जहां गांव तोड़ रहा था 'दम' वहां डॉक्टर कपल ने फूंकी नई जान, पढ़िए स्टेथोस्कोप से स्टार्टअप तक की रोचक कहानी

Updated on 19-12-2025 12:52 PM
नई दिल्‍ली: तमिलनाडु के दूरदराज के इलाके सिट्टीलिंगी घाटी में डॉ. रेगी जॉर्ज और डॉ. ललिता रेगी ने 'सोशल मेडिसिन' का ऐसा मॉडल पेश किया है, जो केवल दवाओं तक सीमित नहीं है। 1993 में एक छोटी सी झोपड़ी से स्वास्थ्य सेवा शुरू करने वाले इस जोड़े ने महसूस किया कि बीमारी का असली कारण गरीबी, कर्ज और कुपोषण है। उन्होंने इलाज के साथ खुद खेती और रोजगार के काम में उतरने का फैसला किया। जैविक खेती और हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया। आज उनकी यह पहल 4 करोड़ रुपये से अधिक के टर्नओवर वाले सफल वेंचर में तब्‍दील हो चुकी है। इसने न केवल शिशु मृत्यु दर को कम किया, बल्कि ग्रामीणों को कर्जमुक्त कर पलायन भी रोक दिया है। आइए, यहां डॉ. रेगी जॉर्ज और डॉ. ललिता रेगी की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।

अस्पताल से आर्थिक बदलाव की नींव

यह कहानी 1993 में शुरू हुई जब डॉ. रेगी और डॉ. ललिता ने दूरदराज के आदिवासी क्षेत्र सिट्टीलिंगी को अपनी कर्मभूमि चुना। वहां स्वास्थ्य सुविधाएं शून्य थीं। शिशु मृत्यु दर 150 (प्रति 1000) थी। उन्होंने स्थानीय महिलाओं को ही नर्स और स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में प्रशिक्षित किया। आज वह छोटा सा प्रयास 35 बेड के आधुनिक अस्पताल में बदल चुका है, जहां पिछले 20 वर्षों में एक भी प्रसवकालीन मृत्यु दर्ज नहीं हुई। लेकिन, डॉक्टरों ने पाया कि असल समस्या अस्पताल के बाहर थी। किसानों का कर्ज, कुपोषण और काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन।

जैविक खेती और 'SOFA' का उदय

बीमारी की जड़ों को काटने के लिए डॉक्टरों ने 2003 में पदयात्रा की। पाया कि रासायनिक खेती ने किसानों को कर्जदार बना दिया है। उन्होंने किसानों को जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग के लिए प्रेरित किया। 2005 में मात्र 4 किसानों के साथ शुरू हुआ 'सिट्टीलिंगी ऑर्गेनिक फार्मर्स एसोसिएशन' (SOFA) आज 700 किसानों की कंपनी है। इसका टर्नओवर 3 करोड़ रुपये है। उन्होंने बिचौलियों को खत्म कर सीधे बाजार से संपर्क साधा, जिससे किसानों की आय बढ़ी और वे कर्ज के चंगुल से बाहर निकल आए।

लोकल प्रोसेसिंग से जीती जंग

स्वास्थ्य को आर्थिक लाभ से जोड़ने के लिए SOFA ने घाटी में ही मिलेट (बाजरा) प्रोसेसिंग केंद्र स्थापित किया। अब ग्रामीण राशन के पॉलिश चावल के बजाय खुद के उगाए पोषक अनाज खा रहे हैं। इससे महिलाओं और बच्चों में एनीमिया और कुपोषण की समस्या कम हुई है। सौर ऊर्जा से चलने वाली मशीनों के जरिए अब वहां तेल, शहद और साबुन जैसे उत्पाद भी तैयार होते हैं। 'खेत से थाली तक' के इस मॉडल ने यह सुनिश्चित किया कि किसान अपनी उपज का एक हिस्सा खुद के उपभोग के लिए रखें, जिससे स्वास्थ्य में सुधार हुआ।

भविष्‍य की बड़ी है योजना

खेती के साथ महिलाओं के लिए 'पोरगई' (लंबाडी बोली में जिसका अर्थ है 'गर्व') नाम की हस्तशिल्प इकाई बनाई गई। आज 60 से अधिक महिलाएं कढ़ाई और सिलाई के जरिए 1 करोड़ रुपये से अधिक का बिजनेस कर रही हैं। डॉक्टरों का यह 'सिट्टीलिंगी मॉडल' साबित करता है कि स्वास्थ्य सेवा केवल अस्पताल की दीवारों के भीतर नहीं, बल्कि मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बेहतर जीवन स्तर में बसती है। अब यह टीम कलरायण पहाड़ियों में एक बड़ा अस्पताल बनाकर इस मॉडल को और विस्तार देने की तैयारी में है।


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