तेल से लेकर खाद तक, भारत को यूं ही नहीं गले लगा रहा दोस्‍त रूस, एक्‍सपर्ट ने बताया पुतिन का दोहरा डर

Updated on 06-04-2026 05:25 PM
मास्‍को/नई दिल्‍ली/बीजिंग: ईरान भीषण जंग के बीच दशकों से पुराने दोस्‍त भारत और रूस के बीच संबंध फ‍िर से मजबूत हो गए हैं। अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के टैरिफ लगाने के बाद भारत ने रूस से तेल लेना कम कर द‍िया था लेकिन अब ईरान युद्ध के बीच दोनों के बीच जमकर तेल की खरीद हो रही है। होर्मुज स्‍ट्रेट संकट के इस समय में भारत और रूस की सदाबहार दोस्‍ती परीक्षा में खरी उतरी है। यही नहीं भारत अब रूस से गैस और फर्टिलाइजर भी खरीदने जा रहा है जिसकी भारत में बड़ी क‍िल्‍लत हो गई है। व‍िदेशी मामलों के एक्‍सपर्ट का मानना है कि भारत और रूस के बीच बढ़ती दोस्‍ती की बड़ी वजह चीन का बढ़ता दबदबा और अमेरिका का पल-पल बदलता व्‍यवहार है। आइए समझते हैं पूरा मामला...

शुक्रवार को रूस के फर्स्‍ट डेप्‍युटी पीएम डेनिस मांतुरोव ने कहा कि ईरान युद्ध के बीच मास्‍को भारत को तेल और LNG की आपूर्ति करने की बहुत अच्‍छी स्थिति में है। मांतुरोव भारत की यात्रा पर आए थे। उन्‍होंने पीएम मोदी और व‍िदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की थी। इस दौरान व्‍यापार, ऊर्जा और औद्योगिक सहयोग पर बात हुई है। कहा जा रहा है कि भारत चाहता है कि रूस फ‍िर से भारत को एलएनजी की सप्‍लाई करे। यह साल 2022 के यूक्रेन हमले के बाद पहली बार होगा। भारतीय तेल कंपनियां अप्रैल महीने में 6 करोड़ बैरल तेल रूस से खरीद रही हैं। भारत बड़े पैमाने पर खाद भी रूस से ले रहा है ताकि खाड़ी देशों से होने वाली कमी को पूरा क‍िया जा सके।

भारत संग म‍िलकर चीन को संतुल‍ित करना चाहता है रूस


सिंगापुर के इंस्‍टीट्यूट ऑफ साऊथ एशियन स्‍टडीज के र‍िसर्च फेलो इवान ल‍िदारेव ने साऊथ चाइना मॉर्निंग पोस्‍ट अखबार से बातचीत में कहा कि भारत और रूस के बीच यह दोस्‍ती हितों पर आधारित है न कि भावनाओं पर। ल‍िदरेव ने कहा, 'इसके बाद भी भारत-रूस संबंध एक मजबूत लेकिन धीरे-धीरे और अधिक सीमित होती जा रही साझेदारी को दर्शाते हैं। ईरान युद्ध ने भारत को रूस के और ज्‍यादा करीब जाने के लिए स्‍पष्‍ट रूप से प्रेरित किया है।' दोनों ही देश एक मल्‍टीपोलर वैश्विक व्‍यवस्‍था का सपना देखते हैं जो देशों की संप्रभुता और ग्‍लोबल साऊथ के व्‍यापक भूमिका पर जोर देता हो।इवान ल‍िदारेव ने कहा कि भारत और रूस दोनों चाहते हैं कि चीन की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाया जाए। इसी वजह से दोनों ही देश मिलकर ब्रिक्‍स और शंघाई सहयोग संगठन के जरिए चीन को संतुलित करना चाहते हैं। उन्‍होंने कहा कि अगर भागीदारी नहीं होती तो रूस को चीन के और ज्‍यादा करीब जाना पड़ता, वहीं भारत को तेजी से भरोसा खो रहे अमेरिका से नजदीकी बढ़ानी पड़ती। रूसी डेप्‍युटी पीएम ने ऐसे समय पर भारत की यात्रा की है जब दोनों ही देशों के बीच एस-400 को लेकर एक नई डील पर हस्‍ताक्षर हुआ है।

भारत के व‍िशाल बाजार पर है रूस की नजर


वहीं जेएनयू में असोस‍िएट प्रोफेसर राजन कुमार का कहना है कि भारत ने रूस के साथ दोस्‍ती को मजबूत करके मास्‍को चीन के पाले में पूरी तरह से जाने से रोक द‍िया। वहीं पाकिस्‍तान भी दूर ही रहा। उन्‍होंने कहा कि रूस भारत पर इसलिए भरोसा करता है क्‍योंकि उसके बाजार का आकार बहुत बड़ा है। राजन कुमार ने कहा, 'यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंध लगाने के बाद रूस केवल इसलिए बचा रहा क्‍योंकि चीन और भारत लगातार रूस से व्‍यापार करते रहे। ऐसे में रूस भारत के साथ रिश्‍ते को समझता है।'

अमेरिका से भारत और रूस दोनों ही न‍िराश


अभी पिछले महीने ही रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत की 'स्‍वतंत्र व‍िदेश नीति' की तारीफ की थी। उन्‍होंने कहा कि यह दोस्‍ती 'समय की परीक्षा में खरी उतरी है।' अमेरिकी एक्‍सपर्ट माइकल रुबिन का कहना है कि रूस ईरान युद्ध का फायदा उठाकर दिल्‍ली के साथ अपने र‍िश्‍ते को मजबूत कर रहा है। इससे पहले रूस भारत को सौदा करने के बाद भी एस-400 की समय पर आपूर्ति नहीं कर पाया है। उन्‍होंने कहा कि भारत और रूस दोनों की अमेरिका को लेकर भी साझा निराशा है। इसके बाद भी भारत का भविष्‍य शायद उथल-पुथल वाला ही रहेगा। इसके पीछे वजह यह है कि पुतिन और ट्रंप दोनों ही लगातार भड़काऊ और एकतरफा कदम उठा रहे हैं।

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