाने की कोशिश की। हालांकि, इसके बाद अन्य दलों की ओर से दलितों के लिए किए जाने वाले कार्यों को गिनाना शुरू कर दिया गया। दलित सम्मान की आवाज बनी मायावती का उदाहरण दिया जाने लगा। पिछले दिनों में अखिलेश यादव ने भी पीडीए के जरिए पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की राजनीति पर फोकस किया है। ऐसे में अजय राय के जरिए कांग्रेस सवर्णों को साधने की कोशिश करती दिख रही है।
I.N.D.I.A. की अलग रणनीति

अजय राय के अध्यक्ष बनने के बाद यूपी में विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. की अलग रणनीति पर चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल, I.N.D.I.A. में कांग्रेस के साथ-साथ अभी अखिलेश यादव और जयंत चौधरी दिख रहे हैं। अखिलेश वर्तमान समय में माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण को मजबूत करने के साथ-साथ इसमें गैर यादव पिछड़ों को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में अखिलेश की राजनीति में कांग्रेस बाधा पहुंचाने के मूड में नहीं दिख रही है। पार्टी की ओर से अजय राय को आगे करके अब सवर्णों को साधने की कोशिश की जा रही है। दरअसल, यूपी में भूमिहार वर्ग की पकड़ ब्राह्मण और राजपूत दोनों वोट बैंक के बीच दिखती है। अपनी इस सामाजिक पकड़ का फायदा उठाकर अजय राय भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश कर सकते हैं।

ऐसे हुआ था भाजपा से मोहभंग


अजय राय वाराणसी के दबंग नेताओं में शामिल थे। 3 अगस्त 1991 की सुबह वाराणसी के लहुराबीर इलाके में एक बड़ी घटना घटी। घर के बाहर अवधेश राय अपने छोटे भाई अजय राय के साथ बैठ कर बात कर रहे थे। उसी समय एक मारुति वैन आई और अवधेश राय को गोलियों से भून दिया गया। इसके तुरंत बाद अवधेश राय की मौत हो गई। अवधेश हत्याकांड में बाहुबली मुख्तार अंसारी समेत अन्य को आरेापी बनाया गया। करीब 32 सालों तक कोर्ट में यह केस चला। पिछले दिनों इस मामले में फैसला आया है। हालांकि, इस घटना के बाद अजय राय ने अपने भाई की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। भाजपा ने अजय राय को कोलअसला सीट से उम्मीदवार बनाया। अजय राय विधायक चुने गए। 2002 और 2007 में भी वे जीते।
लोकसभा चुनाव 2009 में उन्होंने वाराणसी लोकसभा सीट पर अपनी दावेदारी पेश की। भाजपा ने यहां से सीनियर नेता मुरली मनोहर जोशी को उम्मीदवार बना दिया। नाराज अजय राय ने भाजपा छोड़ दी। वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। सपा ने उन्हें वाराणसी से उम्मीदवार बनाया। लेकिन, मुरली मनोहर जोशी के हाथों उनकी हार हुई। इसके बाद कोलअसला विधानसभा सीट पर हुए 2009 के उप चुनाव में वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे और जीते। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ले ली। 2012 के चुनाव से पहले हुए परिसीमन में कोलअसला विधानसभा सीट का अस्तित्व समाप्त हो गया। यह सीट पिंडरा विधानसभा सीट के नाम से जानी जाने लगी। 2012 के विधानसभा चुनाव में पिंडरा सीट से उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की।

पिछले चुनावों में नहीं मिली जीत


अजय राय ने पिछले चार चुनावों में किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी। यूपी विधानसभा चुनाव 2017 और 2022 में भाजपा के डॉ. अवधेश सिंह ने पिंडरा सीट पर जीत दर्ज की। इन दोनों चुनावों में अजय राय तीसरे स्थान पर रहे। बसपा के बाबूलाल दोनों उप चुनाव में उप विजेता रहे। अजय राय ने लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में वाराणसी सीट पर पीएम नरेंद्र मोदी को चुनौती दी। हालांकि, कांग्रेस के संगठनकर्ता के तौर पर लगातार वे बने रहे हैं। अब प्रदेश अध्यक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालेंगे।

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