अडानी के प्लांट को नहीं मिल रहा कच्चा माल

Updated on 25-11-2025 01:45 PM
नई दिल्ली: भारत और एशिया के दूसरे बड़े रईस गौतम अडानी का गुजरात में 1.2 अरब डॉलर का कॉपर स्मेल्टर (तांबा गलाने का प्लांट) कच्चे माल की भारी कमी से जूझ रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्लांट को पूरी क्षमता से चलने के लिए जरूरी कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है। इसकी क्षमता 500,000 टन की है लेकिन इसे बहुत कम कच्चा माल मिल रहा है। इसकी वजह यह है कि दुनिया भर में तांबे की सप्लाई में कमी आई है। अडानी की कंपनी कच्छ कॉपर लिमिटेड ने जून में तांबा बनाना शुरू किया था। उसे जरूरी कच्चे माल का दसवें हिस्सा भी नहीं मिल पाया है। यह जानकारी कस्टम डेटा से मिली है।

अक्टूबर तक कंपनी ने करीब 147,000 टन कॉपर कन्सेंट्रेट आयात किया। वहीं, इसी अवधि में हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने 10 लाख टन से थोड़ा ज्यादा खरीदा। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस स्मेल्टर को पूरी क्षमता से चलाने के लिए लगभग 1.6 मिलियन टन कॉन्सेंट्रेट की जरूरत है। अडानी समूह को भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं मिला। इस साल दुनिया भर के कॉपर स्मेल्टरों की सप्लाई कई खदानों में आई रुकावटों की वजह से प्रभावित हुई है।

कम मुनाफा

फ्रीपोर्ट-मैकमोरन इंक, हडबे मिनरल्स इंक, इवानहो माइंस लिमिटेड और चिली की सरकारी कंपनी कोडेलको जैसी बड़ी खदानों में भी दिक्कतें आई हैं। इसके अलावा, चीन अपने स्मेल्टरों की क्षमता लगातार बढ़ा रहा है। इससे दूसरे देशों के स्मेल्टरों के मुनाफे पर असर पड़ा है और कुछ उत्पादकों को उत्पादन कम करना पड़ा है या कारखाने बंद करने पड़े हैं। इसी वजह से, ट्रीटमेंट और रिफाइनिंग चार्ज इस साल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। इसका मतलब है कि स्मेल्टर कच्चा माल हासिल करने के लिए बहुत कम मुनाफा लेने को भी तैयार हैं।
कच्छ कॉपर अगले चार साल में अपनी सालाना क्षमता को दोगुना करके 1 मिलियन टन करने की योजना बना रही हैं। लेकिन सप्लाई की कमी का मतलब है कि उसे प्लांट चलाने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। साथ ही, प्लांट को पूरी क्षमता तक पहुंचाने में और भी ज्यादा समय लगेगा। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के एनालिस्ट ग्रांट स्पोरे ने कहा कि अडानी का स्मेल्टर नया है और इसलिए कई पुराने स्मेल्टरों से ज्यादा एफिशिएंट होना चाहिए। शुरुआत में स्मेल्टर घाटे में भी चल सकता है।

कहां से मिली सप्लाई

उन्होंने यह भी कहा कि भारत अपनी इंडस्ट्रीज को बचाने के लिए ज्यादा टैरिफ भी लगा सकता है। कस्टम डेटा के अनुसार, बीएचपी ग्रुप ने इस स्मेल्टर को 4,700 टन सप्लाई की है, जबकि बाकी शिपमेंट ग्लेंकोर पीएलसी और हडबे से आए हैं। कच्छ कॉपर की धीमी शुरुआत इस बात की याद दिलाती है कि भारत को अपनी धातुओं में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों में कितनी मुश्किलें आ रही हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर, बिजली और निर्माण क्षेत्रों की मांग बढ़ रही है जबकि सप्लाई सीमित है।

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