त्योहार में 4 गुना बढ़ जाती है बिक्री; 4 रुपए से शुरू हुई कहानी 90 साल में 560 रु. किलो पहुंची

Updated on 23-02-2023 06:30 PM

पढ़कर हैरानी हुई होगी, लेकिन सच है। इस बूंदी के लड्‌डू का स्वाद ही कुछ ऐसा है कि इसे खरीदने के लिए अफसरों और नेताओं की सिफारिश तक लगानी पड़ती है। हालांकि ऐसा त्योहार के सीजन में होता है। कारण- इसकी मांग चार गुना बढ़ जाती है। 90 साल पहले 4 रुपए प्रति किलो से शुरू हुई कहानी आज 560 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। ये लड्‌डू विदेशों तक मिठास घोल रहे हैं। आज के जायका में बात ग्वालियर के मशहूर ‘बहादुरा स्वीट्स’ के लड्‌डुओं की।

नया बाजार में स्थित है ‘बहादुरा स्वीट्स’। 90 साल पुरानी इस दुकान का बाहरी हिस्सा आज भी वैसा ही है। यहां आज भी दुकान के बाहर पोर्च पर मिट्टी के बनी भट्‌टी पर हलवाई कढ़ाही में बूंदी छानता नजर आ जाएगा। इसका स्वाद भी वैसा ही है। कोई त्योहार हो या घर में कोई खुशी, बहादुरा के लड्‌डुओं के बिना अधूरी है। लोग इसे ‘बहादुरा के लड्‌डू’ के नाम से जानते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसके दीवाने थे।

‘बहादुरा स्वीट्स’ के ओनर सिद्धार्थ शर्मा ने बताया कि 90 साल पहले उनके दादाजी बहादुर प्रसाद शर्मा ने लड्‌डू की यात्रा शुरू की थी। उस समय छोटी सी दुकान में देशी घी में बने बारीक बूंदी के लड्‌डू बनवाते थे। ये लड्डू लोगों को बहुत पसंद आते थे, फिर पिता ने काम संभाला और अब मैंने। सिद्धार्थ बहादुरा स्वीट्स की तीसरी पीढ़ी हैं। वह बताते हैं कि जब दादा बहादुर प्रसाद शर्मा ने लड्‌डुओं की शुरुआत की थी, तो वह 4 रुपए किलो मिला करते थे, अब इनका भाव 560 रुपए किलो है। रोजाना सुबह 9 बजे से रात 9 बजे के बीच सैकड़ों किलो लड्‌डू बिक जाते हैं। जब शॉप ओनर से टर्नओवर के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने हंसते हुए सवाल को टाल दिया।

अटलजी अपनी मंडली के साथ यहां आकर खाते थे लड्‌डू

सिद्धार्थ बताते हैं कि पूर्व प्रधान मंत्री अटलजी खाने के काफी शौकीन थे। स्कूल व कॉलेज लाइफ के समय वह यहां अपनी मित्र मंडली के साथ बैठा करते थे। दादाजी बताते थे कि अटलजी कम से कम ढाई सौ ग्राम लड्डू जरूर खाते थे। इसके बाद वह दिल्ली चले गए और देश की राजनीति में खूब नाम कमाया, लेकिन बहादुरा स्वीट्स के लड्‌डू का स्वाद उनकी जुबान से कभी नहीं गया। जब भी यहां के लोग दिल्ली जाया करते थे तो लड्‌डू जरूर साथ ले जाते थे। सिद्धार्थ बताते हैं कि यदि आपको बहादुरा स्वीट्स के पकवान जैसे जलेबी और कचौड़ी खाना है तो सुबह सात से साढ़े नौ बजे तक और बूंदी के लड्डू के लिए शाम साढ़े सात बजे तक आना पड़ेगा। लड्‌डू बनते ही बिक जाते हैं। असल में ये लड्‌डू ही उनकी पहचान हैं।

अटल जी से मिलने का पास होते थे ये लड्‌डू

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मिठाई खाने का काफी शौक था। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब भी शहर का कोई व्यक्ति उनसे मिलने जाता था तो वो बहादुरा के लड्डू लेकर जाता था। इसी वजह से एक अंग्रेजी अखबार ने तो इन लड्डुओं को ‘पासपोर्ट टू पीएम’ की संज्ञा तक दे दी थी। बहादुरा मिष्ठान भंडार के मालिक के अनुसार जब अटलजी बहुत छोटे थे, तब से यहां लड्डू खाने आते थे। उस समय उनके लड्डू 4 रुपए प्रति किलो बिका करते थे।

त्योहार पर आते हैं सिफारिशी फोन

सिद्धार्थ के छोटे भाई विकास शर्मा ने बताया कि आम दिनों में ही हम लड्‌डू की डिमांड पूरी नहीं कर पाते हैं। जब कोई त्योहार आता है, तो डिमांड 4 गुना बढ़ जाती है। हमारे यहां से लड्‌डू खरीदने के लिए लोगों को सिफारिश लगानी पड़ती है। कोई किसी रिश्तेदार से फोन लगवाकर आता है, तो कोई किसी नेता का खास बनकर आता है। यही नहीं, पुलिस व जिला प्रशासन के अफसर भी लगातार लड्‌डुओं के लिए सिफारिश करते हैं। हमारा प्रयास रहता है कि हर व्यक्ति की जुबां तक लड्डू पहुंचे।

बूंदी लड्डू बने इससे पहले बिक जाते हैं लड्डू

बहादुरा स्वीट्स के ऑनर सिद्धार्थ बताते हैं कि हम क्वालिटी से समझौता नहीं करते हैं। लगभग 90 साल पुरानी दुकान है। हमारे लड्डू इतने प्रसिद्ध है कि बूंदी निकलने के बाद लड्‌डू का आकार भी नहीं ले पाती है कि शौकीन लोग उसे खरीद लेते हैं।

विदेश तक जाते हैं बहादुरा के लड्‌डू

ऐसा नहीं है कि ग्वालियर के कंपू चौराहा नया बाजार की 90 साल पुरानी बहादुरा स्वीट्स के छोटी बूंदी के लड्‌डू की डिमांड सिर्फ ग्वालियर या उसके आसपास के शहरों में है। यहां के लड्‌डू दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, पुणे तो जाते ही हैं, बल्कि विदेशों तक यहां के लड्‌डू की डिमांड है। दुकान के कर्मचारी ने एक किस्सा बताया कि दाल बाजार के एक व्यापारी का बेटा इंजीनियर है। वह अमेरिका में रहता है। एक साल पहले की बात है, जब व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे के पास मिलने गए, तो बेटे ने डिमांड की थी कि बहादुरा स्वीट्स के लड्‌डू जरूर लेते आना। ऐसे अनंत किस्से हैं। आज भी कई लोग यहां से लड्डू मंगवाते हैं।

लोग बोले- नहीं बदली मिठास, आज भी वही स्वाद

10 साल से यहां के लड्डू खा रहे ग्वालियर निवासी जोगिंदर सिंह का बताते हैं कि मैं इनके लड्डू का स्वाद जस का तस है। कंपू निवासी अभिषेक शिवहरे बताते हैं कि यहां का लड्‌डू मुंह में रखते ही घुल जाता है। सुशांत गुप्ता निवासी सिकंदर कंपू बताते हैं कि हमारे घर में हर बार खुशी के मौके पर यहां से लड्डू जाता है। लड्डू के बिना सारे त्योहार फीके मालूम पड़ते हैं। मैंने नई गाड़ी खरीदी है। इस खुशी को भी लड्डू से डबल बनाया जाएगा।


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