चीन का मुकाबला करने के लिए पाताल से 'संजीवनी' लाएगा भारत, जानिए क्या है प्लान?

Updated on 01-08-2025 03:01 PM
नई दिल्लीरेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स की ग्लोबल सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है। उनसे भारत और दुनिया के कई देशों को इनकी सप्लाई रोक दी है या सीमित कर दी है। इससे इंडस्ट्री के लिए संकट पैदा हो गया है। अब भारत इस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए हाथपांव मार रहा है। कई तरह के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। इसमें समुद्र के भीतर रेयर अर्थ यानी दुर्लभ खनिजों की खोज और उत्खनन शामिल है। इसके लिए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अर्जी देने पर विचार कर रहा है।

मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक अरब सागर से रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स निकालने के लिए सरकार यूएन को अप्रोच करने पर विचार कर रही है। सरकार अरब सागर में 10 हजार वर्ग किमी एरिया में एक्सप्लोरेशन का अधिकार चाहती है और इसके लिए इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी को अप्रोच करने की तैयारी में है। साथ ही इन्हें निकालने और प्रोसेस करने की टेक्नोलॉजीज पर भी काम चल रहा है। इस कवायद का मकसद चीन पर निर्भरता कम करना है।

चीन पर कम होगी निर्भरता

मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंस को पहले ही बंगाल की खाड़ी में 0.75 मिलियन वर्ग किमी और अरब सागर में 10,000 वर्ग किमी एरिया अलॉट किया जा चुका है। भारत ने हिंद महासागर में सर्वे किया था और वहां उसे कोबाल्ट, निकल, कॉपर और मैगनीज के खनिज मिले हैं। मॉरीशस के पास भी समुद्र में कॉपर, कोबाल्ट, प्लेटिनम और गोल्ड पाया गया है। जानकारों का कहना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण को बचाते हुए इनको निकालने की है। इसके लिए भारत के पास अभी टेक्नोलॉजी नहीं है और इसे विकसित करने में कुछ समय लग सकता है।
भारत और चीन के साथ-साथ फ्रांस और साउथ कोरिया भी रेयर अर्थ को समुद्र की सतह से निकालने के लिए सुरक्षित तकनीक विकसित करने में लगे हैं। भारत के पास दुनिया का पांचवां बड़ा रेयर अर्थ भंडार है जो करीब 69 लाख टन का है। लेकिन रिफाइनिंग और मैग्नेट प्रॉडक्शन में भारत अभी बहुत पीछे है। अगर भारत इसका सही तरीके से फायदा उठाने में सफल रहा तो उसे चीन से आयात पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।


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