ईरान से जंग की ओर बढ़ रहे ट्रंप? मिडिल ईस्ट में अमेरिका का जंगी बेड़ा, एक्सपर्ट ने बताया बड़ा खतरा

Updated on 23-02-2026 12:28 PM
तेहरान: फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य जमावड़ा किसी सामान्य स्थिति का संकेत नहीं है। अमेरिकी प्रशासन और पेंटागन सूत्रों के हवाले से छपी कुछ खबरों के मुताबिक, हफ्ते के आखिर तक सैन्य कार्रवाई शुरू हो सकती है। संघर्ष की आशंका इसलिए है, क्योंकि पिछले दिनों कई फाइटर जेट को मध्य-पूर्व की ओर जाते हुए रेकॉर्ड किया गया। चूंकि इन फाइटर्स के साथ-साथ कई एरियल रिफ्यूलिंग टैंकर भी मिडल ईस्ट की ओर जाते देखे गए हैं, इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अमेरिका एक बड़े ऑपरेशन की तैयारी कर रहा है। उसने एयरक्राफ्ट कैरियर, क्रूजर और पनडुब्बियां भी इलाके में भेजे हैं।

होर्मुज का महत्व

ईरान भी इस समय दो मोर्चों पर काम कर रहा है। एक तरफ अमेरिका से बातचीत और दूसरी ओर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, फारस और ओमान की खाड़ी में नौसैनिक अभ्यास। ईरान इसे सैन्य तैयारी की जांच बता रहा है, लेकिन होर्मुज के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से बंद करना कुछ और ही संदेश देता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के तेल व्यापार का अहम रास्ता है। ऐसे में यहां होने वाली कोई भी नौसैनिक गतिविधि सीमित अर्थ और महत्व वाली नहीं हो सकती।

अमेरिका की मांग

बीती 17 तारीख को जब मध्य-पूर्व में अमेरिकी सेना की हलचल बढ़ रही थी और Strait of Hormuz में ईरान नौसैनिक अभ्यास कर रहा था, तब जिनेवा में दोनों देश कथित तौर पर शांति तलाश रहे थे। बातचीत के दौरान कुछ मुद्दों पर मतभेद भी सामने आए। इससे साफ है कि ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर चर्चा अभी बहुत नाजुक दौर में है। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अगर अमेरिकी मांगों को तेहरान नहीं मानता तो ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा। अमेरिका की मुख्य मांग यही है कि ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह बंद करे, जिसमें यूरेनियम एनरिचमेंट रोकना भी शामिल है।

मिसाइलों का मुद्दा

अमेरिका मानता है कि अगर ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट जारी रखता है तो वह न्यूक्लियर बम बनाने की क्षमता तक पहुंच जाएगा। बात यहीं तक सीमित नहीं। इजरायलअमेर के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगातार कोशिश में हैं कि ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को निर्णायक रूप से कमजोर किया जाना चाहिए। इन मिसाइलों का प्रमुख लक्ष्य तेल अवीव है। लेकिन, ईरान इस मांग को किसी कीमत पर स्वीकार करना नहीं चाहेगा। उसे पता है कि इस क्षमता के समाप्त होते ही वह कमजोर हो जाएगा और अमेरिका व इस्राइल मिलकर उसे खत्म कर देंगे।

ईरान का तर्क

अमेरिका यह भी चाहता है कि ईरान हिज्बुल्लाह, हूती जैसे प्रॉक्सी को समर्थन देना बंद करे। हालांकि तेहरान न्यूक्लियर संबंधी मुद्दे पर केंद्रित रहना चाहता है। उसका कहना है कि मिसाइल कार्यक्रम उसकी रक्षात्मक क्षमता से जुड़ा है, जबकि हिज्बुल्लाह व हूती क्षेत्रीय मुद्दे हैं। उसकी मांग है कि बदले में अमेरिका आर्थिक प्रतिबंध खत्म करे।

व्यापक होगा संघर्ष

ऐसा लगता है कि ईरान और अमेरिका ने अपनी-अपनी रेखाएं खींच रखी हैं। अगर सैन्य टकराव हुआ, तो परिणाम दूरगामी होंगे। अमेरिकी हमले की सूरत में इस्राइल और पश्चिम एशिया में मौजूद US सैन्य ठिकानों को ईरान भी नहीं छोड़ेगा। इन जगहों पर 30 से 40 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। माना जा रहा है कि इसी जोखिम की वजह से ईरान के आंदोलनकारियों को समर्थन देने से ट्रंप पीछे हट गए थे। तब ट्रंप हमला करना चाहते थे, पर पेंटागन तैयार नहीं था। क्या पेंटागन ने अब तैयारी पूरी कर ली है? मिडल ईस्ट में अमेरिकी डिफेंस परिदृश्य ऐसे ही संकेत दे रहे हैं।

सफलता पर संदेह

फिलहाल ऐसी जानकारी है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों ने ट्रंप को बता दिया है कि यदि सैन्य ऑपरेशन का उद्देश्य ईरानी नेतृत्व को बदलना है, तो सफलता की कोई गारंटी नहीं है। इससे सैन्य कार्रवाई सामरिक लक्ष्य से भटक कर राजनीतिक परिणामों की अनिश्चितता का शिकार हो जाएगी।

ट्रंप की इच्छा

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि सब कुछ ट्रंप की इच्छा पर निर्भर है और ईरान के विदेश मंत्री कह रहे हैं कि समझौते की दिशा में नई खिड़की खुली है। क्या उस खिड़की से व्यापक भू-राजनीतिक संतुलन, क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना और वैश्विक कूटनीति की विश्वसनीयता से जुड़े विषय भी नजर आ रहे हैं? क्या युद्ध का विनाशकारी इतिहास भी दिख रहा है?

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