एमपी का व्यापमं घोटाला फिर चर्चा में, सुप्रीम कोर्ट ने CBI और राज्य शासन से मांगा विस्तृत जवाब

Updated on 27-03-2026 11:48 AM

भोपाल। पीएमटी सहित अन्य परीक्षाओं में फर्जीवाड़े के चलते लगभग 13 वर्ष पहले बदनाम हुआ मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) का घोटाला फिर चर्चा में आ गया है। इन्हीं फर्जीवाड़ों में मामले के व्हिसिल ब्लोअर और पूर्व विधायक पारस सकलेचा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और राज्य शासन को जांच और चार्जशीट की स्पष्ट जानकारी विस्तार से उल्लेख करते हुए शपथ पत्र सहित दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई 23 मार्च को हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मामले में आरोपित या संदिग्ध रहे कई बड़े लोगों की धड़कन बढ़ गई है। कारण, नए सिरे से जांच होती है तो वे घिर सकते हैं।

16 अप्रैल को होगी अगली सुनवाई

बता दें कि सकलेचा ने सबसे पहले वर्ष 2014 में 300 से अधिक पेज की शिकायत एसटीएफ और सीबीआई को की थी। जांच नहीं होने पर उन्होंने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में याचिका लगाई, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल 2026 को होगी। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा, विपुल तिवारी तथा इंद्रदेव सिंह ने पक्ष रखा। उल्लेखनीय है कि सबसे पहले पीएमटी परीक्षा 2013 में गड़बड़ी के साथ यह मामला सामने आया था। परीक्षा में मूल उम्मीदवारों की जगह मुन्नाभाइयों ने परीक्षा दी थी।

एसटीएफ से सीबीआई तक की पूरी प्रक्रिया

तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मामले की जांच एसटीएफ को सौंपी थी। बाद में व्हिसिल ब्लोअर्स की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंप दी थी। इसमें तत्कालीन शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, व्यापमं के बड़े अधिकारी, कॉलेज संचालक, दलाल, सॉल्वर और अभ्यर्थी आरोपित बनाए गए। गिरफ्तारी भी हुई। एक के बाद एक परीक्षाओं की जांच में वर्ष 2007 तक पीएमटी परीक्षा में गड़बड़ी सामने आई थी। इसके अतिरिक्त पुलिस आरक्षक, परिवहन आरक्षक, संविदा शिक्षक भर्ती परीक्षा सहित अन्य परीक्षाओं में गड़बड़ी पकड़ी गई थी। अकेले पीएमटी परीक्षा में लगभग 900 अभ्यर्थियों ने फर्जीवाड़ा किया था, जिनमें सर्वाधिक 300 से अधिक वर्ष 2013 की पीएमटी में पकड़ाए थे।

शिकायत में उठाए गए मुख्य सवाल, बड़े रसूखदारों को बचाने का आरोप

याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत में निम्न सवाल उठाए हैं...

  • छोटे लोगों को आरोपित बनाया जैसे अभ्यर्थी, उनके भाई-बहन आदि को, पर कई बड़े लोगों जैसे संबंधित विभागों के अधिकारियों, निजी कॉलेज संचालकों से पूछताछ नहीं की।
  • निजी मेडिकल कॉलेजों को पार्टी नहीं बनाया गया।
  • व्यापमं के कई अधिकारियों को पार्टी नहीं बनाया गया।
  • 2009 से 2012 तक पीएमटी परीक्षा में फर्जीवाड़ा करने वाले निजी कॉलेजों के कई विद्यार्थियों पर कार्रवाई नहीं हुई।

नौ वर्ष की लंबी प्रतीक्षा, कार्रवाई न होने पर कोर्ट की शरण

व्यापमं की पीएमटी परीक्षा एवं अन्य परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर एसटीएफ द्वारा 27 नवंबर 2014 को समाचार पत्रों में जारी विज्ञापन पर पारस सकलेचा ने दस्तावेज सहित शिकायत 11 दिसंबर 2014 को प्रस्तुत की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा जून 2015 में व्यापमं घोटाले की जांच सीबीआई से कराने के आदेश दिए तो सकलेचा ने 14 जुलाई 2015 को सीबीआई के दिल्ली मुख्यालय को दस्तावेज सहित 320 पेज की शिकायत प्रस्तुत की। सीबीआई ने फरवरी 2016 में तथा एसटीएफ ने फरवरी 2015 और जून 2015 में शिकायतकर्ता के बयान दर्ज किए।इसके बाद सीबीआई ने 27 मई 2015 को शिकायत आगे की कार्रवाई के लिए मुख्य सचिव को भेज दी। उधर, एसटीएफ ने 22 जून 2015 को प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा को पत्र लिखकर 14 बिंदुओं पर जवाब मांगा। एसटीएफ ने 11 सितंबर से 13 सितंबर 2019 तक पुनः उनके बयान लिए। इसके बाद सकलेचा ने सीबीआई, एसटीएफ और मुख्य सचिव द्वारा कोई कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाते हुए 2023 में हाई कोर्ट में याचिका लगाई, जिसे अप्रैल 2024 में कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सकलेचा प्रभावित पक्ष नहीं हैं।


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