श्रीधर वेम्‍बु ने ईस्‍ट इंडिया कंपनी से कर दी इनकी तुलना, कहा- कई देशों से बड़ी

Updated on 16-02-2026 12:41 PM
नई दिल्‍ली: जोहो कॉर्पोरेशन के पूर्व सीईओ श्रीधर वेम्बु ने आज की बड़ी तकनीकी कंपनियों की तुलना ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से की है। यह उनकी पहुंच और ताकत को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि ये कंपनियां अब संप्रभु राष्ट्रों से भी बड़ी हो गई हैं। उन्हें इसी नजरिए से देखने की जरूरत है। यह तुलना तब सामने आई जब अल्फाबेट ने 24 घंटे के भीतर 32 अरब डॉलर का कर्ज जुटाया। यह आमतौर पर ऐसा कर पाना सिर्फ देशों के लिए मुमकिन होता है।

यह वित्तीय क्षमता और रफ्तार राष्ट्रों की पूंजी जुटाने की तुलना में बहुत तेज है। भारत जैसे देशों को भी इतनी बड़ी रकम जुटाने में काफी समय लगता है। गूगल की ओर से 100 साल का बॉन्ड जारी करना भी एक ऐसा उदाहरण है। इसकी परिपक्वता अवधि कई देशों के सरकारी बॉन्ड से भी अधिक है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि बड़ी टेक्‍नोलॉजी कंपनियां अब उन वित्तीय साधनों, इन्‍वेस्‍टर कॉन्फिडेंस और लॉन्‍ग-टर्म प्‍लानिंग के साथ काम कर रही हैं जो कभी सिर्फ राष्ट्र-राज्यों तक ही सीमित थे।

पहले भी ईस्‍ट इंड‍िया कंपनी का क‍िया है ज‍िक्र

वेम्बु ने पहले भी ईस्ट इंडिया कंपनी का जिक्र किया है, जो एक वाणिज्यिक इकाई थी। धीरे-धीरे औपनिवेशिक एशिया में एक क्षेत्रीय और प्रशासनिक शक्ति बन गई थी। उन्होंने इस तुलना का इस्‍तेमाल यह समझाने के लिए किया है कि कैसे आर्थिक प्रभुत्व संरचनात्मक प्रभाव में बदल सकता है। उनका तर्क है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल सॉफ्टवेयर या सेवाओं के विक्रेता नहीं रह गए हैं। वे कम्‍युनिकेशन, कॉमर्स और गवर्नेंस की रीढ़ बन गए हैं।

भू-राजनीत‍िक फायदे में बदल सकता है कंट्रोल

इस बुनियादी ढांचे पर कंट्रोल भू-राजनीतिक फायदे में बदल सकता है। जनवरी में फ्रांस की ओर से विदेशी वीडियो-कॉन्‍फ्रेंसिंग टूल से हटकर घरेलू विकल्प अपनाने पर वेम्बु ने इसे 'विडंबना' कहा था। उन्होंने इसे तकनीकी निर्भरता की देर से हुई पहचान के रूप में देखा। इस बदलाव में जूम वीडियो कम्युनिकेशंस और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों की ओर से विकसित प्लेटफार्मों पर निर्भरता पर दोबारा विचार करना शामिल था। इसके बजाय राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रित समाधानों को प्राथमिकता दी गई।
वेम्बु के लिए ऐसे निर्णय 'तकनीकी संप्रभुता' के शुरुआती चरण का संकेत देते हैं। यह एक ऐसा स्‍ट्रक्‍चर है जिसमें राष्ट्र अपने डेटा इकोसिस्‍टम, डिजिटल बुनियादी ढांचे और इनोवेशन पाइपलाइनों पर अधिक स्वामित्व चाहते हैं।

ग्‍लोबल लेवल पर टेंशन का व‍िषय

एक औपनिवेशिक व्यापारिक दिग्गज से जानबूझकर तुलना उत्तेजक है। लेकिन, यह एक व्यापक नीति बहस को दिखाती है। जैसे-जैसे तकनीकी कंपनियां अरबों में पूंजी, प्रतिभा और सीमा पार यूजर बेस जुटाती है, उनके निर्णय सप्‍लाई चेन, सूचना प्रवाह और रेगुलेटर एजेंडों को भी प्रभावित कर सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ऐतिहासिक एकाधिकार के उलट आधुनिक तकनीकी कंपनियां एक साथ बुनियादी ढांचा प्रदाता, बाजार, फाइनेंसर और भू-राजनीतिक अभिनेता के रूप में काम करती हैं। वे अक्सर उन जांचों के बिना काम करती हैं जो पारंपरिक रूप से राज्यों पर लागू होती हैं।

यह स्थिति वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन गई है। बड़ी तकनीकी कंपनियों की वित्तीय शक्ति और प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वे कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं से भी बड़ी हो गई हैं। यह स्थिति सरकारों के लिए नई चुनौतियां पेश कर रही है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीकी कंपनियों का प्रभाव राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता के लिए खतरा न बने।

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