श्रीलंका के नए राष्ट्रपति दिसानायके की पार्टी को हुआ भारत की ताकत का अहसास, दशकों पुरानी दुश्‍मनी भूल दोस्‍ती में समझी भलाई

Updated on 27-09-2024 05:12 PM
कोलंबो: श्रीलंका में मार्क्सवादी नेता अनुरा कुमारा दिसानायके के देश के 9वें कार्यकारी राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाल लिया है। वे देश के पहले वामपंथी राष्ट्रपति हैं। इसके साथ ही कोलंबो की नई विदेश नीति को लेकर अटकलें भी लगनी शुरू हो गई हैं। दिसानायके की पार्टी जनता विमुक्ति पेरमुना (JVP) की भारत विरोधी पृष्ठभूमि को देखते हुए ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या श्रीलंका एक बार फिर चीन की तरफ झुकेगा या फिर वह नई दिल्ली और बीजिंग के बीच संतुलन जारी रखेगा।

जेवीपी का भारत विरोधी इतिहास


साल 1960 के दशक में अपनी स्थापना के समय जेवीपी पार्टी मार्क्सवादी और सिंहली राष्ट्रवादी विचारधारा वाला एक कट्टर भारत विरोधी संगठन था। 1971 में इसने श्रीलंकाई राज्य के खिलाफ विद्रोह किया था, तब भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर कोलंबो हवाई अड्डे को सुरक्षित करने के लिए कदम बढ़ाया था।

इसके बाद जेवीपी ने 1987-1990 के बीच दूसरा विद्रोह किया जो पहले से भी ज्यादा भारत विरोधी था। जेवीपी ने भारत-श्रीलंका समझौते की आलोचना की, जिसके तहत श्रीलंका में भारत ने शांति सेना भेजी थी। जेवीपी ने 1994 में सशस्त्र संघर्ष की नीति को त्याग दिया और चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। हालांकि, यह लोगों की पसंद नहीं बनी।

श्रीलंका का आर्थिक संकट बना मौका


जेवीपी के लिए 2022 का आर्थिक संकट एक सुनहरे मौके की तरह आया जब जनांदोलन के दबाव में राजपक्षे परिवार को देश छोड़कर भागना पड़ा। इस दौरान दिसानायके युवाओं के बीच एक लोकप्रिय विकल्प के रूप में उभरे। जेवीपी की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए भारत ने पार्टी के साथ अपने जुड़ाव को बढ़ाया।

भारत ने महत्वपूर्ण रणनीति अपनाई और श्रीलंका में सभी दावेदारों से जुड़ाव बनाए रखा। नई दिल्ली ने दिसानायके को आधिकारिक यात्रा पर आमंत्रित किया, जबकि विदेश मंत्री एस जयशंकर और एनएसए अजीत डोभाल ने चुनावों से पहले पार्टी लाइन से हटकर श्रीलंकाई नेताओं से मुलाकात की। जेवीपी ने इसे मौके के रूप में देखा।

नई सरकार को होगी भारत की जरूरत


दिसानायके ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कई वादे किए हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए उन्हें भारत की जरूरत होगी। इसमें श्रीलंका को समुद्री केंद्र, एक बंदरगाह और व्यापार केंद्र और क्षेत्रीय रसद प्रबंधन केंद्र के रूप में विकसित करना शामिल है। दिसानायके पर्यटन और सूचना प्रौद्योगिकी राजस्व में सुधार करना चाहते हैं, जिसके लिए भी भारत महत्वपूर्ण साबित होगा।

भारत को लेकर बदला रवैया


जेवीपी भारत की चिंताओं को लेकर भी संवेदनशील है। इसके घोषणापत्र में साफ कहा गया है कि देश की भूमि, समुद्र और हवाई क्षेत्रों को किसी भी देश- खास तौर पर भारत- की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

चीन से कैसे होंगे रिश्ते


इसके साथ ही विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि नई सरकार चीन के साथ संबंधों को संतुलित करने का प्रयास करेगी। बीजिंग ने पहले ही संकेत दिया है कि वह नई सरकार की मार्क्सवादी विचारधारा का लाभ उठाने को तैयार है। चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने दिसानायके की जीत पर खुशी जाहिर की थी। नई दिल्ली आने से पहले दिसानायके ने बीजिंग का दौरा किया था।

बीजिंग के लिए अब पहले जैसा नहीं


श्रीलंका के सबसे बड़े कर्जदाताओं में से एक के रूप में बीजिंग अपना असर बढ़ाने की कोशिश करेगा, लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही के वादे पर चुनाव जीतने वाली नई सरकार पर संतुलन को लेकर दबाव होगा। दिसानायके का लक्ष्य सभी विदेशी निवेशों के लिए कठोर और पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया को बढ़ावा देना और कर्ज का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना है।

अगर दिसानायके ऐसा करते हैं तो बीजिंग को यह पसंद नहीं आएगा, जिसने सिस्टम की खामियों का फायदा उठाकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। इसके उलट यह भारत जैसे भागीदारों के लिए फायदेमंद हो सकता है, जिनकी दिलचस्पी संस्थानों को मजबूत करने और देश के शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने में है।

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