नान घोटाला...सरेंडर करने पहुंचे रिटायर्ड IAS आलोक,कोर्ट ने लौटाया

Updated on 19-09-2025 12:35 PM
रायपुर, छत्तीसगढ़ नान घोटाला केस में रिटायर्ड आलोक शुक्ला रायपुर की स्पेशल कोर्ट में सरेंडर करने पहुंचे थे, लेकिन कोर्ट ने सरेंडर कराने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभी सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर अपलोड नहीं हुआ है। सरेंडर नहीं करा सकते हैं। इसके बाद आलोक शुक्ला वापस लौट गए हैं।

बचाव पक्ष के वकील फैजल रिजवी  बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वह ED कोर्ट में सरेंडर करने पहुंचे थे, लेकिन कोर्ट ने कहा कि अभी सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया नहीं है, जब ऑर्डर आ जाएगा तो आप ऑर्डर के साथ आइए। सुप्रीम कोर्ट ने 2 हफ्ते कस्टोडियल और ज्यूडिशियल रिमांड के आदेश दिए हैं।'

जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

दरअसल, नान घोटाला केस में रिटायर्ड IAS आलोक शुक्ला को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन ED ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। ED ने कोर्ट में बताया कि आरोपियों ने 2015 में दर्ज नान घोटाला मामले और जांच को प्रभावित करने की कोशिश की थी। हमारी जांच अभी पूरी नहीं हुई है।

जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सुनवाई के बाद हाईकोर्ट से आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा को मिली अग्रिम जमानत को रद्द कर दी। कोर्ट ने ED की कस्टडी के लिए आदेश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि पहले 2 हफ्ते ED की हिरासत और उसके बाद 2 हफ्ते न्यायिक हिरासत में रहना होगा। इसके बाद ही उन्हें जमानत मिल सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट बोला- 3 महीने में जांच पूरी करे ED

इसके साथ ही जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने ED और EOW को जांच पूरी करने के लिए तय समय सीमा दी है। बेंच ने ED को तीन महीने और EOW को 2 महीने में जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि पेंडिंग मामलों का निपटारा समय पर होना चाहिए।

अब जानिए क्या है नान घोटाला ?

नान घोटाला फरवरी, 2015 में सामने आया था, जब ACB/EOW ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने वाली नोडल एजेंसी नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) के 25 परिसरों पर एक साथ छापे मारे थे।

छापे के दौरान कुल 3.64 करोड़ रुपए नकद जब्त किए गए थे। छापे के दौरान एकत्र किए गए चावल और नमक के कई नमूनों की गुणवत्ता की जांच की गई थी। दावा किया गया था कि वे घटिया और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त थे।

अब जानिए कैसे खुलासा हुआ

EOW ने अपनी FIR में बताया था डॉ. आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए तत्कालीन महाधिवक्ता सतीशचंद्र वर्मा से असम्यक लाभ लिया। उनका मकसद था कि सतीशचंद्र वर्मा को लोक कर्तव्य को गलत तरीके से करने के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए सरकारी कामकाज में गड़बड़ी कर सकें।

इसके बाद, सभी मिलकर एक आपराधिक षड्यंत्र में शामिल हुए और राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में काम करने वाले उच्चाधिकारियों से प्रक्रियात्मक दस्तावेज और विभागीय जानकारी में बदलाव करवाया।

इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य था नागरिक आपूर्ति निगम के खिलाफ दर्ज एक मामले (अप.क. 09/2015) में अपने पक्ष में जवाब तैयार करना, ताकि हाईकोर्ट में वे अपना पक्ष मजबूती से रख सकें और उन्हें अग्रिम जमानत मिल सके।

इन धाराओं के तहत FIR

छत्तीसगढ़ राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने डॉ. आलोक शुक्ला, अनिल टुटेजा, सतीश चंद्र वर्मा और अन्य पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 2018 की धाराओं 7, 7क, 8, और 13(2) और भारतीय दंड संहिता की धाराएं 182, 211, 193, 195-ए, 166-ए, और 120बी के तहत अपराध दर्ज किए गए हैं।



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