रूसी तेल या अमेरिका से ट्रेड डील? भारत के सामने दो बड़े सवाल, मोदी-पुतिन की मुलाकात पर टिकी नजरें

Updated on 04-12-2025 06:07 PM
नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दो दिवसीय यात्रा पर आज भारत आ रहे हैं। इस यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच ट्रेड और डिफेंस से जुड़ी कई डील हो सकती हैं। रूस और भारत के संबंध काफी पुराने हैं। हालांकि पुतिन की इस यात्रा से पहले भारत के सामने दो बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। ये रूसी तेल और अमेरिकी ट्रेड डील को लेकर हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए भारी टैक्स लगा दिया है। साथ ही ट्रंप ने हाल में रूस की कुछ तेल कंपनियों पर बैन लगाया था, जिस कारण भारत में रूसी तेल का आयात कम हो गया है। वहीं दूसरी ओर अब अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील की कोशिशें कुछ तेज हुई हैं। वह इसलिए क्योंकि टैरिफ के कारण भारत को निर्यात संबंधि कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। माना जा रहा है कि रूस तेल की खरीद कम करने और ट्रेड डील होने पर अमेरिका भारत से टैरिफ काफी कम कर सकता है।

दोनों नेताओं की मुलाकात पर नजर

ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत सस्ता रूसी तेल खरीदेगा या अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक हितों को बचाएगा? या फिर क्या भारत इन दोनों बड़ी ताकतों के बीच संतुलन बना पाएगा?

दरअसल, पुतिन दौरे के दौरान मोदी-पुतिन की मुलाकात भारत को रूसी तेल के मामले पर फिर से सोचने का मौका दे सकती है। खासकर तब, जब रूसी राष्ट्रपति के साथ प्रतिबंधों का सामना कर रही रूसी ऊर्जा कंपनियों के बड़े अधिकारी भी भारत आ रहे हैं। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इस मुलाकात का नतीजा क्या होगा, लेकिन क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति भवन) के तेवर बता रहे हैं कि पुतिन की टीम तेल और अमेरिकी चुनौती का डटकर सामना करने के लिए तैयार है, और शायद वे इससे भी बड़े और बेहतर सौदे लेकर आएंगे।

क्या हो सकती है दोनों देशों के बीच डील?

इस यात्रा से जुड़े एक उद्योग सूत्र ने बताया कि पुतिन के साथ आने वाले दल में रूस के बड़े सरकारी बैंक सबरबैंक (Sberbank), हथियार निर्यातक रोसोबोरोनएक्सपोर्ट (Rosoboronexport) और बैन का सामना कर रही तेल कंपनियों रोसनेफ्ट (Rosneft) और गजप्रोम नेफ्ट (Gazprom Neft) के सीईओ भी शामिल होंगे।रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने बताया कि रूस भारत से अपने तेल संचालन के लिए पुर्जों और तकनीकी उपकरणों की मदद मांगेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण रूस के लिए मुख्य आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंच मुश्किल हो गई है। वहीं, भारत सरकार के एक अधिकारी ने बताया कि नई दिल्ली रूस के सुदूर पूर्व में स्थित सखालिन-1 (Sakhalin-1) प्रोजेक्ट में ONGC Videsh Ltd की 20% हिस्सेदारी को फिर से हासिल करने की कोशिश कर सकती है।

भारत के सामने मुश्किल स्थिति

रूसी तेल की बात करें तो यह भारत के लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है। रूस भारत को काफी कम कीमत पर तेल दे रहा है, जिससे भारत का आयात बिल कम हो सकता है। लेकिन अमेरिका ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं, और अगर भारत रूस से ज्यादा तेल खरीदता है, तो अमेरिका भारत पर भी प्रतिबंध लगा सकता है। इससे भारत के अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध खराब हो सकते हैं।

ऐसे में भारत के सामने एक मुश्किल स्थिति है। उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री मोदी इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं और पुतिन के साथ बातचीत के बाद क्या फैसला लेते हैं।

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