क्या मजिस्ट्रेट को दिए बयान से करप्शन केसों में कनविक्शन बढ़ेगा? जानें महाराष्ट्र में क्या तैयारी

Updated on 07-11-2023 12:48 PM
सुनील मेहरोत्रा, मुंबई : रिश्वत के केसों में सरकारी कर्मचारी पकड़े तो बहुत जाते हैं, लेकिन जब उनसे जुड़े मुकदमों में फैसला आता है, तो प्राय: यह आरोपी बरी हो जाते हैं। रिश्वत के केसों में महाराष्ट्र में कनविक्शन रेट सिंगल डिजिट में है। महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों को महाराष्ट्र एसीबी अरेस्ट करती है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई सीबीआई का ऐंटि करप्शन ब्यूरो करता है। महाराष्ट्र एंटि करप्शन ब्यूरो (एसीबी) के अडिशनल डीजी विश्वास नागरे पाटील ने पिछले सप्ताह नाशिक में विजिलेंस सप्ताह के दौरान एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि जिससे रिश्वत मांगी गई और उसने एफआईआर दर्ज करवाई, उसका यदि मजिस्ट्रेट के सामने तत्काल बयान ले लिया जाए, तो रिश्वत के केसों में कनविक्शन रेट बढ़ जाएगा। मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी के सेक्शन 164 के तहत बयान लिया जाता है। यह बयान कोर्ट में मान्य होता है। तब शिकायत करने वाला मुकदमे के दौरान अपने बयान से मुकर नहीं सकता। यदि वह मुकरा, तो खुद उसके खिलाफ मुकदमा चलेगा।

पहले नहीं दर्ज हुए बयान

रिटायर्ड अडिशनल डीसीपी विलास तुपे कहते हैं कि उन्होंने साल 1987 से 1994 तक और फिर साल 2003 से 2007 तक एसीबी में काम किया है। उनके समय में कभी भी एसीबी में एफआईआर दर्ज कराने वाले का मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज नहीं हुआ। एक अधिकारी के अनुसार, वैसे भी, जो एफआईआर करवाता है, तो पुलिस उस एफआईआर पर उसके सिग्नेचर लेती है। इस सिग्नेचर की एक वैल्यू होती है। हां, पुलिस गवाहों के जब स्टेटमेंट लेती है, तो सीआरपीसी के सेक्शन 161 के तहत लेती है, जिसमें गवाह के सिग्नचेर लेने जरूरी नहीं होते। अक्सर मुकदमे के दौरान यह गवाह ही पलट जाते हैं।

आरोपी करते हैं शिकायतकर्ता को 'मैनेज'

एक अन्य अधिकारी के अनुसार, चूंकि रिश्वत के केसों में गिरफ्तार आरोपी सरकारी अधिकारी होते हैं, ताकतवर होते हैं, तो गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलने पर शिकायतकर्ता को खुद या किसी और अधिकारी के जरिए किसी न किसी तरह मैनेज करने की कोशिश करते हैं और फिर मुकदमे के दौरान बरी हो जाते हैं। इस अधिकारी के अनुसार, शायद मैनेज करने की इन कोशिशों पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए ही विश्वास नागरे पाटील ने हर शिकायतकर्ता का मजिस्ट्रेट के सामने बयान देने का सुझाव दिया होगा।

पान वालों, सब्जी वालों के पास रखी जाती है रिश्वत की रकम

इस अधिकारी के अनुसार, ज्यादातर केसों में रिश्वत मांगने वाला सामने वाले से कहता है कि वह इतनी-इतनी रकम किसी पान वाले, सब्जी वाले या किसी किराने वाले दुकानदार के पास रख दे। सामने वाला यह रकम वहां छोड़ जाता है और रिश्वत लेने वाला वहां से रकम ले लेता है। कई बार वहीं से रकम लेते वक्त ही आरोपी रंगे हाथ पकड़ा जाता है। यह सब्जी वाले, दूध वाले या किराना वाले बाद में एसीबी के गवाह बन जाते हैं, लेकिन जब रिश्वत लेने वाला अधिकारी गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलने पर शिकायतकर्ता को मैनेज करने की कोशिश करता है, तो वह शिकायकर्ता पर दबाव डालकर सब्जी वालों, दूध वालों या किराना वालों को भी मैनेज करवाता है, कि तुम मुकदमे के दौरान कोर्ट में होस्टाइल यानी मुकर जाना। गवाहों के मुकरने के बाद आरोपी के बरी होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए इस अधिकारी के अनुसार, एसीबी को रिश्वत से जुड़े किसी ट्रैप के बाद सिर्फ शिकायतकर्ता का नहीं, हर गवाह का भी, जिसके पास रिश्वत देने वाले द्वारा रकम रखी जाती है, उन सबका भी मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करवाना चाहिए। इससे रिश्वतखोर अधिकारी को बहुत मजबूती से एसीबी कोर्ट में कनविक्ट करवा सकती है।

फॉरेंसिक एविडेंस भी दिलाते हैं सजा

यदि शिकायतकर्ता या गवाह कोर्ट में किसी भी वजह से मुकर जाए, तो एक अन्य अधिकारी के अनुसार, एसीबी फॉरेंसिक एविडेंस से भी आरोपी को कनविक्ट करवा सकती है। इस अधिकारी ने बताया कि जब हम ट्रैप लगाते हैं, तो शिकायतकर्ता से कहते हैं कि वह रिश्वत मांगने वाले से रिश्वत की रकम कम करने के लिए कहे। इस दौरान हम रिश्वत मांगने वाले और जिससे रकम मांगी गई है, उसके फोन टैप कर लेते हैं। बाद में हम रिश्वत मांगने वाले और देने वाले दोनों के वॉयस सैंपल फॉरेंसिक लैब में भेजते हैं और कोर्ट को लैब की रिपोर्ट भेजते हैं।

पिछले साल की तुलना में 13 प्रतिशत ज्यादा अरेस्ट

इस साल महाराष्ट्र में अब तक 700 से ज्यादा सरकारी कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े गए हैं। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में 13 प्रतिशत ज्यादा है। पुलिस और रेवन्यू डिपार्टमेंट के लोग सबसे ज्यादा रिश्वत लेते पकड़े जाते हैं।


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