लगा जैसे दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स का एग्जाम पास कर लिया... GST कट पर बोलीं सीतारमण

Updated on 06-09-2025 01:56 PM
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से देशवासियों को दिवाली गिफ्ट देने का वादा किया था। उन्होंने अपना वादा पूरा कर दिया है। जीएसटी काउंसिल ने अधिकांश चीजों पर टैक्स कम कर दिया है जो 22 सितंबर से लागू होगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नवभारत टाइम्स के साथ इंटरव्यू में कहा कि जीएसटी रेट घटाए जाने का फायदा आम लोगों और उपभोक्ताओं तक पहुंचे, इस पर सरकार नजर रखेगी। वित्त मंत्री ने साथ ही कहा कि इतने बड़े सुधार का काम पूरे होने पर उन्हें ऐसा लगा, जैसे उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स का एग्जाम सम्मानजनक तरीके से पास कर लिया है। पेश हैं इस बातचीत के मुख्य अंश:

स्लैब्स घटे हैं, प्रोसेस सरल बनाया गया है। यह काफी लंबी एक्सरसाइज रही होगी। यह काम कैसे हुआ?
यह काम कोई 10 दिनों पहले शुरू नहीं हुआ था। मंत्रियों के समूह का काम करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ था। रेट रेशनलाइजेशन कमेटी के पहले चेयरमैन कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई थे। उनका टर्म पूरा होने पर बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी चेयरमैन बने। जैसलमेर में जीएसटी काउंसिल की पिछली मीटिंग में भी कुछ चर्चा हुई थी, लेकिन उसके बाद कोई प्रगति नहीं हुई। जैसलमेर के पहले और बाद में इंश्योरेंस का मुद्दा भी था, जो संसद में भी आया।
इस तरह रेट रेशनलाइजेशन पर टुकड़ों टुकड़ों में काम हो रहा था। करीब 8 महीने पहले पीएम ने मुझसे पूछा कि जीएसटी में कुछ काम करेंगे? उन्होंने मुझसे ईज ऑफ कंप्लायंस के लिहाज से इस पर गौर करने को कहा। कंपनियों को फाइलिंग में बहुत दिक्कत थी, रजिस्ट्रेशन में काफी समय लगता था। जिस तरह उन्होंने इनकम टैक्स के बारे में कहा था, उसी तरह जीएसटी रेट्स के बारे में कहा था। यह जैसलमेर काउंसिल मीटिंग से पहले की बात है।
फिर बजट की तैयारी में टैक्स से जुड़े मसलों पर चर्चा के दौरान पीएम ने पूछा था कि डायरेक्ट टैक्स से जुड़े मुद्दों पर बात कर रहे हैं, आप उसमें भी कुछ कर रही हैं। उसके बाद मैंने बजट सेशन पूरा होने का इंतजार किया। उसके बाद इस पर काम शुरू किया। बजट पेश होने के दिन 1 फरवरी से मैं पूरी तरह इस पर जुट गई और जीएसटी के हर आइटम पर गहराई से विचार करना शुरू किया।
इन सुधारों में आपका फोकस किन चीजों पर था?
मेरा नजरिया बिल्कुल साफ था कि इस पर केवल रेवेन्यू के लिहाज से विचार नहीं किया जा सकता। इस पर गुड्स के ट्रेडिशनल अरेंजमेंट यानी चैप्टर्स, क्लासिफिकेशन वगैरह के लिहाज से भी गौर नहीं किया जा सकता। यह सब कॉमर्स के लिहाज से तो बहुत अच्छा है, लेकिन मेरी सोच यह है कि टैक्सेशन पर अलग नजरिए से विचार करना चाहिए। क्या हम एक तरह के गुड्स पर एक टैक्स लगा रहे हैं या अलग-अलग सेक्शन को अलग-अलग ट्रीटमेंट मिल रहा है? इस लिहाज से मैंने गुड्स की रीग्रुपिंग पर फोकस किया। इसका आधार बनाया कि इनमें अमीर हों या गरीब, उनके डेली यूज वाले आइटम कौन हैं। मिडल क्लास आइटम्स कौन से हैं यानी कि किसी के पास टीवी है, कार है, लेकिन वह बड़ा टीवी, बड़ी कार लेना चाहता है यानी एस्पिरेशनल आइटम्स।

