आत्मा में ही असल आनंद है : मनीष सागर महाराज

Updated on 19-07-2025 01:40 PM

रायपुर। टैगोर नगर पटवा भवन में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में शुक्रवार को परम पूज्य उपाध्याय प्रवर युवा मनीषी मनीष सागरजी महाराज ने कहा कि  जीवन में सत्य को समझने का प्रयास करना चाहिए और सही की पहचान करना चाहिए। संसार के भोगों में डूबकर आप उन भोगों पर डिपेंड ना रहे। भोगों में सुख नहीं,त्याग में ही सच्चा सुख है,यह ज्ञात होना चाहिए।  संसार के भोगों में पड़ने से कीचड़ में धसते चले जाओगे। जबकि परमात्मा के मार्ग पर चलोगे तो संयम धारण करोगे। सभी को अपनी आत्मा की साधना में लीन होना है, स्वयं को पहचाना ही सम्यक दर्शन है। 


उपाध्याय भगवंत ने कहा कि सभी उपदेशों को सुनते हो लेकिन केवल सुनने मात्र के लिए नहीं। हमें अपने जीवन को सुधारने के लिए सुनना चाहिए। सुनने के साथ जीवन में अमल करना चाहिए। सुनने के साथ भावनात्मक सुधार भी जरूरी है। जब तक आत्म शुद्धि नहीं होगी तब तक भटकाव लगा रहेगा। आत्मा में ही असल आनंद है। संसार में ऐसा कहा जाता है कि भोगों में ही सुख है लेकिन परमात्मा कहते हैं सुख आत्मा में है। आप कितने भी दुख के घेरे में हो आपकी सोच सकारात्मक है तो आप सुखी होंगे। सुख और दुख की चाबी स्वयं के पास है। कोई कुछ भी कह दे हमें सुखी रहना है या दुखी है हमारे पास है।


उपाध्याय भगवंत ने कहा कि सत्य की पहचान बहुत आवश्यक है। ये शरीर बदलते रहेंगे लेकिनआत्मा वही रहेगी, इसलिए आत्मा को पहचानो और आत्मा का कल्याण करो। आप दिखने वालों को देख रहे हो लेकिन हमें देखने वाले को देखना है। परमात्मा की कही देशना पर ध्यान केंद्रित करना है। इसे पाने के बाद कुछ भी पाने की इच्छा ना हो। मन को सुधारना ऊंचा काम है लेकिन उसे सुधारे रखना उससे भी ऊंचा काम है।


उपाध्याय भगवंत ने कहा कि भोग के दीवाने बनकर हम जहां दुख छिपा होता है वहां सुख मान लेते हैं। इस चातुर्मास में सभी अपने आत्मकल्याण के लिए आते हैं। सभी सत्य को समझने का प्रयास कर रहे हैं।।कभी-कभी जो उपदेश शास्त्र नहीं दे पाते वह आदर्श व्यक्ति का जीवन देता है। आदर्श व्यक्ति का जीवन हमेशा लक्ष्य भी दिखता है और मार्ग भी दिखता है। आप भले ही आदर्श व्यक्ति जैसे ना बन पाओ लेकिन उनके जीवन के संघर्ष को समझ अपने जीवन को सुधारने का प्रयास होना चाहिए।

उपाध्याय भगवंत ने कहा कि संस्कार को सुधारने में अधिक समय लगता है लेकिन बिगाड़ने में कम समय लगता है। व्यसन ऐसी चीज है जो हमारे जीवन में आ सकती है लेकिन आसानी से जा नहीं सकती। यही आसक्ति है। दुनिया में बहुत साधन मिलेंगे जिन्हें पैसों से भी खरीदा जा सकता है। ऐसी स्थिति ना आ जाए कि हम उसके गुलाम हो जाएं। त्याग के साथ साधन का उपयोग करें ताकि आप उसके गुलाम ना हो पाएं। पुण्य आना गलत नहीं होता लेकिन पुण्य का उपयोग हम कैसे करते हैं यह महत्वपूर्ण है।



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