बेतहाशा बढ़ रहे कच्चे तेल के दाम, क्या पेट्रोल-डीजल पर हमें चुकानी होगी ज्यादा कीमत

Updated on 02-10-2023 01:31 PM
नई दिल्ली : कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की चिंता फिर लौट आई है। जून से अब तक कीमतों में 30% की बढ़ोतरी देखी जा चुकी है। इसका दाम 97 डॉलर प्रति बैरल से अधिक पहुंच चुका है, जो इस साल सबसे अधिक है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह बुरी खबर है। हमारा देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी तेल आयात करता है। सवाल है कि भारत क्या इस मुश्किल का सामना कर पाएगा?

दाम क्यों बढ़े?

सबसे पहले ये समझ लें कि अभी दाम बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक और उसके सहयोगियों ने सप्लाई में कटौती करने का फैसला किया है। इसके अलावा चीन में तेल की डिमांड बढ़ी है। वहां कोरोना के कारण लॉकडाउन लंबे समय तक चला, लेकिन उसके बाद आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। अमेरिका में भी खर्च का लेवल अभी मजबूत बना हुआ है।

हमें क्या फर्क पड़ेगा


अगर कच्चे तेल की कीमत और नहीं भी बढ़ी तो भी इससे यहां बाकी चीजों की महंगाई पर असर पड़ेगा। अनाज समेत कई खाद्य पदार्थों के बढ़े दाम के कारण महंगाई की स्थिति पहले ही सिरदर्द बढ़ा चुकी है। महंगाई के सरकारी आंकड़े जब जोड़े जाते हैं तो उसमें पेट्रोल और डीजल के दाम तो जुड़ते ही हैं, माल भाड़े का बढ़ा खर्च भी जुड़ता है।

ब्याज दरें ऊंची रहेंगी

महंगाई रोकने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों को काफी बढ़ा चुका है। इस वक्त पूरी दुनिया में ब्याज दरें ऊंची रखने की मजबूरी है। रिजर्व बैंक इस ग्लोबल हकीकत से मुंह नहीं मोड़ सकता है। कच्चे तेल की महंगाई से ब्याज दरों में नरमी टल जाएगी। अगर ब्याज दरें ऊंची रहीं तो इसका मतलब देश के विकास से समझौता हो सकता है। इसके कारण उधार लेने वाले महंगे कर्ज से बचना चाहेंगे। प्राइवेट सेक्टर निवेश करने से बचेगा।


रुपये पर नजर

रिजर्व बैंक को करंसी पर नजर रखने की भी जरूरत होगी। भारत के पास विदेशी मु्द्रा का अच्छा खासा भंडार है। मगर, तेल खरीदने में विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होने लगे तो यह चिंता की बात होगी। डॉलर के मुकाबले रुपया हाल में 83 के पार जा चुका है। रुपये की ये कमजोरी हर आयात को महंगा कर देगी। वैसे उम्मीद की एक किरण है। आगे चलकर डॉलर की सप्लाई बढ़ सकती है। अगले साल जून में भारत के सरकारी बॉण्ड्स में दुनिया भर के फंड्स ज्यादा डॉलर लगा सकते हैं। ये बॉण्ड दुनिया के एक बड़े बॉण्ड इंडेक्स में शामिल हो जाएंगे।

रूस ने बचाया

एक साल से अधिक समय से हम बड़ी मात्रा में रूसी कच्चे तेल का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें अच्छी डील भी मिली। जून में रूसी कच्चे तेल का औसत भाव सिर्फ 68.17 डॉलर/बैरल पड़ा, जबकि संयुक्त अरब अमीरात से कीमत लगभग 82 डॉलर/बैरल थी। 2022 में भी जब तेल की कीमत 122 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी, तब भी रूस के सस्ते तेल ने हमें महंगाई की मार से बचा लिया था।

अब क्या दिक्कत है

तेल आयात पर हमें रूस से पहले वाली छूट उपलब्ध नहीं है। रूस इस बात के लिए भी तैयार नहीं कि रुपये में बिल चुकाया जाए। अच्छी खबर ये है कि कुछ देशों से आयात के लिए रुपये में भुगतान के विकल्प खुल गए हैं। जैसे संयुक्त अरब अमीरात से खरीदारी के बिल का निपटान रुपये में किया गया। ऐसे और समझौते हुए तो प्रेशर कम होगा।

पेट्रोल का क्या होगा

पेट्रोल और डीजल की कीमत में तेल कंपनियों को किसी भी दिन बदलाव का अधिकार है, लेकिन इसे पिछले साल अप्रैल के बाद से नहीं बढ़ाया गया है। पिछले साल भी दाम बढ़ाने की खास वजह थी। रूस ने यूक्रेन पर अटैक किया तो कच्चे तेल के दाम बढ़ गए थे। उस वक्त जो घाटा हुआ, उसे इस साल रिकवर करने की कोशिश हुई। जून से पहले तक 7 रुपये प्रति लीटर ओवर रिकवर हो रहा था। हाल तक अंदाजा लगाया जा रहा था कि पेट्रोल और डीजल के दाम में कटौती हो सकती है। रसोई गैस के दाम घटने के बाद इस चर्चा ने और जोर पकड़ा।

चुनाव सामने हैं

इस वक्त तेल कंपनियों को हर लीटर पर करीब साढ़े सात रुपये की रिकवरी कम हो रही है। कुछ समय बाद विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और अगले साल आम चुनाव हैं। इससे पहले सरकार तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने की इजाजत देगी, इसकी संभावना नहीं जताई जा रही है, भले ही कच्चे तेल के दाम बढ़ क्यों न जाएं।


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