छिंदवाड़ा में भाजपा का 'दिखावा' मतदान बढ़ाने में बना बाधक, आंतरिक प्रबंधन भी कमजोर

Updated on 20-04-2024 12:55 PM
भोपाल। मध्य प्रदेश में पहले चरण की छह सीटों पर अपेक्षा से कम हुए मतदान ने एक बार फिर राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ाई है। कहा जा रहा है कि छिंदवाड़ा, जबलपुर और सीधी जैसी सीटों पर अति आत्मविश्वास के कारण मतदान लक्ष्य के अनुरूप नहीं हो पाया।

छिंदवाड़ा में पिछले लोकसभा चुनाव यानी वर्ष 2019 में 82.39 प्रतिशत मत पड़े थे। इस बार भाजपा का प्रयास था कि मत प्रतिशत 83 से अधिक ले जाया जाए लेकिन पार्टी का 'दिखावा' यानी ऊपरी माहौल भारी पड़ गया। अधिकांश नेता कांग्रेस से आए नेताओं को मंच पर लिए-लिए फिरते रहे और बूथ प्रबंधन पर अपेक्षा अनुसार ध्यान नहीं दे पाए।

देशभर में चर्चित इस सीट में जहां कांग्रेस नेता कमल नाथ ने अपने आंतरिक प्रबंधन की दम पर चप्पा-चप्पा छान मारा और भावनात्मक कार्ड के भरोसे मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की। इधर, बालाघाट-मंडला जैसे आदिवासी अंचल में हुई बंपर वोटिंग ने उन प्रत्याशियों के चेहरे पर लालिमा ला दी, जिन्हें हारा हुआ माना जा रहा था। शहडोल संसदीय सीट में कोई आमूलचूल बदलाव की उम्मीद नहीं थी इसलिए कम मतदान के बावजूद वहां कोई अंतर पड़ने की उम्मीद नहीं है।

मंडला में 'मतदान' बढ़ाने में भाजपा सफल

बात मंडला में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सभा से शुरू की जाए तो बेहतर होगा। इस सभा का माहौल देखकर अंदाज लग रहा था कि यहां भाजपा के अनुरूप 'मतदान ' नहीं हो पाएगा। इसकी कई वजह भी थीं। पहली, भाजपा प्रत्याशी फग्गन सिंह कुलस्ते कुछ दिनों पहले ही विधानसभा चुनाव हारे थे इसलिए ऐसा माहौल बना दिया गया था कि हारा हुआ घोड़ा कितना दौड़ेगा। इसके बावजूद भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को बूथ तक पहुंचाने में सफल रही। वहीं, कांग्रेस कई बूथ तक अपने एजेंट भी नहीं पहुंचा पाई।

नई ज्वाइनिंग से भाजपा को नुकसान

छिंदवाड़ा लोकसभा में मतदान प्रतिशत का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि भाजपा ने यहां कई गलतियां कीं। पहली, मोदी केंद्रित चुनाव न बनाकर विवेक बंटी साहू पर चुनाव लड़ा। दूसरी, जिन नेताओं को कांग्रेस से लाए, उन्हें ऐसे सिर पर बैठाया कि पुराना कार्यकर्ता नाराज हो गया।

इसी वजह से कई विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 'मतदान ' बढ़ाने के बजाय केवल औपचारिकता निभाई। भाजपा के मंत्र से आयातित नेताओं को रोड शो और भाषण दिलाने ने आग में घी का काम किया। कहीं न कहीं नई ज्वाइनिंग भाजपा के लिए 'मतदान ' बढ़ाने के लिए लाभप्रद नहीं रही।


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