आचार्य विद्यासागर का अंतिम प्रवचन : कहा जो पुण्य अर्जित किए प्रभु चरणों में विसर्जित, कोई इच्छा नहीं

Updated on 21-02-2024 01:53 PM

आचार्य विद्यासागर जी महाराज 17 फरवरी को रात 2:35 बजे महा समाधि में लीन हो गए। इनके अंतिम प्रवचन का वीडियो सामने आया है। इसमें उन्होंने प्रभु और अपने गुरू को याद किया है। वहीं उनकी अस्थियों के संकलन के बाद कलश को समाधि कक्ष में रखा गया है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने आखिरी प्रवचन में कहते हैं कि, प्रभु अंतिम समय में आपसे हम कोई भी प्रार्थना नहीं करते हैं। अंतिम समय में प्रभु नाम निकलता रहे, इसके अलावा और कोई भी इच्छा नहीं है। यह प्रवचन श्री आचार्य ने 17 फरवरी को ही रात 8 बजे दिया था।

जीवन में जो पुण्य अर्जित किया, वो सब ईश्वर चरणों में विसर्जित है
प्रवचन में आगे आचार्यश्री कहते हैं कि, जीवन में जो भी पुण्यार्जन हुआ, उस सबसे मुझे कोई भी वास्ता नहीं है। सब नश्वर है, किंतु उस पुण्य से जो बंधा हुआ है, वो सारा का सारा आपके चरणों में विसर्जित हो। वो मेरे कर्मों को प्रशस्त करे।

उन्होंने कहा कि ये कंठ जो अभी बोलने में सक्षम नहीं रहा, फिर भी आपका नाम स्मरण करने से उसमें थोड़ी सी शक्ति आ जा रही है। सूर्य या दिवाकर के ऊपर घटाएं आती हैं, फिर खिसक जाती हैं। ऐसा ही हाल अपने कर्मों का भी पास है।

बस मुझे धैर्य दो, दृढ़ता के साथ शेष जो कुछ भी है, आपकी आराधना के साथ वो क्षण निकले। उन्होंने कहा कि यहां का मंगल पाठ वहां तक भी आ रहा है। मैं यहां पर भी बैठा रहा, सुनता रहा, लगा प्रभु निकट ही हैं।

प्रभु के साथ हम भी बैठे हैं। वो ऊपर बैठे हैं और उनके चरणों में हम बैठे हैं। ऐसा ही दृश्य बना रहे, ये स्मृति बनी रहे। बाकी संसार की सारी चीजों की विस्मृति रहे। शरीर में शिथिलता है, लेकिन अंदर से यथावत गुरु के वचन से स्मृति पटल पर अंकित है। जैसे हम प्रशस्ति पढ़ते हैं, वैसे ही स्मृति पटल पर अंकित है। गुरु को नमस्कार हो, गुरु के भी गुरु को नमस्कार हो, प्रभु ही प्रभु दिखें।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने इन पंक्तियों से अपना प्रवचन खत्म किया...

''गुरु ने मुझे गुरु समय दिया

गुरु ने मुझे गुरु समय दिया

लघु बनने के लघु बनने

गुरु ने मुझे गुरु समय दे दिया''

चंद्रगिरी तीर्थ में ली थी अंतिम सांस

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने 17 फरवरी को छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी तीर्थ में अंतिम सांस ली थी। उन्होंने 3 दिन से उपवास धारण कर रखा था। महा समाधि में प्रवेश करने से पहले सिर्फ ‘ॐ’ शब्द कहा। सिर हल्का सा झुका और महा समाधि में लीन हो गए।

ये बात 20 साल से आखिरी क्षण तक आचार्यश्री के साथ रहे बाल ब्रह्मचारी विनय भैया ने बताई। इससे पहले 6 फरवरी को उन्होंने मुनि योग सागर जी से चर्चा करने के बाद आचार्य पद का त्याग कर दिया था। उन्होंने मुनि समय सागर जी महाराज को आचार्य पद देने की घोषणा भी कर दी थी।

25 फरवरी को देश भर में सामूहिक विनयांजलि
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अस्थियों का मंगलवार को संकलन करने के बाद कलश समाधि कक्ष में उनकी तस्वीर के सामने रखा गया है। इसी कक्ष में आचार्य श्री महा समाधि में लीन हुए थे। वहीं 25 फरवरी को पूरे देश में सामूहिक गुरु विनयांजलि का आह्वान किया गया है।

प्रज्ञा गिरी तीर्थ क्षेत्र में रोजाना बड़ी संख्या में आचार्यश्री के शिष्यों के अलावा धर्मावलंबियों की संख्या बढ़ रही है। आने वाले आयोजनों की भी तैयारी की जा रही है। तीर्थक्षेत्र के अनुसार सभी जनप्रतिनिधि, जैन-जैनेतर गणमान्य नागरिकों सहित सर्वधर्म समाज उपस्थित रहेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्याह्न 1 बजे से अपने-अपने नगर के तय प्रमुख स्थल पर कार्यक्रम को भव्यता पूर्वक आयोजित करेंगे।

गुरु प्रेम: समाधि स्थल की भभूत लगा रहे माथे से
हर अनुयायी समाधि स्थल की भभूत माथे से लगाकर अपने साथ ले जा रहे हैं। संघ के प्रज्ञा गिरी तीर्थ के प्रकाश जैन पप्पू ने बताया कि यह क्रिया 22 फरवरी तक लगातार जारी रहेगी। 22 फरवरी को भावी आचार्यश्री समय सागर जी गुरुवर के आने के बाद आगे के कार्यक्रम निर्धारित किए जाएंगे।

मुनि समय सागर महाराज को गद्दी सौंपी जाएगी
आचार्य विद्यासागर जी ने 6 फरवरी को मुनि योग सागर से चर्चा करने के बाद आचार्य पद का त्याग कर दिया था। उन्होंने मुनि समय सागर जी महाराज को आचार्य पद देने की घोषणा की थी। मुनि समय सागर महाराज के चंद्रगिरी तीर्थ पहुंचने के बाद विधिवत तरीके से उन्हें आचार्य की गद्दी सौंपी जाएगी।

विद्यासागर जी के उत्तराधिकारी बनाए गए मुनि समय सागर महाराज मंगलवार को महाराष्ट्र के रावल वाड़ी पहुंच गए। वे 43 साधुओं के साथ पैदल यात्रा कर 22 फरवरी को बालाघाट से डोगरगढ़ पहुंचेंगे। वहां उन्हें विधिवत रूप से आचार्य की गद्दी सौंपी जाएगी।

1946 में कर्नाटक में जन्म, 1972 में अजमेर में दीक्षा
आचार्य विद्यासागर महाराज का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को शरद पूर्णिमा को कर्नाटक के बेलगांम जिले के सद्लगा ग्राम में हुआ था। उन्हें आचार्य श्री ज्ञान सागर महाराज ने 22 नवंबर 1972 को राजस्थान के अजमेर में आचार्य पद की दीक्षा दी थी।

आचार्य बनने के बाद पहली दीक्षा भाई को दी थी
आचार्य बनने के बाद विद्यासागर जी ने 8 मार्च 1980 को छतरपुर में मुनि श्री समय सागर महाराज को पहली दीक्षा दी। इसके बाद सागर जिले में योग सागर और नियम सागर महाराज को दीक्षित किया। समय सागर और योग सागर उनके गृहस्थ जीवन के भाई हैं। उनकी दो बहनें शांता और सुवर्णा भी दीक्षा ले चुकी हैं।



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