रेल हादसों को रोकने के लिए कवच सिस्टम का ट्रायल मथुरा-पलवल के बीच 140 किमी/घंटे की रफ्तार पर हुई टेस्टिंग

Updated on 05-01-2024 01:29 PM

भारतीय रेलवे ने पहली बार 140 किमी प्रति घंटे की स्पीड पर कवच सिस्टम का ट्रायल किया है। ये ट्रायल मथुरा और पलवल के बीच 30 दिसंबर को किया गया। इस सिस्टम को ट्रेनों की टक्कर रोकने के लिए तैयार किया गया है। किसी इमरजेंसी की स्थिति में अगर ड्राइवर ब्रेक नहीं मार पाता है, तो ये सिस्टम ऑटोमैटिकली ब्रेक लगाएगा।

इससे पहले कवच सिस्टम के तीन ट्रायल किए गए थे। ये तीनों ही ट्रायल 130 किमी/घंटे की रफ्तार पर साउथ सेंट्रल रेलवे के तीन सेक्शंस में किए गए थे। उनमें पॉजिटिव नतीजे देखने को मिले थे।

देशभर के रेल नेटवर्क में लगाया जाएगा कवच सिस्टम
आगरा डिविजन की PRO प्रशस्ती श्रीवास्तव ने बताया कि ताजा ट्रायल के नतीजे बेहद अच्छे रहे हैं। उनसे हमें आगे और ट्रायल करने की उम्मीद मिली है। हम इस रिपोर्ट को रिसर्च डिजाइन और स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन (RDSO) के साथ मिलकर डिटेल मे स्टडी करेंगे और सुधार करेंगे। RDSO ने ही कवच सिस्टम को डेवलप किया है। इसे देशभर के रेल नेटवर्क में लगाया जाना है।

160 किमी/घंटे तक की रफ्तार पर भी होंगे ट्रायल
रेलवे के सूत्रों के मुताबिक, इस सिस्टम की उपयोगिता को जांचने के लिए और भी ट्रायल करने की जरूरत हो सकती है। अगर इस सिस्टम के सभी पैरामीटर 140 किमी/घंटे पर अच्छे से काम कर रहे हैं, तो हम 160 किमी/घंटे तक की रफ्तार पर ट्रायल करेंगे।
प्रशस्ती श्रीवास्तव ने कहा कि मथुरा और पलवल के बीच 80 किमी के दायरे में (मथुरा स्टेशन को छोड़कर) पूरा कवच नेटवर्क तैयार किया गया। इसके तहत स्टेशन एरिया और कई अन्य जगहों पर रेलवे ट्रैक पर RFID टैग्स लगाए थे।

साउथ सेंट्रल रेलवे के तीन सेक्शंस में लगाया गया कवच सिस्टम
RDSO अधिकारियों ने बताया कि देशभर के सभी रेल नेटवर्क्स में से दिल्ली और आगरा के बीच का तीन टुकड़ों में 125 किमी का स्ट्रेच ऐसा है, जहां ट्रेन अधिकतम 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन दौड़ सकती है। इस स्पेशल ट्रैक को भारत की पहली सेमी-हाई स्पीड ट्रेन गतिमान एक्सप्रेस के लिए बिछाया गया था। इस ट्रेन को अप्रैल 2016 में लॉन्च किया गया था। ये देश की पहली ट्रेन है जो 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है।

रेलवे के मुताबिक, कवच सिस्टम साउथ सेंट्रल रेलवे के तीन सेक्शंस में 1,465 किमी के रूट और 139 लोकोमोटिव्स में लगाया गया है। हालांकि, यहां स्पीड लिमिट कम है, इसलिए ये ट्रायल नहीं किया जा सकता है। दिल्ली-आगरा स्ट्रेच के अलावा, बाकी पूरे देश के रेल नेटवर्क में ट्रेनें अधिकतम 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं।

क्या है रेल कवच, जिससे ओडिशा रेल हादसे को टाला जा सकता था?
रेल कवच एक ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम है। इसे ‘ट्रेन कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम’ यानी TCAS कहते हैं। यह भारत में 2012 में बनकर तैयार हुआ था। इंजन और पटरियों में लगे इस डिवाइस की मदद से ट्रेन की ओवर स्पीडिंग को कंट्रोल किया जाता है।

इस तकनीक में किसी खतरे का अंदेशा होने पर ट्रेन में अपने आप ब्रेक लग जाता है। तकनीक का मकसद ये है कि ट्रेनों की स्पीड चाहे कितनी भी हो, लेकिन कवच के चलते ट्रेनें टकराएंगी नहीं।

सेफ्टी इंटीग्रिटी लेवल 4 सर्टिफाइड रेल कवच को रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन यानी RDSO ने बनाया है।

रेल कवच दो ट्रेनों के बीच टक्कर को आखिर रोकता कैसे है?
इस टेक्नोलॉजी में इंजन माइक्रो प्रोसेसर, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी GPS और रेडियो संचार के माध्यम सिग्नल सिस्टम और कंट्रोल टावर से जुड़ा होता है। यह ट्रेन के ऐसे दो इंजनों के बीच टक्कर को रोकता है, जिनमें रेल कवच सिस्टम काम कर रहा हो।

