'रतन' के जाने से टाटा ग्रुप में मचा है घमासान, आखिर कौन है इस पूरे विवाद का 'मिस्त्री'?

Updated on 13-10-2025 01:13 PM
नई दिल्ली: टाटा ट्रस्ट्स में सबकुछ ठीक नहीं है। हाल के दिनों में इसमें अंदरूनी मतभेद सामने आए हैं। खासकर टाटा संस के बोर्ड में मेहली मिस्त्री के नामांकन को लेकर ट्रस्टियों में गहरे मतभेद हैं। यह बात 11 सितंबर को हुई एक बोर्ड मीटिंग के मिनट्स से पता चली है, जो TOI के हाथ लगे हैं। टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी मेहली मिस्त्री दिवंगत रतन टाटा के करीबी माने जाते हैं। मिस्त्री ने कहा कि उन्होंने हमेशा नोएल टाटा का साथ दिया है लेकिन नोएल ने टाटा संस के बोर्ड में उनके नामांकन का समर्थन नहीं किया।

इस मीटिंग में ट्रस्ट्स के सात ट्रस्टियों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए। यह सब तब हुआ जब टाटा संस के बोर्ड में वाइस चेयरमैन विजय सिंह की फिर से नियुक्ति पर चर्चा हो रही थी। मीटिंग के मिनट्स में इस चर्चा के मुख्य बिंदु साफ तौर पर लिखे हैं जिसमें 77 साल के विजय सिंह के खिलाफ वोटिंग और उन्हें मिस्त्री से बदलने का प्रस्ताव भी शामिल था। प्रस्तावकों का कहना था कि मिस्त्री ट्रस्ट्स के विचारों को रखने के लिए एक ज्यादा मजबूत आवाज होंगे।

अपने-अपने दावे

मिस्त्री का समर्थन करने वाले गुट का कहना था कि मिस्त्री खुद इस पद के इच्छुक नहीं थे, लेकिन इसमें लगने वाले समय और मेहनत को देखते हुए वह सही व्यक्ति थे। वहीं नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह के समर्थन में डटे रहे। उनका कहना था कि विजय सिंह ने टाटा ग्रुप के सबसे मुश्किल दौर में रतन टाटा का साथ दिया था। मीटिंग में विजय सिंह को छोड़कर सभी ट्रस्टी मौजूद थे।
मीटिंग के नोट्स से पता चलता है कि मिस्त्री ने विजय सिंह से मीटिंग में मौजूद रहने का अनुरोध किया था ताकि वह अपने पद की समीक्षा पर चर्चा कर सकें। लेकिन विजय सिंह ने कहा था कि वह नॉमिनी डायरेक्टर के तौर पर अपनी भूमिका की समीक्षा वाली किसी भी मीटिंग में मौजूद नहीं रहना चाहते। पिछले साल अक्टूबर में रतन टाटा के निधन के बाद जब उनके सौतेले भाई नोएल टाटा चेयरमैन बने थे तो टाटा चैरिटीज ने अक्टूबर 2024 में एक नियम बनाया था। इस नियम के तहत टाटा संस के लिए ट्रस्ट्स के उन नॉमिनी डायरेक्टर्स की सालाना समीक्षा की जाएगी जिनकी उम्र 75 के पार हो चुकी है।

मजबूत आवाज

ट्रस्टी डेरियस खंबाटा ने इस बात पर जोर दिया कि यह समीक्षा विजय सिंह के बारे में नहीं थी बल्कि टाटा ग्रुप के सामने मौजूद बड़े मुद्दों से जुड़ी थी। उन्होंने कहा कि यह टाटा ग्रुप के लिए एक महत्वपूर्ण समय था। उन्होंने बताया कि चार ट्रस्टी मिस्त्री, प्रमित झवेरी, जहांगीर जहांगीर और वह खुद मानते थे कि टाटा संस के बोर्ड को ट्रस्ट्स के विचारों को रखने के लिए एक ज्यादा मजबूत आवाज की जरूरत है। उन्होंने मिस्त्री का नाम इस भूमिका के लिए सुझाया।
खंबाटा ने इस बात पर जोर दिया कि मिस्त्री टाटा संस बोर्ड में शामिल होने के इच्छुक नहीं थे और उन्होंने बाकी तीनों से यह पद लेने का आग्रह किया था। फिर भी उन्होंने मिस्त्री को ट्रस्ट्स का प्रतिनिधित्व करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प चुना। खंबाटा की बात से सहमत होते हुए जहांगीर ने कहा कि टाटा ग्रुप के सामने मौजूद मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए नॉमिनी लीडरशिप में बदलाव की जरूरत है ताकि टाटा ट्रस्ट्स के विचारों को टाटा संस बोर्ड पर ज्यादा मजबूती से पहुंचाया जा सके।

मुश्किल दौर में साथ

मीटिंग के मिनट्स के मुताबिक नोएल टाटा ने कहा कि विजय सिंह ने टाटा ग्रुप के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में रतन टाटा और ट्रस्ट्स का साथ दिया था और ऐसा कोई कारण नहीं था जिसके लिए ऐसी समीक्षा की जरूरत हो। उन्होंने यह भी कहा कि विजय सिंह को टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का भी पूरा समर्थन प्राप्त है और यह पहली बार होगा जब किसी नॉमिनी डायरेक्टर को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले छोड़ने के लिए कहा जाएगा।

नोएल टाटा को लगा कि अगर विजय सिंह को उनका कार्यकाल पूरा करने दिया जाता या कम से कम 31 मार्च 2026 तक जारी रखने दिया जाता तो यह ज्यादा उचित होता। ट्रस्ट्स के वाइस-चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन ने नोएल टाटा की बात से सहमति जताई। उन्होंने राय दी कि इस मामले पर और ज्यादा समय दिया जाना चाहिए था। कोई भी फैसला लेने से पहले ट्रस्टियों के बीच इस पर चर्चा की जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि यह ट्रस्ट्स में एक बुरा उदाहरण स्थापित करेगा और अंदरूनी मतभेदों की छाप छोड़ेगा।

वोटिंग

प्रमित झवेरी ने बताया कि अक्टूबर 2024 से ट्रस्ट्स के अंदर मतभेद रहे हैं। ट्रस्ट्स ने विजय सिंह की नॉमिनी डायरेक्टरशिप पर वोटिंग की। मिस्त्री, खंबाटा, जहांगीर और झवेरी ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया जबकि नोएल और श्रीनिवासन ने इसका विरोध किया। इसके बाद विजय सिंह ने टाटा संस बोर्ड से इस्तीफा दे दिया। यह घटनाक्रम टाटा ट्रस्ट्स के भीतर चल रहे गहरे मतभेदों को दर्शाता है। इसे लेकर सरकार भी चिंतित है। हाल में टाटा ग्रुप के कुछ सीनियर अधिकारियों ने गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की थी।

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