एम्स डॉक्टर सुसाइड केस में मानवाधिकार आयोग का स्वतः संज्ञान

Updated on 05-03-2026 01:34 PM
भोपाल, भोपाल एम्स में महिला असिस्टेंट प्रोफेसर की आत्महत्या का मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर गूंजने लगा है। पहले भी इस प्रकरण को लेकर संस्थान की कार्यसंस्कृति और शिकायत निवारण तंत्र पर सवाल उठे थे, लेकिन अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने औपचारिक संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य स्तर के अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। आरोप है कि ट्रॉमा एंड इमरजेंसी विभाग के तत्कालीन HOD डॉ. मोहम्मद यूनुस द्वारा लगातार प्रताड़ना और सार्वजनिक अपमान से परेशान होकर चिकित्सक ने बेहोशी की दवाइयों का ओवरडोज लेकर जान दे दी।

आयोग ने लिया स्वतः संज्ञान

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पीठ, जिसकी अध्यक्षता प्रियंक कानूनगो कर रहे हैं, ने इस मामले को गंभीर मानते हुए स्वतः (स्वयं की पहल पर) संज्ञान लिया। आयोग की ओर से भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, एम्स भोपाल के निदेशक और भोपाल पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी किया गया है। आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 15 दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। रिपोर्ट में संस्थान की आंतरिक शिकायत समिति (POSH कमेटी) द्वारा की गई कार्यवाही का पूरा विवरण, दर्ज एफआईआर की प्रति और पोस्टमार्टम रिपोर्ट अनिवार्य रूप से शामिल की जाए।

ट्वीट से सामने आया मामला

इस प्रकरण को लेकर आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर विस्तृत ट्वीट किया। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा कि भोपाल के एम्स में महिला असिस्टेंट प्रोफेसर सृष्टि (नाम परिवर्तित) ने HOD डॉ. परवेज (नाम परिवर्तित) की प्रताड़ना और अपमान से तंग आकर बेहोश करने वाली दवा के ओवरडोज से आत्महत्या कर ली।

ट्वीट में यह भी उल्लेख किया गया कि महिला चिकित्सक ने तीन बार प्रताड़ना की शिकायत की थी, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने कार्रवाई करने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास किया। ऐसे में चिकित्सक ने आत्महत्या कर ली। कानूनगो ने इसे गंभीर शिकायत बताते हुए जांच के निर्देश दिए और पीड़ित परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

आरोप- शिकायतों पर नहीं हुई कार्रवाई

शिकायत के अनुसार, विभागाध्यक्ष द्वारा कथित रूप से लगातार मानसिक दबाव बनाया जा रहा था। सार्वजनिक रूप से अपमान, पेशेवर कामकाज में बाधाएं और अनुचित व्यवहार जैसे आरोप लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि डॉ. रश्मि ने संस्थान की आंतरिक शिकायत प्रणाली के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, आरोप है कि शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत उत्पीड़न का मामला नहीं बल्कि संस्थागत लापरवाही का भी उदाहरण होगा।

POSH कमेटी की भूमिका पर निगाह, आरोप होंगे तय

आयोग ने विशेष रूप से संस्थान की POSH (Prevention of Sexual Harassment) कमेटी की कार्यवाही का ब्यौरा मांगा है। यह कमेटी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और संबंधित शिकायतों की जांच के लिए गठित की जाती है। यदि शिकायत दर्ज होने के बावजूद उचित जांच या कार्रवाई नहीं हुई, तो यह नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आएगा। ऐसे में जिम्मेदारी केवल आरोपित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संस्थागत तंत्र भी जवाबदेह होगा।

पुलिस जांच भी घेरे में

भोपाल पुलिस से भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। यह देखा जाएगा कि आत्महत्या के लिए उकसाने, मानसिक प्रताड़ना या अन्य संबंधित धाराओं के तहत क्या कदम उठाए गए।

जांच का दायरा अब व्यापक हो चुका है। आयोग यह स्पष्ट करना चाहता है कि कहीं प्रारंभिक स्तर पर मामले को हल्के में तो नहीं लिया गया।

15 दिन बाद सामने आएगी सच्चाई

अब सभी की नजरें आयोग को सौंपी जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं। 15 दिनों के भीतर आने वाली यह रिपोर्ट तय करेगी कि आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई किस दिशा में जाएगी।

आयोग की ओर से जारी संदेश में कहा गया है कि पीड़ित परिवार के साथ संवेदनाएं हैं और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। परिवार की ओर से भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग की गई है। उनका कहना है कि यदि समय पर शिकायतों पर ध्यान दिया जाता, तो शायद यह त्रासदी टल सकती थी।

पहले भी उठे थे सवाल

डॉ. रश्मि से जुड़े इस मामले को लेकर पूर्व में भी कार्यस्थल के वातावरण और शिकायत तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए थे। सहयोगियों का कहना है कि वह एक मेधावी और समर्पित चिकित्सक थीं। उनकी असामयिक मृत्यु ने न केवल परिवार बल्कि चिकित्सा समुदाय को भी झकझोर दिया है। कई चिकित्सकों ने अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार किया कि मेडिकल संस्थानों में कार्यदबाव और प्रशासनिक तनाव एक गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है।



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