इस तरह रीग्रुपिंग के लिए यूजर के नजरिए से गौर किया गया, न कि रेवेन्यू या ट्रेड के नजरिए से। हमने आम लोगों के लिहाज से सोचा। मिडल क्लास के लिहाज से सोचा, जो आगे बढ़ना चाहता है। किसानों के लिहाज से सोचा गया, जो हमारी इकॉनमी का बहुत अहम हिस्सा हैं। फिर एमएसएमई पर गौर किया गया, जो उपलब्ध कच्चे माल से उत्पादन करते हैं, लेकिन ऐसे कच्चे माल का भी उपयोग करते हैं, जिन पर इंटरनैशनल मार्केट में उतार-चढ़ाव का असर पड़ता है। फाइनल चीज देखी गई कि क्या इंडियन इकॉनमी में ऐसे अहम प्लेयर हैं, जिनकी राह एकोमोडेटिव टैक्स स्ट्रक्चर के जरिए आसान बनाई जा सकती है। इस तरह मैंने इन 5 पॉइंट्स के आधार पर रीग्रुपिंग की।

फिर मैं अधिकारियों से बार-बार सवाल करती रही कि किसी खास ग्रुप का टैक्स ट्रीटमेंट एक जैसा क्यों नहीं हो सकता। क्यों न कुछ चीजों को जीरो में ले जाया जाए? ब्यूरोक्रेसी की अपनी चिंताएं होती हैं, लेकिन नेता के रूप में काम करते वक्त हम सिर्फ पब्लिक को ध्यान में रखकर कदम उठाते हैं। इसलिए मैंने बार-बार सवाल किए। कहती रही कि समस्या नहीं, समाधान लेकर आएं। सॉल्यूशन टिकाऊ है या नहीं, क्या यह प्रावधान कोर्ट में सही साबित होगा। इस तरह एक-एक बिंदु पर मैंने गहराई से विचार किया।ईमानदारी से कहूं तो बहुत मेहनत हुई, लेकिन यह काम पूरा होने पर ऐसा लगा, जैसे मैंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स का एग्जाम सम्मानजनक तरीके से पास कर लिया। यह काम पूरा करने पर मुझे बहुत संतोष है। एक नई ऊर्जा महसूस हो रही है।

क्या रेट में बदलाव पर सवाल उठे?
मैंने किसी एक कैटिगरी में सेम रेट रखने के मुद्दे पर विचार किया। मैंने सवाल किया कि 12% रखने का क्या औचित्य है? तब देखा गया कि 67% रेवेन्यू 18% से आता है। हमने देखा कि क्या वहां ऐसे आइटम हैं, जिनको इसमें होना चाहिए। उनको हटाकर 5% में होना चाहिए। इसी तरह मैंने देखा कि 12% स्लैब से करीब 7% रेवेन्यू आता है। यहां से कुछ चीजों को 5 और 18% में डाला गया। काफी बड़ा हिस्सा 5% स्लैब में आ गया। इस पर किसी को ऐतराज नहीं हुआ। सबने सहमति जताई। यही वजह है कि आज 99% आइटम्स या तो जीरो या 5% या 18% में हैं।

इससे क्या फर्क पड़ेगा?
अब मेरिट और स्टैंडर्ड, दो रेट होंगे। इसी के बीच में करना होगा। आपको लग रहा है कि इसमें ज्यादा टैक्स ले सकते हैं तो 18% में रख दो और कम में आना है तो 5% में रख दो। इस तरह की जो प्रेडिक्टिबिलिटी आई है, यह जीएसटी के लिए बड़ी चीज होगी। कोई आइटम 40% में जाएगा ही नहीं क्योंकि जब तक वह डीमेरिट गुड्स न हो, तब तक ऐसा नहीं होगा। टोबैको में ही कुछ दूसरा आ रहा हो, तो जाएगा। इसमें बारगेन करने के लिए कुछ बचा नहीं है।

चैप्टराइजेशन का मामला तो ट्रेड से जुड़ी ग्रेडिंग के लिए है। किसी दूसरे देश के साथ अलाइन करने के लिए है, नहीं तो निर्यात में असर पड़ता है। उनके लिए काम की चीज है वह। जनता की जरूरत की चीज नहीं है। इसलिए मैंने पूरी चीज को बिल्कुल अलग नजरिए से देखा। इसमें काफी समय भी लगा। 1 फरवरी 2025 से मई के मध्य तक, मैंने इसे पूरा किया। तब मैंने सोचा कि पीएम को मैं पूरे कॉन्फिडेंस से बता सकती हूं कि इस तरह का प्रस्ताव मैंने क्यों दिया। मेरा फ्रेमवर्क तैयार है और उसका एक्सप्लैनेशन भी तैयार है। कौन सा आइटम कहा जाएगा, उसका खुद मैंने अध्ययन किया है। इस तरह प्रस्ताव आगे बढ़ा और मीटिंग में गया।

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