भोग आरामदायक हो सकता है, आनंददायक नहीं : मनीष सागरजी महाराज

Updated on 17-07-2025 01:51 PM

रायपुर। परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी श्री मनीष सागरजी महाराज ने बुधवार को धर्मसभा में कहा कि जैसी मति वैसी गति और जैसा भाव वैसा भव होता है। सदैव अपने मन के दया का भाव रखें। आप दिन भर न जाने कितने कर्म बंधन कर रहे हैं, क्योंकि जीवन बहुत क्षणभंगुर है। पता नहीं अगले पल क्या हो जाए। कोई रात में सोया और इस अवस्था में मृत्यु हो गई तो आप जैसे सोचते हुए गए, गति भी वैसी प्राप्त हो गई। इसलिए जागते हुए भी धर्म मत छोड़ो और सोते हुए भी धर्म मत छोड़ो। सोने के पूर्व सबसे क्षमा याचना कर लें। प्रार्थना करें कि देव, गुरु, धर्म से नाता न टूटे। हमेशा शुभ भावों के साथ नियमानुसार शयन करें। अंतिम क्षण में आप जैसा शुभ भाव रख कर सोते हैं,आपका दिमाग भी पॉजिटिव हो जाएगा। सारे विकार और दोष दूर हो जाएंगे। सुबह की शुरुआत भी शुभ भाव से करें। 

टैगोर नगर स्थित पटवा भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय भगवंत ने ज्ञाता धर्म कथा से चिंतन दिया कि सबसे अच्छा स्वाध्याय होता है खुद को समझना। हमें आज चिंतन करना चाहिए कि हमारे अंदर भोग की आसक्ति कितनी है, उसका विश्लेषण करना है। साथ ही क्या हम ऐसी जिंदगी जी सकते हैं कि हम सब के साथ रहे लेकिन भोगो पर आसक्त न हो। ऐसे प्रयास भी करना है। भोग अज्ञानी की दृष्टि में उपलब्धि है और ज्ञानी के दृष्टि में दुख का आमंत्रण है।यह दुखी करने वाली चीज है। अच्छा जीवन जीना है। आनंदमय जीवन जीना है तो कोई भी चीज कमजोरी ना बने। 

रिद्धि और सिद्धि में जीवन को गवाए बगैर आत्म शुद्धि के लिए पुरुषार्थ करना है। थोड़ा समय,थोड़ा पुरुषार्थ, थोड़ा पुण्य, थोड़े सहयोगी शुद्धि के लिए कर लेना ही महामुनि मेघकुमार का जीवन सभी के लिए सीख है।हम भले ही उनके जैसा नहीं बन पाए लेकिन दिल से चाह लें तो भी हम गुणों को ग्रहण कर सकते हैं। आदर्श पुरुष के जैसे बनने की चाह होनी चाहिए, नहीं तो जीवन में जैसे हैं वैसे ही रह जाएंगे।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि जीवन में भोग को करने में हम लग जाते हैं। भोग को ज्ञानियों ने दलदल बताया है। भोग की सच्चाई को जरूर समझना चाहिए। यह आकर्षण और आरामदायी हो सकता है लेकिन यह आनंद नहीं दे सकता,यह आनंद छीन लेता है। जिस चीज को हम चाहते हैं वही चीज बाद में हमें दुख देती है। भोग जितना फैला होता है हमारे बंधन उतने होते हैं। आपको भोग मानसिक व शारीरिक रोगी बना देता है। समझदारी है भोग यदि रोग बने उसका त्याग कर दो। भोग अज्ञानी की दृष्टि से उपलब्धि है व ज्ञानी की दृष्टि में दुखी करने वाली चीज है।



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