शक्सगाम वैली से क्या सियाचिन को भारत से छीनना चाहता है चीन, POK तक बना रहा रोड, कितना बड़ा खतरा?

Updated on 13-01-2026 01:15 PM
बीजिंग/नई दिल्ली: चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने सोमवार को जम्मू और कश्मीर में शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को खारिज कर दिया। सीमा मुद्दों और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के बारे में पूछे जाने पर माओ ने कहा, "जिस इलाके का आपने जिक्र किया है, वह चीन का है। चीन के लिए अपने क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण करना पूरी तरह से सही है।" यानि, चीन ने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर से जुड़े संवेदनशील इलाके शक्सगाम वैली (Shaksgam Valley) पर अपना दावा दोहराकर भारत-चीन संबंधों में नया तनाव पैदा कर दिया है। चीन का यह बयान ऐसे समय आया है जब सैटेलाइट तस्वीरों और खुफिया रिपोर्टों से पता चला है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) शक्सगाम वैली में करीब 16,000 फीट की ऊंचाई पर एक सड़क का निर्माण कर रही है।

9 जनवरी को भारत ने शक्सगाम घाटी में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के जरिए चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण को "अवैध और अमान्य" बताते हुए दृढ़ता से खारिज कर दिया था। भारत ने कहा था कि यह क्षेत्र भारत का "अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा" है। यानि शक्सगाम वैली को लेकर भारत और चीन के बीच नया विवाद शुरू हो गया है। ये इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि शक्सगाम घाटी के उत्तर में पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) का शिनजियांग प्रांत, दक्षिण और पश्चिम में POJK के उत्तरी क्षेत्र और पूर्व में सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र है। यानि, ये काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसके रणनीतिक मायने है, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में चीन की मौजूदगी, सियाचिन के लिए खतरा पैदा करता है।
शक्सगाम वैली का भूगोल और भारत के लिए रणनीतिक महत्व
शक्सगाम वैली का भूगोल इसे काफी ज्यादा संवेदनशील और उससे भी ज्यादा खतरनाक बनाता है। यह इलाका उत्तर में चीन के शिनजियांग प्रांत, दक्षिण और पश्चिम में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoJK) के उत्तरी क्षेत्र और पूर्व में सियाचिन ग्लेशियर से सटा हुआ है। यह पूरी घाटी कराकोरम पर्वतमाला के उत्तर में स्थित है और समुद्र तल से इसकी औसत ऊंचाई 14,000 से 15,000 फीट के बीच है। यहां से निकलने वाली शक्सगाम नदी आगे जाकर यारकंद नदी में मिलती है, जो चीन के लिए सामरिक लिहाज से अहम तारिम बेसिन तक जाती है। इसी वजह से चीन लंबे समय से इस क्षेत्र को अपने पश्चिमी मोर्चे की सुरक्षा से जोड़कर देखता है। वो इसके जरिए भारत पर रणनीतिक प्रेशर बनाकर रखना चाहता है। लेकिन भारत के लिए यह इलाका इसलिए और ज्यादा अहम हो जाता है, क्योंकि शक्सगाम वैली, सियाचिन ग्लेशियर और साल्टोरो रिज के ठीक उत्तर में स्थित है, यानी यहां किसी भी प्रकार का चीनी सैन्य ढांचा, सीधे तौर पर सियाचिन की सुरक्षा के लिए गभीर खतरे पैदा करता है।
सियाचिन के लिए कैसे खतरा बन गया है चीन?
भारत के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द वही सड़क है, जिसे चीन बना रहा है। ये सड़क कराकोरम हाईवे को अपर शक्सगाम वैली से जोड़ने की दिशा में बनाई जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक यह सड़क अगर आगे बढ़ती है तो यह अगिल पास (करीब 16,300 फीट) को पार करते हुए ऊपरी शक्सगाम इलाके तक पहुंच सकती है, जो सियाचिन ग्लेशियर के काफी करीब है। सामरिक लिहाज से यह सड़क चीन को एक वैकल्पिक लॉजिस्टिक रूट दे सकती है, जिससे वह भारी सैन्य उपकरण, तोपखाने और रॉकेट सिस्टम को शक्सगाम वैली तक तेजी से पहुंचा सके। इसका मतलब यह हुआ कि भविष्य में चीन सियाचिन के भारतीय ठिकानों पर उत्तर दिशा से दबाव बना सकता है, जबकि पाकिस्तान पहले से ही दक्षिण और पश्चिम की ओर मौजूद है। यह स्थिति भारतीय सेना के लिए एक संभावित "डबल फ्रंट थ्रेट" यानी दोतरफा खतरे का संकेत देती है।
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शक्सगाम वैली और सियाचिन को लेकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने लिखा है कि "1963 में पाकिस्तान के साथ हुए समझौते में चीन ने माना था कि शक्सगाम घाटी पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं है। तो फिर यह चीन का "अपना इलाका" कैसे बन गया, जब इसे किसी ऐसे व्यक्ति ने ट्रांसफर किया जिसका इस पर पहले से कोई अधिकार नहीं था? 1962 की लड़ाई के बाद चीन ने J&K के इस इलाके पर कब्जा करने का यह मौका देखा।"
क्या सियाचिन के लिए सीधा सैन्य खतरा बन सकता है चीन?
हालांकि रणनीतिक नक्शे पर खतरा बड़ा दिखता है, लेकिन जमीनी हकीकत काफी मुश्किल है। शक्सगाम वैली और सियाचिन के बीच कराकोरम रेंज की ऊंची और बर्फीली दीवार खड़ी है, जहां कई चोटियां 6,500 मीटर से भी ज्यादा ऊंची हैं। इन पहाड़ों को पार करने के लिए सिर्फ कुछ ही दुर्गम दर्रे हैं, जैसे इंदिरा कॉल (पूर्व और पश्चिम) और तुर्किस्तान ला। किसी भी बड़े सैन्य अभियान के लिए यहां से सैनिकों को उतारना, उन्हें सप्लाई देना और लंबे समय तक टिकाए रखना बेहद मुश्किल है। बावजूद इसके, चीन लंबी दूरी के मल्टी-रॉकेट लॉन्च सिस्टम (MRLS) और आर्टिलरी के जरिए सियाचिन के उत्तरी हिस्सों को निशाना बना सकता है, बशर्ते वह शक्सगाम वैली के भीतर पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर ले। यही संभावना भारतीय सेना की चिंता की जड़ है।
1963 का समझौता, CPEC और भारत का सिरदर्द
भारत का साफ रूख है कि 1963 का चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्य नहीं है। पाकिस्तान के पास उस समय जम्मू-कश्मीर के इस हिस्से पर कोई संप्रभु अधिकार ही नहीं था। इसी समझौते के तहत पाकिस्तान ने लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को सौंप दिया था, जिसे भारत आज भी अपना क्षेत्र मानता है। CPEC इसी विवादित जमीन से होकर गुजरता है, इसलिए भारत ने इसे भी अवैध करार दिया है। भारत ने पिछले दो वर्षों में कम से कम दो बार चीन के समक्ष औपचारिक विरोध दर्ज कराया है और स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता में भी इस मुद्दे को उठाया गया है। लेकिन 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से भारत-चीन सीमा वार्ता काफी समय के लिए बंद रही, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।

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