घाटकोपर की झुग्गी से कहानी शुरू, आज 40 से ज्यादा देशों में फैला है कारोबार, अरबो का है टर्नओवर

Updated on 12-12-2025 01:20 PM
 डेन्यूब ग्रुप के संस्थापक रिजवान साजन ने वह दिन देखा है जो किसी को नहीं देखना पड़े। 16 साल की उम्र में पिता का साया सर से हट गया। पिताजी के नहीं रहने के बाद सुबह 4 बजे उठ कर घर-घर दूध और अखबार पहुंचाया। सकड़ों पर चादर बिछा कर त्योहारों में पटाखे और राखियां भी बेचीं। आज रिजवान साजन दुबई या संयुक्त अरब अमीरात ही नहीं बल्कि पूरे खाड़ी देशों की अग्रणी रियल एस्टेट कंपनी के चेयरमैन हैं। उनकी कंपनी का र्टनओवर 4 बिलियन डॉलर हो गया है। इस समय 40 से अधिक देशों में उनका ग्रुप काम कर रहा है और उनकी कंपनी में करीब 6,000 लोग काम करते हैं। जानते हैं रिजवान साजन की कहानी।

घाटकोपर की झुग्गी से है संबंध

रिजवान साजन का जन्म जब हुआ, तब उनके माता-पिता मुंबई के घाटकोपर इलाके की झुग्गी में रहते थे। उनके पिता की एक छोटी सी नौकरी थी, लेकिन बड़ा परिवार था इसलिए अच्छे इलाके में नहीं रह सकते थे। लेकिन उन्होंने हिम्मत कर महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) की एक योजना में चॉल के लिए आवेदन कर दिया। लॉटरी में उनके नाम चॉल का एक मकान निकल गया। उस समय चॉल का मकान खरीदने में 33 फीसदी सब्सिडी सरकार की तरफ से मिलती थी, 33 फीसदी लोन मिल जाता था और 33 फीसदी खुद चुकाने होते थे। उनके पिता ने 33 फीसदी रकम का इंतजाम किसी तरह किया और चॉल वाला मकान ले लिया।

अग्रसोची थे रिजवान के पिता

रिजवान साजन के पिता की आमदनी भले ही कम थी, लेकिन अग्रसोची थे। इसलिए उन्होंने अपने बेटे का एडमिशन घाटकोपर के मशहूर 'फातिमा कॉनवेंट स्कूल' में कराया। हालांकि, उसका फीस बड़ी मुश्किल से भर पाते थे। लेकिन वहां तो पढ़ते थे बड़े घर के बच्चे, जो कैंटीन में खाने-पीने पर खूब पैसे उड़ाते थे। रिजवान को जेब खर्च ना के बराबर मिलता था। वह चाहते थे कि अपने दोस्तों की तरह वह भी कैंटीन में खाए-पिए और मौज उड़ाए। इसके लिए पिता से बात की और सुब सुबह दूध, अखबार आदि बांटने का काम पकड़ लिया। इससे उन्हें महीने में 100-150 रुपये मिल जाते थे। इससे उनका कैंटीन का खर्च निकल जाता था।

16 साल में घर चलाने की जिम्मेदारी

रिजवान साजन के सर पर 16 साल में ही घर चलाने की तब जिम्मेदारी आन पड़ी, जब उनके पिताजी अक्टूबर 1980 में एक दुर्घटना के शिकार हो गए। पिता के नहीं रहने से उनकी पढ़ाई छूट गई। घर में थीं मां, 8 साल का छोटा भाई और एक बहन। पिता जहां काम करते थे, वहां नौकरी मिली, लेकिन पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी। इसलिए सुबह साढ़े चार बजे दूध बांटते थे, सात बजे से पढ़ाई और 10 बजे से शाम छह बजे तक ऑफिस। इससे घर की गाड़ी चलने लगी। यही नहीं, वह दिवाली और सबे बारात जैसे त्योहारे पर पटाखे बेचते थे तो रक्षा बंधन में राखियां। ताकि दो पैसे ज्यादा कमा सके। वह बताते हैं कि बाजार में जो भी सामान बिकता, वह उसे बेचते। इससे उनके बेचने की स्किल (Selling Skill) तगड़ी हो गई। भले ही पढ़ाई 12वीं के बाद ही छूट गई।

कुवैत से मिला नौकरी का ऑफर तो बदली किस्मत

इस बीच उनके एक रिश्तेदार के जरिए कुवैत में नौकरी का ऑफर मिला। काम था सेल्समैन (Salesman) का। वह साल था 1982 का। उस समय कुवैत के एक दीनार की कीमत भारतीय Rs में 12.5 रुपये होती थी। भारत में तब वह 6,000 रुपये महीने की नौकरी करते थे और कुवैत में 1,500 दीनार (18,000 रुपये) महीने की पगार पर नौकरी मिली। ऊपर से सेल्स पर कमीशन भी मिलता था। मानों लॉटरी लग गई। वह सामान बेचने में माहिर थे, इसलिए खूब तरक्की पाई। तीन-चार साल में ही उनका वेतन 1,500 से 15,000 दीनार हो गया। ऊपर से हर महीने 50,000 दीनार का कमीशन अलग। इस पैसे से उन्होंने टोयोटा का लैंड क्रूजर खरीदा। अपनी बहन की शादी कराई। बांद्रा में मकान खरीदा और खुद की भी शादी की।

