अमेरिका के चक्कर में तेल के खेल में फंस गया भारत! चीन के हाथ में है रूसी सप्लाई की चाबी

Updated on 05-02-2026 01:02 PM
नई दिल्ली: अमेरिका के साथ ट्रेड डील के बाद भारत की अपनी तेल खरीद नीति में बड़ा बदलाव कर सकता है। ईटी की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि तेल मंत्रालय और भारतीय कंपनिया अब अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदने की तैयारी कर रही हैं जबकि रूस से आयात में गिरावट आने की संभावना है। सरकारी तेल कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हाल में मंत्रालय के अधिकारियों के साथ मुलाकात करके इस बात पर विचार किया कि अमेरिका से और कितना तेल तथा गैस खरीदी जा सकती है।

सूत्रों का कहना है कि घरेलू मांग बढ़ने और रूस से सप्लाई कम होने से सरकारी कंपनियों को ही ज्यादा एडजस्टमेंट करना पड़ेगा। पश्चिम एशिया से आने वाले तेल की तुलना में अमेरिका से आने वाले तेल पर अमूमन दो डॉलर प्रति बैरल ज्यादा लागत आती है। पिछले साल फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा की थी। तब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह चाहते हैं कि अमेरिका भारत में तेल और गैस का सबसे बड़ा सप्लायर बने। बाद में विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा था कि भारत अमेरिका से तेल का आयात 15 अरब डॉलर से बढ़ाकर 25 अरब डॉलर करना चाहता है।

अमेरिका से सप्लाई

ट्रंप ने दोनों देशों के बीच ट्रेड डील की घोषणा करते हुए कहा था कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा। इसमें तेल और गैस भी शामिल है। पिछले साल अमेरिका से भारत को तेल की सप्लाई में काफी तेजी आई। Kpler के आंकड़ों के मुताबिक यह 60% की तेजी के साथ रोजाना 3,18,000 बैरल पहुंच गई। भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी खरीदने के लिए भी पिछले साल दिसंबर में एक डील की थी। यह भारत के कुल एलपीजी आयात का करीब 10 फीसदी है। भारत पहले ही अमेरिका से एलएनजी मंगा रहा है।
आने वाले महीनों में भारत के अमेरिका से ज्यादा तेल मंगाने की उम्मीद है। सूत्रों का कहना है कि भारतीय कंपनियां रूस से तेल की खरीद में काफी कटौती कर सकती है। हालांकि रूस से तेल का आयात पूरी तरह बंद नहीं होगा। जो कार्गो पहले ही बुक किए जा चुके हैं, उनके मार्च तक भारत पहुंचने की संभावना है। जनवरी में केवल इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और रोसनेफ्ट के निवेश वाली कंपनी नयारा एनर्जी को रूसी सप्लाई मिली। हालांक 2025 के एवरेज की तुलना में इसमें 30 फीसदी गिरावट आई है।

कहां फंसा है पेच?

एक सूत्र ने कहा कि रूस से तेल खरीदने का फैसला कमर्शियर के साथ-साथ डिप्लोमैटिक भी हो गया है। भारतीय कंपनियों के लिए रूसी तेल को रिप्लेस करना बड़ी चुनौती नहीं है। समस्या यह है कि रूसी तेल कहां जाएगा। अगर चीन ज्यादा डिस्काउंट पर इसे ले लेता है तो भारत के लिए दूसरी सप्लाई फ्री हो सकती है। इससे बैलेंस बना रहेगा और कीमतें स्थिर रहेंगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो रूसी उत्पादन बाधित होगा और सप्लाई टाइट होने से कीमतें बढ़ सकती हैं।

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