एक ही ट्रैक पर आमने-सामने से दो ट्रेनें आने पर कवच ऐसे रोकेगा हादसा…

  • अगर रेड सिग्नल है तो ड्राइवर को दो किलोमीटर पहले ही इंजन में लगे डिसप्ले सिस्टम में यह दिख जाएगा।
  • इसके बावजूद यदि ड्राइवर रेड सिग्नल की अनदेखी करता है और स्पीड को बढ़ाता है तो कवच एक्टिव हो जाता है।
  • कवच तुरंत ड्राइवर को अलर्ट मैसेज भेजता है। साथ ही इंजन के ब्रेकिंग सिस्टम को सक्रिय कर देता है।
  • ड्राइवर के ब्रेक नहीं लगाने पर भी ऑटोमेटिक ब्रेक लग जाते हैं और एक सेफ डिस्टेंस पर यह ट्रेन रुक जाती है। यानी दोनों ट्रेनों के बीच आमने-सामने की टक्कर नहीं होती है।

यदि दो ट्रेन एक ट्रैक पर एक ही दिशा में जा रहीं हो तो…

  • यदि सिग्नल की अनदेखी कर दो ट्रेन एक ही दिशा में आगे बढ़ रही हों तो जो पीछे वाली ट्रेन होगी उसे यह सिस्टम एक सेफ डिस्टेंस पर ऑटोमैटिक ब्रेक लगाकर रोक देगा। यानी टक्कर होने से पहले ही।

घने कोहरे में भी हादसे से बचाएगा कवच…

  • सर्दियों में ट्रेन का ड्राइवर घने कोहरे की वजह से सिग्नल की अनदेखी कर देता है। यानी उसे यह नहीं पता चल पाता है कि सिग्नल ग्रीन है या रेड।
  • ऐसी स्थिति में रेल कवच ऑटोमैटिक ब्रेक लगाकर स्पीड को कंट्रोल में करता है। इससे घने कोहरे में भी सेफ तरीके से ट्रेन चलाने में मदद मिलती है और हादसा नहीं होगा।

रेल कवच के ये फायदे भी…

  • जब फाटकों के पास ट्रेन पहुंचेगी तो अपने आप सीटी बज जाएगी।
  • इमरजेंसी के दौरान इस तकनीक के जरिए ट्रेन से SOS मैसेज यानी ऑटोमैटिक कंट्रोल रूम को मदद के लिए संदेश चला जाएगा।
  • इतना ही नहीं, कवच सिस्टम रोल बैक, फॉरवर्ड, रिवर्स मूवमेंट, साइड टक्कर जैसी इमरजेंसी में भी स्टेशन मास्टर और लोको ड्राइवर को तत्काल अलर्ट करने में सक्षम है।

2012 में मनमोहन सिंह सरकार में हुआ था फर्स्ट ट्रायल
भारत में कवच यानी TCAS का पहला परीक्षण मनमोहन सिंह सरकार के दौरान अक्टूबर 2012 में ही हो चुका है। हैदराबाद में हुई इस टेस्टिंग को ‘पाथ ब्रेकिंग टेक्नोलॉजी’ कहा गया था। किसी हादसे से पहले ट्रेन को रोकने के लिए इस टेक्नोलॉजी की टेस्टिंग हुई थी।

इस टेस्टिंग के दौरान TCAS टेक्नोलॉजी से लैस दो ट्रेनों को एक ट्रैक पर एक ही दिशा में चलाने की अनुमति दी गई थी। इस दौरान दोनों ट्रेनें एक दूसरे से लगभग 200 मीटर की दूरी पर आकर अपने आप रुक गईं थीं। इसके बाद से ही इस टेक्नोलॉजी को सफल माना गया।

2022 में फिर रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने की कवच की टेस्टिंग
2012 में हुई सफल टेस्टिंग के बावजूद न तो UPA और न ही NDA सरकार ने इस टेक्नोलॉजी पर काम आगे बढ़ाया।

10 साल बाद मार्च 2022 में एक बार फिर से रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन ने दो अलग-अलग ट्रेनों पर सवार होकर इस टेक्नोलॉजी का परीक्षण किया।

इस दौरान ये देखा गया कि दो ट्रेन आमने-सामने से टकराती हैं या नहीं। ट्रायल में ये देखा गया कि कवच की वजह से दो ट्रेन 380 मीटर दूर पूरी तरह से रुक गईं।

कवच टेक्नोलॉजी को लगाने में कितना खर्च है?
रेलवे के मुताबिक यूरोप में इस्तेमाल होने वाले टेक्नोलॉजी की तुलना में कवच स्वदेशी होने के साथ ही बेहद सस्ता भी है। इसे लगाने का खर्च 30 लाख रुपए प्रति किलोमीटर से 50 लाख प्रति किलोमीटर तक आता है। यह बाकी देशों में इस टेक्नोलॉजी पर खर्च होने वाले पैसे का महज एक चौथाई है। मतलब ये कि इसी टेक्नोलॉजी को लगाने में अमेरिका या दूसरे यूरोपीय देशों में खर्च प्रति किलोमीटर 2 करोड़ रुपए से ज्यादा आता है।



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