श्रीमंत की छवि तोड़कर केसरिया रंग में रंगे ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया

Updated on 02-05-2024 12:21 PM
भोपाल। केसरिया रंग के साथ रगों में दौड़ती राजशाही का तालमेल यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया की नई पहचान, जो उन्हें जनता के करीब पहुंचा रही है, वहीं लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित कर रही है। यह बदलाव सिंधिया की ‘श्रीमंत’ की छवि से अलग भाजपा के केसरिया रंग को भी गहरा कर रही है।

ज्योतिरादित्य चार वर्ष पहले तक कांग्रेस में अपने पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सियासी व शाही विरासत के साथ आगे बढ़ रहे थे, तब गाहे-बगाहे श्रीमंत की छवि अपना अलग प्रभाव रखती थी, लेकिन 2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद से वह लगातार केसरिया रंग में रंगे हुए हैं।

लोकसभा चुनाव में गुना-शिवपुरी संसदीय सीट से भाजपा के प्रत्याशी बनने के साथ ही यह केसरिया रंग जनता से जुड़ाव का जनता के लिए सबसे आसान माध्यम बन गया है। सिंधिया बतौर कांग्रेस प्रत्याशी पिछला लोस चुनाव इसी सीट से भाजपा के केपी सिंह यादव से हार गए थे। उन्होंने हार की वजह तत्कालीन मुख्यमंत्री कमल नाथ एवं दिग्विजय सिंह के खेमों को मानते हुए कांग्रेस से अलग होने का मन बना लिया था। भाजपा में वह ‘श्रीमंत’ की छवि तोड़कर कार्यकर्ता की छवि गढ़ने में सफल रहे हैं।

सिंधिया परिवार ही जीतता रहा

वर्ष 2019 का चुनाव छोड़ गुना-शिवपुरी सीट से सिंधिया परिवार या उनका समर्थक ही जीतता रहा है। प्रियंका गांधी वाड्रा व राहुल गांधी की इच्छा सिंधिया को हराने की बताई जाती है, लेकिन अब तक कांग्रेस का कोई बड़ा नेता यहां नहीं आया है।

भूल नहीं पा रही कांग्रेस

ज्योतिरादित्य को कांग्रेस छोड़े चार वर्ष हो गए, पर कांग्रेस उन्हें भूल नहीं सकी है। राहुल-प्रियंका से उनकी करीबी भी जगजाहिर रही है। युवा नेताओं की कमी से जुझ रही कांग्रेस को सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद से उपचुनाव 2020, 2023 में विस में पराजय का सामना करना पड़ा। यही कारण है कि सिंधिया को लेकर कांग्रेस की बेचैनी बार-बार सामने आती रहती है।

अपने दम पर चुनौती दे रहे यादव

विस चुनाव के पहले जोर-शोर से भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए राव यादवेंद्र सिंह यादव को पार्टी ने लोस चुनाव में गुना सीट से फिर मौका दिया है। दरअसल, 2019 में यहां से कांग्रेस छोड़कर भाजपा गए केपी सिंह यादव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया था। अब सिंधिया भाजपा से चुनाव मैदान में हैं तो कांग्रेस ने यादव प्रत्याशी मैदान में उतारा है। वह अकेले ही सिंधिया को चुनौती दे रहे हैं। दोनों प्रमुख दल अब प्रचार के लिए दिग्गजों को बुलाने की तैयारी कर रहे हैं।

बात ही नहीं, भोजन भी करते साथ

सिंधिया ने भाजपा के साथ आरएसएस में भी पैठ बना ली है। भाजपा के नेता भी मानते हैं कि सिंधिया अब पार्टी का भविष्य हैं। सिंधिया अनुसूचित जाति के लोगों को स्वयं भोजन परोसाते ही नहीं हैं, बल्कि साथ बैठकर भोजन भी करते हैं। प्रचार के दौरान वह किसानों से उनकी समस्या के बारे में भी पूछताछ करते हैं। प्रचार के दौरान उनके अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं। बुजुर्ग महिलाओं को गले लगाते हैं। महल का प्रभाव होने के कारण आम लोग अब भी सिंधिया के प्रति महाराजा वाला भाव ही रखते हैं और उनके पैर छूने का प्रयास करते हैं, जबकि सिंधिया लोगों को गले लगाते हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं को तवज्जो दे रहे हैं।

इसलिए आसानी से अपनाई विचारधारा

सिंधिया के दादा जीवाजी राव का रुझान भी कांग्रेस के बजाय हिंदू महासभा की तरफ था और दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया तो जनसंघ में सक्रिय रहकर भाजपा के संस्थापकों में से एक रही हैं। यही वजह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को विचारधारा अपनाने में परेशानी नहीं आई।


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