स्तन कैंसर की सर्जरी में नुकसान घटाएगी आईसीजी तकनीक, प्रभावित हिस्से की होगी सटीक पहचान

Updated on 26-09-2025 12:13 PM

भोपाल। शरीर में नसों का जाल होता है, जिसे लसीका ग्रंथियां (लिम्फ नोड्स) कहते हैं। ये शरीर की सुरक्षा गार्ड की तरह होती हैं। जब किसी को स्तन कैंसर होता है, तो कैंसर की कोशिकाएं सबसे पहले इन्हीं ग्रंथियों के रास्ते शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलती हैं।

अभी तक ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर स्तन के पास की लगभग सभी ग्रंथियों को निकाल देते थे, ताकि कैंसर फैलने का कोई खतरा न रहे। लेकिन इससे मरीज को हाथ में भारीपन और दर्दनाक सूजन (लिम्फेडेमा) की समस्या हो जाती थी, जो जिंदगी भर परेशान करती थी। एम्स भोपाल ने अब इसका समाधान निकाला है। एक नई तकनीक इंडोसाइनिन ग्रीन (आईसीजी) डाई तकनीक खोजी है।

इस तकनीक से सर्जरी से ठीक पहले यह पता लगा लिया जाता है कि कैंसर ग्रंथियों ने अंग को कितना प्रभावित किया है। इस तकनीक में प्रभावित अंग में एक विशेष रंग डालते हैं। यह रंग कैंसर प्रभावित ग्रंथियों को हाईलाइट कर देता है। यह प्रक्रिया 15 से 20 मिनट में पूरी हो जाती है। इसके बाद सर्जरी में केवल प्रभावित हिस्से को ही निकाला जाता है।

ऐसे काम करती है तकनीक

ऑपरेशन से ठीक पहले, डाक्टर कैंसर वाली गांठ (ट्यूमर) में एक खास हरे रंग का इंजेक्शन लगाते हैं। यह रंग शरीर के लिए पूरी तरह सुरक्षित होता है। यह रंग उस रास्ते पर फैलने लगता है, जिस रास्ते से कैंसर फैल सकता है। यह सबसे पहले उन मुख्य ग्रंथियों तक पहुंचता है, जो सीधे ट्यूमर से जुड़ी होती हैं। डॉक्टर एक विशेष इन्फ्रारेड कैमरे से देखते हैं।

इस कैमरे से उन्हें मुख्य ग्रंथियां हरे रंग में चमकती हुई साफ दिखाई दे जाती हैं। इससे उन्हें पता चल जाता है कि कैंसर सबसे पहले किन ग्रंथियों में फैल सकता है। डॉक्टर सिर्फ उन्हीं दो-तीन चमकने वाली मुख्य ग्रंथियों को निकालते हैं, न कि सभी ग्रंथियों को। निकाली गई ग्रंथियों को तुरंत जांच के लिए भेजा जाता है। इस जांच (फ्रोजन सेक्शन) की रिपोर्ट सिर्फ 15-20 मिनट में आ जाती है।

मरीज को होगा यह फायदा

अगर जांच में पता चलता है कि इन मुख्य ग्रंथियों में कैंसर नहीं है, तो बाकी की स्वस्थ ग्रंथियों को शरीर से नहीं निकाला जाता। इससे भविष्य में हाथ में होने वाली दर्दनाक सूजन और भारीपन का खतरा लगभग खत्म हो जाता है। मरीज का जीवन ऑपरेशन के बाद बहुत आरामदायक हो जाता है और उसे साइड इफेक्ट्स का सामना नहीं करना पड़ता।

यह तकनीक डॉक्टरों को यह सटीक जानकारी देती है कि कैंसर कहां तक फैला है, जिससे इलाज और भी बेहतर तरीके से हो पाता है। यह नई तकनीक एक तरह का जीपीएस सिस्टम है, जो डॉक्टरों को कैंसर के फैलने का सही रास्ता दिखाती है। इससे अनावश्यक ग्रंथियों को निकालने की जरूरत नहीं पड़ती।



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