मध्य प्रदेश के ऐरण में 1700 साल पहले पत्थरों पर उकेरी गई थी पहली कृष्णलीला

Updated on 15-08-2025 08:41 PM
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 155 किलोमीटर दूर सागर जिले के ऐरण में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के सबसे प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं। यहां गुप्त वंश के राजाओं के बनवाए महाविष्णु मंदिर की दीवारों पर इन कथाओं को शिल्पांकन से उकेरा गया था। पुरातत्वविदों का कहना है कि ऐरण में मिले ये पैनल भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की लोकप्रियता के सबसे पुराने पुरातात्विक साक्ष्य हैं।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) श्रीकृष्ण कथा के इन पैनलों को संरक्षित करने की परियोजना पर काम कर रहा है। इसका 75 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। अगले तीन-चार महीनों में ये पैनल बेहतर ढंग से पर्यटकों को दर्शन के लिए उपलब्ध हो सकेंगे।

ऐरण पर शोधपरक पुस्तक लिख चुके अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. मोहन लाल चढार ने बताया कि गुप्त काल में भागवत धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार था। यह धर्म इतना लोकप्रिय था कि कई विदेशी भी इसके प्रभाव में आए थे। होलियोडोरस जैसे यूनानी राजदूत ने भी यहां आकर भागवत धर्म स्वीकार किया था।

20 से ज्यादा प्रसंग शामिल

पैनलों में दर्शाए गए दृश्यों में श्रीकृष्ण का मथुरा की जेल में जन्म, वसुदेव द्वारा यमुना पार कर उन्हें गोकुल पहुंचाना, रोहिणी के गर्भ में बलराम का संकर्षण, बाल्यावस्था में पूतना वध, कालिया नाग का दमन, गोवर्धन पर्वत उठाना, रासलीला और कंस वध जैसे 20 से अधिक प्रसंग शामिल हैं।

प्रत्येक दृश्य को अत्यंत सूक्ष्मता से पत्थर पर उकेरा गया है, जिसमें भाव-भंगिमा और वस्त्राभूषण तक स्पष्ट नजर आते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये शिल्पांकन इतना अद्भुत है कि इन पैनलों को एक क्रम में रखा जाए चलचित्र के दृश्यों जैसा जादू दिखेगा।

गुप्त काल का महत्वपूर्ण केंद्र था

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जबलपुर वृत्त के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. शिवकांत वाजपेयी बताते हैं कि बीना नदी के किनारे बसा ऐरण महत्वपूर्ण व्यापारिक और सामरिक केंद्र था। आज यह गांव है, लेकिन प्राचीन काल में यह समृद्ध नगर था। यहां समुद्रगुप्त से लेकर परवर्ती गुप्त शासकों के शिलालेख और सिक्के मिले हैं।

यहां दशावतार मंदिर था

डॉ. मोहन लाल चढ़ार बताते हैं कि ऐरण में गुप्त शासकों ने चौथी-पांचवी शताब्दी में दशावतार मंदिर बनवाया था। यह मंदिर बाद में ढह गया। 1873-74 की अपनी रिपोर्ट में जनरल कनिंघम ने इस मंदिर का पहली बार वर्णन किया था। वहां अभी महाविष्णु, महावराह और नरसिंह की प्रतिमाएं ही प्राप्त हैं। शेष प्रतिमाएं नहीं मिलीं। उनके मंदिरों का आधार अब भी सुरक्षित है, जिससे उसकी भव्यता का पता चलता है। इसी मंदिर में भगवान की लीला का शिल्पांकन हुआ था।



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