पिता बस ड्राइवर, खाने के पैसे नहीं... गुदड़ी के लाल ने मेडल जीत किया कमाल, इसे कहते हैं सच्चा पहलवान

Updated on 21-08-2025 01:09 PM
नई दिल्ली, Hindol Basu: जब 18 साल के सुमित मलिक बुल्गारिया के समोकोव में कुश्ती के मैट पर उतरे, तो उनके कंधों पर सिर्फ 57 किलो का भार नहीं था। उनके साथ था एक ऐसे जीवन का बोझ, जिसकी शुरुआत पैसों की तंगी से हुई थी, एक गांव की उम्मीदें, जिसने उन्हें बड़ा होते देखा था और एक ऐसे कोच का अटूट विश्वास, जिन्होंने मुश्किलों को उनके भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।

मंगलवार को U-20 विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में फाइनल में रूस के मैगोमेड सालियाख ओजदामिरोव (जो यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग बैनर के अंडर कंपीट कर रहे थे) से 5-8 से हारने के बाद सुमित ने भारत के लिए रजत पदक जीता। उस मुकाबले में और वहां तक पहुंचने में सुमित ने खेल का असली सार दिखाया - हिम्मत, साहस और हार न मानने का जज्बा।

सुमित के पिता थे बस ड्राइवर, गरीबी में गुजरा रेसलर का बचपन

हरियाणा के सोनीपत जिले के कासंडा गांव में जन्मे सुमित के शुरुआती साल गरीबी में गुजरे। उनके पिता, सुरेंद्र मलिक, एक बस ड्राइवर थे। वह रात को देर से थके हुए घर लौटते थे, लेकिन कभी शिकायत नहीं करते थे। खाना भी बहुत कम होता था। कुश्ती के मैट, जूते, डाइट सप्लीमेंट जैसी चीजें उस लड़के के लिए एक सपना थीं। लेकिन, कहीं न कहीं, हरियाणा के धूल भरे अखाड़ों में उन्होंने तय कर लिया था कि उनकी किस्मत गरीबी की मोहताज नहीं होगी।

पहले राउंड में सुमित ने किया था जोरदार कमबैक

बुल्गारिया में ही, शुरुआती राउंड के एक मुकाबले में, सुमित का जज्बा सबसे ज्यादा दिखाई दिया। जापान के रिन साकामोटो, जो कि एक सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप के खिलाड़ी थे। उनके खिलाफ सुमित 1-10 से पीछे थे। कुश्ती में, इतना अंतर होने पर मैच खत्म मान लिया जाता है। बस एक और पॉइंट और मैच खत्म हो जाता। टेक्निकल सुपीरियॉरिटी की वजह से साकामोटो को विजेता घोषित कर दिया जाता। रेफरी मैच रोकने ही वाले थे कि अचानक सुमित में नई जान आ गई
सुमित मलिक ने लाजवाब वापसी की। जो नामुमकिन लग रहा था, वह मुमकिन लगने लगा। हार का अंतर कम होता गया। सुमित ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बुल्गारिया से बताया, 'मैंने खुद से कहा कि 'मेरी कहानी इस तरह खत्म नहीं हो सकती'। मैंने अपने पिता, अपने कोच, अपने गांव के बारे में सोचा। मैंने उन दिनों के बारे में सोचा जब मैं भूखा रहकर ट्रेनिंग करता था। मैं हार नहीं मान सकता था।' आखिरी सीटी बजने तक उन्होंने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया। सुमित ने 1-10 की हार को जीत में बदल दिया था।

सुमित के कोच ने भी दिया बड़ा बयान

सुमित के कोच अश्वनी दहिया, जो हरियाणा में अश्वनी अखाड़ा खेल समिति चलाते हैं, उन्होंने कहा, 'कुश्ती में ताकत की जरूरत होती है, लेकिन लड़ाई दिमाग से जीती जाती है। वो बाउट टर्निंग पॉइंट था। उसने दिखाया कि सुमित कौन है। वह एक योद्धा है, मैट पर भी और मैट के बाहर भी।'

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