ऐसे लौटना पड़ा मुंबई

सबकुछ सही चल रहा था कि कुवैत पर सद्दाम हुसैन का साया पड़ा। दो अगस्त 1990 को कुवैत पर इराक का हमला हो गया। उस समय उनका बेटा आदिल साजन एक साल का था। उन्हें कुवैत से जान बचा कर मुंबई भागना पड़ा। वह बताते हैं कि किसी तरह कार्गो प्लेन में बैठ कर मुंबई पहुंचे। मुंबई में कहीं नौकरी के लिए जाते तो पूछते तुम्हारे पास डिग्री क्या है? डिग्री के बिना वहां कोई नौकरी ही नहीं मिली।

दुबई से मिला ऑफर

रिजवान साजन मुंबई में जब नौकरी ढूंढते-ढूंढते थक गए, तब उन्होंने पुराने संबंधों को खंगालना शुरू किया। उनका एक दोस्त दुबई में रहता था। उन्होंने उसी दोस्त को मदद की चिट्ठी लिखी। जब वह कुवैत में थे तो उनके लिए वह काम करते थे। उस दोस्त ने उन्हें 1993 में उन्हें दुबई बुला लिया और हार्डवेयर का सामान बेचने के काम में लगा दिया। सेल्स का काम तो उन्हें भाता था ही, फिर से नए सिरे से काम शुरू कर दिया।

ऐसे पड़ी डेन्यूब की नींव

दुबई में वह हार्डवेयर का सामान बेचने का इतना बढ़िया काम किया कि सैलेरी के अलावा 8-10 हजार दिरहम का कमीशन मिल जाता था। जब कुछ रकम जमा हुआ तो उन्होंने कंस्ट्रक्शन मैटेरियल बेचने का अपना काम शुरू किया। लेकिन पत्नी नाराज हो गई कि अगर अपना काम नहीं चला तो क्या करोगे? तब उन्होंने समझाया कि अपने काम के लिए ट्राय करने में क्या जाता है। ज्यादा से ज्यादा कुछ हजार दिरहम ही तो डूबेंगे। लेकिन सफल हो गए तो फिर मौज ही मौज। उनका सेल्स स्किल ऐसा था कि काम चल निकला। उस समय दुबई का नए सिरे से निर्माण चल रहा था। रियल एस्टेट सेक्टर में बूम था। इसलिए इस सेक्टर में भी कदम बढ़ा दिया। साल 1992 में उन्होंने बिल्डिंग मैटेरियल का ब्रोकरेज भी शुरू कर दिया। इससे पहले वुड ब्रोकरेज में आए थे। इस सिलसिले में यूरोपीय देश खूब घूमे। वहां की डेन्यूब नदी इनको इतना भाया कि अपनी कंपनी का नाम भी Danube ही रखा। उसके बाद तो वह पीछे मुड़ कर देखे भी नहीं। साल 2006 में सेनिटरी सॉल्यूशन ब्रांड मिलानो (Milano) शुरू किया। 2008 में होम फर्नीशिंग बिजनेस में आए और डेन्यूब होम (Danube Home) की नींव पड़ी। 2012 में अल्यूमिनियम कंपोजिट पैनल के बिजनेस में आए और 2014 में रियल एस्टेट सेक्टर में धमाकेदार एंट्री हो गई। कारोबार ऐसा बढ़ा कि वह दुबई और यूएई ही नहीं, मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी कंपनी के रूप में उभरे।

6,000 लोगों को देते हैं रोजगार

आज रिजवान साजन के डेन्यूब ग्रुप में 6,000 लोग काम करते हैं। इनका टर्नओवर 4 बिलियन डॉलर का हो गया है। प्रसिद्धि ऐसी कि बॉलीवुड के किंग खान कहे जाने वाले शाहरूख खान भी इनके साथ हाथ मिलाने में फख्र महसूस करते हैं। इन्होंने इसी सप्ताह शाहरूख्ज बाय डेन्यूब नाम का एक विशाल कॉर्शियल टॉवर लॉन्च किया है। इसकी लॉन्चिंग में खुद शाहरूख खान दुबई पहुंचे थे। यह पूरा का पूरा टॉवर एक ही दिन में बिक गया, मतलब कि एक दिन में करीब 5,000 करोड़ रुपये की बिक्री हो गई। अब तो उनका बेटा आदिल साजन भी कारोबार में आ गया है। वह इस कंपनी के एमडी हैं।

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