खड़गे का राष्ट्रपति को पत्र- सैनिक स्कूलों का निजीकरण रोकें

Updated on 11-04-2024 11:47 AM

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुधवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर सैनिक स्कूलों के निजीकरण के केंद्र सरकार के फैसले पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि NGO और प्राइवेट संस्थानों के साथ पार्टनरशिप मोड में सैनिक स्कूलों को चलाने का सरकार का फैसला दिखाता है कि सरकार इन स्कूलों का राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है। इस फैसले को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।

खड़गे ने अपने पत्र में एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि नए सैनिक स्कूलों को लेकर जो 40 मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग फाइनल किए गए हैं, उनमें से 62% ऐसे स्कूलों के साथ साइन किए गए हैं, जिनका संचालन RSS-भाजपा और संघ से जुड़े लोग कर रहे हैं।

इससे पहले केंद्र सरकार ने 2 अप्रैल को इस मीडिया रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। रक्षा मंत्रालय ने कहा, ‘सैनिक स्कूलों को लेकर प्रेस में कुछ आर्टिकल छपे हैं। ये दावे बेबुनियाद हैं। हमें 500 से ज्यादा एप्लिकेशन मिली थीं, जिसमें से अब तक हमने 45 स्कूलों के आवेदन को मंजूरी दी है।

खड़गे के पत्र की प्रमुख बातें...

1. खड़गे ने लिखा कि आप इस तथ्य की सराहना करेंगीं कि सेना को राजनीति से दूर रखने का फैसला ऊंचे लोकतांत्रिक मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर किया गया था। यही वजह थी कि जब दुनियाभर में सैन्य हस्तक्षेप के चलते सरकारें गिर रही थीं तो, भारत में लोकतंत्र प्रगति करता रहा।

2. इस मामले में, मैं आपको बताना चाहता हूं कि RTI इन्क्वायरी पर आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि नए पीपीपी मॉडल का उपयोग करके आपकी सरकार ने सैनिक स्कूलों की निजीकरण की शुरुआत की है। इसके चलते अब 62% स्कूलों का मालिकाना हक BJP-RSS नेताओं के पास आ गया हैं।

3. देश में 33 सैनिक स्कूल हैं। ये स्कूल रक्षा मंत्रालय (MoD) के अधीन आने वाली स्वायत्त संस्था सैनिक स्कूल सोसाइटी (SSS) के तहत संचालित होते हैं। इनकी पूरी फंडिंग सरकार करती है।

4. 2021 में, केंद्र सरकार ने सैनिक स्कूलों की निजीकरण की शुरुआत की। नतीजतन, इस मॉडल पर आधारित 100 नए स्कूलों में से 40 के लिए समझौते (MoUs) हस्ताक्षर किए गए हैं। इस मॉडल के तहत केंद्र सरकार मेरिट और जरूरत के आधार पर क्लास 6 से 12 तक हर क्लास के 50% छात्रों (50 छात्रों तक) को 50% फीस (40 हजार रुपए तक) की सालाना मदद देगी। इसका मतलब ये है कि एक स्कूल जहां 12वीं तक क्लासेस हैं वहां सैनिक स्कूल सोसाइटी अन्य फायदों के साथ सालाना अधिकतम 1.2 करोड़ रुपए की मदद मुहैया कराएगी।

5. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि नए सैनिक स्कूलों को लेकर जो 40 मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग फाइनल किए गए हैं, उनमें से 62% ऐसे संस्थानों के साथ साइन किए गए हैं, जिनका संचालन RSS-भाजपा और संघ से जुड़े लोग कर रहे हैं। इनमें एक मुख्यमंत्री का परिवार, विधायक, भाजपा के पदाधिकारी और RSS नेता शामिल हैं।

6. सरकार का ये कदम लंबे समय से चली आ रही उस परंपरा का उल्लंघन करता है, जिसके तहत सेना और उससे जुड़े संस्थानों को राजनीति और राजनीतिक विचारधाराओं से दूर रखा जाएगा। ये स्कूल नेशनल डिफेंस एकेडमी और इंडियन नेवल एकेडमी के लिए भविष्य के कैडेट तैयार करने का काम करते हैं। सैनिक स्कूलों की स्थापना देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने 1961 में की थी, और तब से ही ये सैन्य नेतृत्व और उत्कृष्टता का प्रतीक बने हुए हैं।

7. यह कोई हैरान करने वाली बात नहीं है कि केंद्र सरकार ने इस स्थापित परंपरा को तोड़ दिया है। तेजी से अपनी आइडियोलॉजी थोपने की RSS की इस योजना के तहत पहले ही देश के एक से बढ़कर एक संस्थानों को खोखला किया जा चुका है। अब इस कड़ी में आर्म्ड फोर्सेस के स्वभाव और नैतिकता को भी गहरा धक्का दे दिया गया है। सैनिक स्कूलों में किसी एक विचारधारा की शिक्षा मुहैया कराने से न सिर्फ समावेशिता खत्म होगी, बल्कि राजनीतिक, धार्मिक, व्यावसायिक, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सिद्धांतों के जरिए सैनिक स्कूलों का राष्ट्रीय किरदार भी नष्ट हो जाएगा।

8. इसलिए मेरी आपसे मांग है कि इस निजीकरण की पॉलिसी को पूरी तरह वापस लिया जाए और इन MoU को निरस्त किया जाए, ताकि आर्म्ड फोर्सेस स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे वह किरदार, नजरिया और सम्मान बनाए रखे, जो देश की सेवा करने के लिए जरूरी है।


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