दादाजी की 58 साल पुरानी रेसिपीज, सालों से खाने आ रहे यहां लोग

Updated on 16-02-2023 06:00 PM

बापू की कुटिया। भोपाल में खाने के शौकीन लोगों के लिए यह नाम जाना-पहचाना है। भोपाल से शुरू हुआ ये सफर अब मप्र के दूसरे शहरों में जाने को तैयार है। जायका में पढ़िए बापू की कुटिया का सफर…

1962 में बापू की कुटिया था भारत रेस्टोरेंट

रेस्टोरेंट के संचालक अनुभव बताते हैं कि बापू की कुटिया को करीब 58 वर्ष हो चुके हैं। इसकी शुरुआत दादाजी स्वर्गीय श्याम दास सुजवानी ने की थी। मेरे दादाजी 1962 में पोरबंदर से भोपाल आए। इससे पहले उन्होंने पोरबंदर में श्याम टी स्टॉल शुरू किया था, मगर किन्हीं कारणों से उन्हें भोपाल आना पड़ा, फिर यहां आकर उन्होंने रोशनपुरा में भारत रेस्टोरेंट खोला। वह रेस्टोरेंट साल भर से ज्यादा वक्त तक रहा, मगर वह नहीं चल पाया। जिसके बात उसे बंद कर दिया गया। फिर उसी रोशनपुरा इलाके में एक नई शुरुआत करते हुए दादाजी ने बापू की कुटिया की शुरुआत की।

उस समय मेरे पिताजी बहुत छोटे थे। मेरे पिताजी बचपन से ही दादाजी का हाथ बंटाते थे। हालांकि हम लोग कभी लौटकर वापस पोरबंदर नहीं गए। मेरे पिताजी बताते हैं कि साल 2003 में उन्हें लगा कि बापू की कुटिया को अब हमें और बहुत आगे तक ले जाना चाहिए क्योंकि वह इसको एक रेस्टोरेंट की तरह नहीं, बल्कि वह इसको एक सेवा भाव से लेते हैं। उनका मानना है कि हमें बहुत कम से कम दामों में स्वादिष्ट भोजन परोसना है। इसके बाद ही कई शहरों तक का सफर यहीं से शुरू हुआ।

बापू की कुटिया में लगे पेड़ की कहानी

बापू की कुटिया रेस्टोरेंट में जो पेड़ लगा है, उसके बारे में अनुभव बताते हैं कि यह पेड़ आज का नहीं है। यह तो दादाजी के समय का है। उस समय जब बापू की कुटिया की शुरुआत हुई, तब यह पेड़ यहीं लगा हुआ था, क्योंकि दादाजी हमेशा पर्यावरण को प्राथमिकता देते थे, तो उन्होंने इस पेड़ को कटवाना उचित नहीं समझा। उन्होंने इस पेड़ के साथ ही रेस्टोरेंट शुरू किया। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने भी इस पेड़ को कभी कटवाने के बारे में नहीं सोचा।

डिशेज और उनकी खासियत

मलाई कोफ्ता- अनुभव बताते हैं कि हमारे यहां जो मलाई कोफ्ता होता है, वह बहुत स्मूद टेक्सचर का होता है। हल्का सा स्वीट भी होता है। इसकी खासियत यह है कि इसमें हम सिर्फ और सिर्फ ड्राईफ्रूट्स की ग्रेवी का यूज करते हैं साथ ही मावा इसके टेक्सचर को और भी खास बना देता है।

बटर पनीर मसाला- अनुभव कहते हैं कि हमारे बटर पनीर मसाला की खासियत अपने आप में इसलिए अच्छी है क्योंकि हम एक-एक मसाला खुद चुनते हैं और कुछ मसालों को रोस्ट करके खुद पीसते हैं। ऐसे ही सीक्रेट रोस्टेड मसालों का इस्तेमाल हम बटर पनीर मसाला में भी करते हैं।

दाल मखनी- दाल मखनी की बात की जाए तो यह अपने आप में खास इसलिए है कि इसमें एक भी बूंद तेल की नहीं होती है। इसमें क्रीम, बटर और देसी घी का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी कुकिंग में हम स्लो हीट का भी उपयोग करते हैं जो कि एक लंबी प्रक्रिया है।

अब कॉन्टिनेंटल फूड भी

अनुभव बताते हैं कि महीने भर में भोपाल में हम एक नई शुरुआत करने जा रहे हैं। शहर के मीनाल रेसीडेंसी पर जेके रोड एरिया में बापू की कुटिया अब जल्द ही क्विक सर्विस रेस्टोरेंट भी शुरू करने जा रही है, जिसमें कई तरह का कॉन्टिनेंटल फूड लोगों के लिए उपलब्ध होगा। यहां छोले भटूरे आदि के साथ कई तरह की चाइनीज डिशेज भी मिलेंगी।

18 साल से एक ही शेफ, जबरदस्त डिश बनाते हैं

बापू की कुटिया के हेड शेफ रमेश बहादुर बताते हैं कि वे यहां 18 साल से काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि हम हर डिश पर एक जैसा फोकस करते हैं ताकि कस्टमर को उसका स्वाद पसंद आए। हर डिश को स्वादिष्ट बनाने में हमारे खुद के मसालों का रोल है। हम मसाले खुद तैयार कराते हैं।

युवक बोला- पच्चीस साल से आ रहा हूं

भोपाल के रहने वाले सौपान चौहान कहते हैं कि करीब पच्चीस साल से यहां आ रहा हूं। कई बार परिवार के साथ आता हूं। परिवार में जब किसी को लंच या डिनर करने का दिल चाहता है तो हम लोग सीधे यहीं आते हैं। मुझे यहां का मलाई कोफ्ता और चिली पनीर बहुत पसंद है।

मुरैना की मशहूर 'बेड़ई' के दीवाने लोग

चीनी हलवाई, यह नाम बड़ा अटपटा है, लेकिन लोग इसी नाम से जानते हैं। बचपन से गरीब थे, इसलिए ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके और ठेले पर बेड़ई बेचने लगे। लोगों को उनकी बेड़ई का स्वाद इतना अच्छा लगा कि भीड़ जुटने लगी। आमदनी बढ़ी तो ठेला हटाकर दुकान बना ली। उसके बाद उनकी देखा-देखी अन्य दुकानदार भी बेड़ई बनाने लगे, लेकिन उनकी नकल कोई नहीं कर सका। आज भी दूर-दूर से लोग इनकी दुकान पर बेड़ई खाने आते हैं। यह बात दैनिक भास्कर से शेयर करते हुए स्व. किशनलाल मंगल उर्फ चीनी हलवाई के बड़े बेटे सुमित उर्फ रिंकू मंगल ने बताई। पूरी खबर यहां पढ़ें

सीहोर की फेमस लौंग-हींग की कचोरी

भोपाल से लगा सीहोर स्वाद के शौकीनों के लिए खास है। यहां लोग कचोरी खाने आते हैं। यहां मिलने वाली कचोरी देशभर में फेमस है। खाने के शौकीन लोग सीहोर में होते हैं, तो सीधे बड़ा बाजार क्षेत्र में जाते हैं। यहां की हींग और लौंग की कचोरी का स्वाद बरबस ही किसी को भी अपना दीवाना बना लेता है। दिनभर में यहां एक हजार कचोरी बिक जाती हैं। कचोरी की इस दुकान को 66 साल पहले दो दोस्तों ने शुरू किया था और आज भी इसका स्वाद जस का तस है। आज जायके में पेश है सीहोर की कचोरी। पूरी खबर यहां पढ़ें


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