नई दवाएं ICU में बेअसर, पुरानी एंटीबायोटिक पर लौटे डॉक्टर:खत्म नहीं हो रहा बैक्टीरिया

Updated on 15-09-2025 12:16 PM

आईसीयू में मौजूद क्रिटिक मरीज से लेकर कई सामान्य मरीज सही इलाज के बावजूद ठीक नहीं हो रहे, क्योंकि दवाओं का असर घट रहा है। यह स्थिति एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंस (AMR) की वजह से है। जो पूरी दुनिया में चिकित्सा विज्ञान के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

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यह कहना है एलएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. डीपी सिंह का। उन्होंने कहा कि नए डॉक्टरों में मरीजों के प्रति स्नेह और मानवीय व्यवहार की कमी दिखने लगी है। मरीज और उनके परिजन में भी धैर्य की कमी है। जिससे अस्पतालों में विवाद की घटनाएं बढ़ी हैं।

दरअसल, भोपाल में 14 सितंबर को राष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन का आयोजन किया गया। 'आधुनिक चिकित्सा: चुनौतियां और समाधान' विषय पर चर्चा के लिए देशभर के 100 डॉक्टर, रिसर्चर और स्पेशलिस्ट शामिल हुए थे।

विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि लोगों को विटामिंस और मिनरल्स दवाओं के तौर पर लेने पड़ रहे हैं। इससे एक हजार करोड़ रुपसे अधिक का कारोबार सिर्फ विटामिन, मिनरल और न्यूट्रिशनल सप्लीमेंट्स का हो गया है।

विशेषज्ञों ने डॉक्टरों की नई पीढ़ी की चुनौतियों पर भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि कई तरह के बैक्टीरिया को खत्म करने में असरदार मेरोपेनम, पेनिसिलिन, अमॉक्सीसिलिन जैसी दवाएं अब आईसीयू में भी बेअसर साबित हो रही है। जबकि कभी बेअसर साबित हो चुकी सेपटोन और क्लोरोफेनिकोल अब दोबारा असर दिखाने लगी है। जिससे उन्हें डॉक्टर लिखने लगे हैं।

एक्सपर्ट ने बताया, इसलिए दवाएं हो रहीं बेअसर डॉ. डीपी सिंह ने बताया- एंटीबायोटिक्स का प्रयोग बैक्टीरिया से होने वाले इन्फेक्शन के इलाज में होता है। यह बैक्टीरिया के स्ट्रक्चर और फंक्शन को टारगेट करती हैं। लेकिन शरीर में बार बार एंटीबायोटिक पहुंचने से शरीर में दवा के प्रति ही एंटी रजिस्टेंस पैदा हो जाता है। जिससे दवा का असर खत्म हो जाता है।

ऐसे में जरूरी है कि आम लोगों के साथ अस्पतालों में भी एंटीबायोटिक पॉलिसी का सख्ती से पालन हो। डब्लूएचओ के अनुसार एएमआर के चलते हर साल 50 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यही हाल रहा तो साल 2050 तक मौत का आंकड़ा 1 करोड़ के पार चला जाएगा।

चिकित्सा जगत के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि पिछले 30 साल में नई एंटीबायोटिक्स की केवल दो ही क्लास सामने आई हैं। यानी मरीजों के इलाज के लिए विकल्प बेहद सीमित हैं।

डॉ. डीपी सिंह ने कहा कि आईसीयू में जब गंभीर मरीज भर्ती होते हैं, तो हमारे पास आधुनिक उपकरण और इलाज की व्यवस्था होती है। लेकिन जब दवा ही असर न करे तो मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है।



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