डॉलर के दबदबे को मिल रही चुनौती, डॉलर और चैलेंजर के बीच क्या करे भारत?

Updated on 01-05-2023 07:29 PM
नई दिल्ली : अमेरिका में चिंता साफ दिख रही है। डॉलर के दबदबे को चुनौती ने वहां शंकाओं को जन्म दे दिया है। दुनिया भर में आवाजें उठ रही हैं कि डॉलर से दूरी बनाने की कोशिशें तेज होनी चाहिए। नामी अमेरिकी अर्थशास्त्री जोसफ सुलिवन ने हाल में कहा है कि अगर BRICS देश (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, साउथ अफ्रीका) अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए अपनी संयुक्त करंसी लाते हैं तो इससे डॉलर के लिए मुश्किल हो सकती है।
कितनी है ताकत: अमेरिकी डॉलर की हैसियत क्या है, ये बताने के लिए इतना काफी होगा कि ग्लोबल विदेशी मुद्रा व्यापार में इसका हिस्सा 80 प्रतिशत से अधिक है। हालांकि हाल के वर्षों में प्रभुत्व धीरे-धीरे कम हो रहा है। यह ट्रेंड कई कारणों से है। अमेरिकी डॉलर की स्थिरता पर चिंताएं बढ़ी हैं। व्यापार भुगतान के लिए दूसरी मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है। आर्थिक महाशक्ति के रूप में चीन और भारत का उदय हो रहा है।
अब सवाल ये उठता है कि दुनिया की मुद्रा व्यवस्था में अगर इतने बड़े बदलाव की संभावना है तो भारत को क्या रुख अपनाना चाहिए? क्या उसे डॉलर की पुरानी ताकत पर इसलिए भरोसा करना चाहिए कि हाल के बरसों में अमेरिका से आर्थिक करीबी बढ़ी है। या फिर BRICS की पहल का साथ देना चाहिए, जिस मंच पर भारत के साथ चीन भी खड़ा होता है।

कितनी है उम्मीद :
 ट्रंप के शासनकाल के दौरान सुलिवन वाइट हाउस की आर्थिक सलाहकार परिषद में रह चुके हैं। उनकी शंकाएं एकदम से निर्मूल नहीं कही जा सकती हैं। BRICS देश भी इस बात पर विचार कर रहे हैं कि विदेशी कारोबार के लिए एक नई करंसी होनी चाहिए। कहा जा रहा है कि ये विचार इस साल अगस्त में आकार भी ले सकता है, क्योंकि तब BRICS का सालाना सम्मेलन होना है। एक रूसी राजनेता के हवाले से आई रिपोर्ट के मुताबिक, BRICS देश एक नया पेमेंट सिस्टम विकसित कर रहे हैं। निश्चित रूप से इससे डॉलर या यूरो को प्रोटेक्शन नहीं मिलेगा।
किसका है आइडिया: BRICS करंसी की बात सबसे पहले रूस ने सामने रखी, क्योंकि यूक्रेन जंग के बाद उसे पश्चिमी देशों की पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। ये आरोप काफी पहले से लगते रहे हैं कि अमेरिका डॉलर को हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। इसके विरोध में एक मंच पर खड़े रूस और चीन के बीच कारोबार युआन में होना तय हो गया। कुछ समय पहले ब्राजील और चीन ने एक अग्रीमेंट किया, जिसमें उन्होंने डॉलर से नाता तोड़कर अपनी अपनी करंसी में कारोबार का भुगतान करना तय किया।

रुपये में कारोबार: करीब 18 देश भारत के साथ रुपये के जरिए कारोबार के लिए तैयार हैं। रूस और भारत के बीच भी ज्यादातर कारोबार रुपये में हो रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने एक फ्रेमवर्क बनाया है, जो भारत के साथ रुपये में कारोबार करने के इच्छुक किसी भी भागीदार देश पर लागू होगा। भारत के लिए एक और बात अहम है कि वह डिजिटल करंसी चलाने की कोशिशों में जुटा है। इससे रुपये को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने में बहुत मदद मिलने की संभावना है।
फायदे और नुकसान: डॉलर का इस्तेमाल कम होने के फायदे और नुकसान दोनों हैं। इससे किसी एक करंसी पर निर्भरता का रिस्क कम होगा, देश की अपनी मुद्रा मजबूत होगी। हम मुद्रा पर अपनी स्वतंत्र नीति तय कर सकेंगे। कभी अमेरिका ने पाबंदियां लगाईं तो उसका आसानी से सामना किया जा सकेगा। लेकिन इस बदलाव का सफर चुनौतियों से भरा होगा। थोड़े समय के लिए अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।

समस्या कहां है: अमेरिका साफतौर पर रूस और चीन का विरोधी है, जबकि हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में वह भारत को रणनीतिक सहयोगी और साझेदार मानता है। भारत भी मानता है कि डॉलर के इस्तेमाल को कम करने की रूस और चीन की कोशिश फिलहाल वैचारिक ज्यादा है, व्यावहारिक कम। डॉलर के आधिपत्य को चुनौती देने के लिए BRICS की लामबंदी को भारत में जोरदार समर्थन नहीं देखा गया। भारत और चीन के बीच हालिया सैनिक तनाव ने भी गतिरोध का काम किया है।


मिलेगी मदद :
 अगर BRICS देश अपनी करंसी लाते हैं तो भविष्य में यह उनकी अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने में निश्चित तौर पर मददगार साबित होगा। लेकिन डॉलर पर निर्भरता से मुक्ति रातोंरात तो नहीं मिल सकती। मिलनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि घटनाक्रम तेजी से बदला तो अमेरिका की प्रतिक्रिया भी हैरान करने वाली हो सकती है। इसे बेहद संतुलित तरीके से अंजाम तक पहुंचाने की जरूरत है।

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