जाति के नाम पर मंडल VS कमंडल वाला खेला फिर होने वाला है? इस चुनाव बिहार में गजब के समीकरण की तैयारी

Updated on 10-10-2023 12:45 PM
पटना : बिहार में जातिगत जनगणना के जरिए एक बार फिर से पूरे देश में मंडल और कमंडल की राजनीति की शुरुआत कर दी गई है। अब पूरे देश में कास्ट सेंशस की मांग उठने लगी है। एक बार फिर से जातियों के बीच शुरुआती तनाव देखने लगा है। लोग फिर से एक दूसरे को मजाक में ही सही जाति और उनकी हिस्सेदारी बताने लगे हैं। जातियों से संबोधित कर एक दूसरे से बात करते नजर आ रहे हैं। सार्वजनिक जगहों पर जातियों पर बहस भी छिड़ती नजर आ रही है। यह बहस अभी शुरुआती दौर में है। लेकिन आने वाले वक्त में बहस पर तलवारें खींचती नजर आएंगी। दरअसल, समाज में वह लोग जो पीछे गए, वो अपने आपको ठगा हुआ महसूस करते हैं। लेकिन अब वह लोग, जिन्होंने अपनी जनसंख्या कम कर अपनी आबादी को नियंत्रित किया वो ठगे महसूस कर रहे हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार के कास्ट सर्वे से राज्य में घमासान तेज होगा।


बिहार फिर 'जात' वाली पॉलिटिक्स

जातीय घमासान टालने को लेकर दुनिया भर में समाजवादी आंदोलन हुए। हालांकि, यह लड़ाई बिहार में अमीर और गरीब की नहीं बनी। ये लड़ाई हमेशा जात की रही। अमीर और गरीब की लड़ाई की आड़ में बिहार में जातियों को जिंदा जरूर रखा गया। बिहार में 'जात' वाली भावना बीते 18 सालों में कम होने लगी थी। जिसका नतीजा यह रहा कि लालू लंबे समय तक सत्ता से दूर रहे। एक बार फिर से उनकी मंशा बिहार पर राज करने की है।

क्या बिहार के साथ फिर हो रहा सियासी 'गेम'?

लालू प्रसाद यादव की कोशिश है कि एक बार फिर से बिहार की कुर्सी अपने कब्जे में की जाए। लेकिन लालू प्रसाद यादव की राजनीति से पूरा सूबा वाकिफ है। सवाल उठता है कि सत्ता हासिल करने के लिए क्या साजिश के तहत जातीय जनगणना की प्रयोगशाला बनाया गया है। एक बार फिर से बिहार में 80 और 90 के दशक का राजनीतिक षड्यंत्र नए संस्करण में पेश कर दिया गया है? इस साजिश के तहत एक बार फिर से एक ही धर्म के मानने वाले लोगों को 72 तरह की जातियों में बांट दिया गया। जिसका राजनीतिक लाभ लिया जा सके। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए जातिगत गणना करा के इस साजिश का पहला दांव चला गया। दूसरा दांव इस की रिपोर्ट सार्वजनिक कर चला गया। जातिगत जनगणना के पीछे मूल उद्देश्य जातियों की आर्थिक स्थिति का पता लगाना था, ताकि उनका आर्थिक विकास किया जा सके। लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के विकास और उत्थान का उद्देश्य राजनीतिक दलों का कभी रहा ही नहीं। जिसका परिणाम यह था कि जाति आधारित जनगणना की रिपोर्ट पेश कर दी गई। वहीं आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट कब आएगी यह नहीं कहा जा सकता।

राजनीतिक दलों ने ऐसे लिया जातियों का लाभ

भारतीय समाज के जातियों की भावना भड़का कर सबसे पहले लाभ कांग्रेस ने देश स्तर पर लिया। वहीं तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से देश कमजोर हुआ। देश के भीतर नक्सलियों ने नरसंहार किया। वहीं, मुस्लिम पुष्टिकरण के नाम पर कश्मीर में उग्रवाद पनपा। कश्मीर की खूबसूरत वादियां जहन्नुम बन गई। बिहार, झारखंड उड़ीसा छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश महाराष्ट्र जैसे राज्य नक्सल की चपेट में आए। हक दिलाने के नाम पर शुरू हुई सियासत का दूसरा संस्करण बिहार में लालू प्रसाद यादव की राजनीति में देखने को मिला। जिसका नतीजा सूबे को भुगतना पड़ा। जातियों को बांटकर लालू प्रसाद यादव ने लंबे समय तक बिहार में अपना राज कायम रखा। इस राजनीति का दूरगामी परिणाम यह हुआ कि बिहार अन्य राज्यों की अपेक्षा सबसे पिछड़ा हुआ राज्य बन गया।

जब बिहार में शुरू हो गए थे नरसंहार

बिहार में सर्वहारा वर्ग शोषितों को न्याय दिलाने के नाम पर नक्सलियों ने पांव पसारा। नतीजा यह हुआ कि बिहार में निजी सेनाएं बनने लगीं। सवर्णों ने अपनी जमीन बचाने के लिए हथियार उठाए। हथियार खरीदे जाने लगे, सोना बेचकर लोहा खरीदने का संदेश दिया गया। और इसके साथ एक ही धर्म को मानने वाले लोगों के खून से बिहार में नरसंहार का इतिहास लिखा जाने लगा। बिहार में 90 के दशक में जन्मे लोगों को आज भी वह पुरानी यादें ताजा हैं। तब अखबारों के पहले पन्ने पर नरसंहार की तस्वीर होती थी। कानून ताक पर होता था। इन्हीं संघर्षों ने बिहार को प्रवासी मजदूरों की संज्ञा दे दी। बिहार के लोगों की पहचान मजदूर और प्रवासियों की हो गई।

बिहार की प्रयोगशाला में जाति जनगणना का परीक्षण

लालू युग के अंत के बाद लगभग 20 सालों के नीतीश काल में बिहार ने बड़ा बदलाव देखा। यह भावना जाति से अधिक बिहारी होने के गर्व की तरफ बढ़ने लगी थी। जाति को लेकर एक दूसरे को दिए संघर्षों के घाव अब भरने लगे थे। सबसे पहले लोगों ने जाति से ऊपर उठकर बिहार को वोट देना शुरू किया। उसके बाद बिहार ने देश को ध्यान में रख कर वोट करना शुरू किया। इसे समझने के लिए पिछले 20 साल के वोटिंग के पैटर्न को देखकर समझ जा सकता है। इसका पहला असर बिहार में नीतीश कुमार की लगातार जीत के रूप में दिखाई दिया।


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