डोनाल्ड ट्रंप रणनीति के तहत उठा रहे कदम, क्या ग्रीनलैंड पर सच में कब्जा कर लेगा अमेरिका? जानें

Updated on 20-01-2026 01:13 PM
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी घोषणाओं, नीतियों और कदमों से जिस तरह से पूरे विश्व में उथल-पुथल मचा दी है, वह कुछ समय पहले तक अकल्पनीय था। स्वाभाविक ही, वहां इस सवाल पर तीखी बहस चल रही है कि उनके चार वर्ष के कार्यकाल का देश के भविष्य पर क्या असर होगा और यह भी कि आखिर इतिहास में उन्हें किस रूप में याद किया जाएगा।

ध्यान रहे, ट्रंप बगैर योजना और रणनीति के एक भी कदम नहीं उठा रहे। जब 20 जनवरी, 2025 को उन्होंने राष्ट्रपति का पदभार संभाला तो उसके बाद दिए गए उनके बयानों को बड़े-बड़े विश्लेषकों ने हल्के में लिया। व्यंग्य और कटाक्ष किए गए, मजाक उड़ाया गया। अब आम तौर पर मान लिया गया लगता है कि उनके बयानों को हलके में नहीं लिया जा सकता।

निशाने पर ग्रीनलैंड

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लाए जाने के बाद सभी मान रहे हैं कि ग्रीनलैंड का भी अमेरिका का हिस्सा बनना लगभग तय है। अगर ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बना लेते हैं तो सामरिक और दुर्लभ खनिजों से भरे महत्वपूर्ण आर्कटिक में उसका प्रभुत्व होगा। चीन व रूस के लिए वहां आधिपत्य जमाना कठिन हो जाएगा।

ईरान का कांटा

ईरान को उन्होंने काफी हद तक कमजोर कर दिया है। अगर वहां अयातुल्लाह खामेनेई का इस्लामी शासन समाप्त या कमजोर होता है तो ट्रंप अमेरिकी इतिहास में अमर हो जाएंगे। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान के अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले, कर्मचारियों को बंधक बनाए जाने जैसी घटनाओं की टीस अमेरिका में आज तक है। तब से सभी अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान के इस्लामी शासन को इविल की संज्ञा देते हुए समाप्त करने की बात कहते रहे हैं।

नीति में बदलाव

इतिहास का एक सच यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ और अमेरिका की अगुआई वाले दो परस्पर विरोधी समूहों के बीच तनाव और संतुलन से दुनिया का ढांचा विकसित हुआ। जब सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की साम्यवादी सत्ताओं का पतन होने लगा, तब पहले रोनाल्ड रीगन और बाद में जॉर्ज बुश सीनियर अमेरिका के राष्ट्रपति थे।

जॉर्ज बुश के सामने इस वैश्विक उथल-पुथल के मद्देनजर अमेरिकी नीतियों, वैदेशिक संबंधों और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वैचारिक और ढांचागत पुनर्रचना की चुनौती थी। उन्होंने और उनके बाद के राष्ट्रपतियों ने व्यापक बदलाव से स्वयं को दूर रखा। इस कारण अमेरिका के राष्ट्रीय जीवन एवं उसकी वैश्विक भूमिका में कायम जटिलताएं बढ़ती गईं।

ताकतवर अमेरिका

अब ट्रंप ने साहस दिखाया है। इससे विश्व में उथल-पुथल और भय, अनिश्चित तथा अराजकता का माहौल पैदा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र सहित अधिकतर वैश्विक संस्थाएं अप्रभावी और अप्रासंगिक दिख रही हैं तो इससे भी यह साफ है कि पूरी संरचना सहज स्वाभाविक नहीं है।

अमेरिकी अपने देश को प्रभुत्वशाली देखना चाहते थे। ट्रंप ने साबित कर दिया है कि दुनिया के वर्तमान ढांचे को आमूल हिला देने की ताकत केवल उसके पास है। विश्व के सभी प्रमुख देश वैश्विक, व्यापारिक, सामरिक से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक संरचनाओं को नई परिस्थितियों से समन्वित करने को विवश हैं।

नाटो की जरूरत

अमेरिका की नीति नाटो देशों के साथ परंपरागत संबंध बनाए रखने की रही है। लेकिन वहां एक बड़े वर्ग की सोच थी कि यूरोपीय देशों में अनेक अमेरिकी नीतियों के साथ नहीं चलते, उसका विरोध करते हैं जबकि अमेरिकी सैन्य शक्ति से ही उनकी धाक है।

उनका सवाल यह भी था कि जब सोवियत संघ खत्म होने के साथ उसके सैन्य ढांचे समाप्त हो गए तो नैटो की आवश्यकता ही क्या है? ट्रंप नैटो को खत्म नहीं कर रहे, पर उनकी अगुआई में अमेरिका अपने हिसाब से इसका संचालन सुनिश्चित करने की ओर अग्रसर है।

राष्ट्रहित पर जोर

बहरहाल, इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इस रुख और व्यवहार का विरोध करने वाले भी बड़ी संख्या में हैं। बावजूद इसके, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें अमेरिका के प्रभुत्व और प्रभाव का पूरे विश्व को अहसास कराने और उसे आर्थिक व सामरिक रूप से पहले से ज्यादा सुरक्षित बनाने और दुनिया में अमेरिका केंद्रित विश्व व्यवस्था का रास्ता तैयार करने वाला नेता माना जाएगा। उन्हें विश्व के देशों को वैचारिकता से बाहर निकल कर राष्ट्रीय हित देखने और उसके अनुसार संबंध बनाने का विकल्प देने वाले के रूप में भी याद किया जाएगा।

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