डोनबास है यूक्रेन के कलेजे का टुकड़ा, काटकर पुतिन के हाथों में कैसे रख दें जेलेंस्की... दुश्मन का दिल क्यों छीन लेना चाहता रूस?

Updated on 19-08-2025 04:37 PM
कीव/मॉस्को: यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमीर जेलेंस्की अगर आज ऐलान कर दे कि यूक्रेन, डोनबास क्षेत्र को रूस को सौंपने के लिए तैयार हो चुका है, तो आज शाम तक पुतिन युद्ध खत्म होने की घोषणा कर देंगे। लेकिन अगल जेलेंस्की ऐसा कहते हैं तो इसका मतलब यूक्रेन के सीने को चीरकर उसका दिल निकालकर पुतिन के हाथों में रखने जैसा होगा। पुतिन यही चाहते हैं। रूस हर हाल में डोनबास चाहता है और यूक्रेन प्रतिरोध पर डटा हुआ है। जेलेंस्की शायद डोनाल्ड ट्रंप नाम के सौदागार को नहीं समझा सकते कि देश से उसका दिल, उसकी आत्मा नहीं छीनी जा सकती है और अगर ऐसा हुआ तो वो देश फिर मुर्दा हो जाएगा।

यूक्रेन की लड़ाई अब डोनबास की हार और जीत पर निर्भर है। डोनबास इलाका, जिसमें दो प्रमुख क्षेत्र डोनेत्स्क और लुहान्स्क आते हैं, वो लंबे समय से रूस की जियो-पॉलिटिकल आकांक्षाओं का हिस्सा रहा है। पुतिन ने हमेशा से डोनबास को रूस में मिलाने की इच्छा रखी है। सोवियत संघ के सयम यह इलाका औद्योगिक शक्ति का प्रतीक था, यहां कोयले की खदानें थीं, इस्पात के कारखाने थे और उपजाऊ कृषि भूमि मौजूद थी। सोवियत संघ को शक्तिशाली बनाने में डोनबास का बड़ा योगदान था, लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद जब एक नए देश यूक्रेन का जन्म होता है तो डोनबास उसके हिस्से में चला जाता है।
डोनबास को क्यों छीन लेना चाहता है रूस?
डोनबास की सबसे बड़ी खासियत उसका समुद्र किनारे बसा होना है। जैसे अरब सागर के किनारे बसे मुंबई का महत्व भारत के लिए है, या कराची का महत्व पाकिस्तान के लिए है, उसी तरह से डोनबास का महत्व यूक्रेन के लिए है। आजोव सागर से सटे इस भूभाग की नदियां और रेल नेटवर्क इसे सामरिक रूप से काफी ज्यादा अहम बना देते हैं। लेकिन डोनबास, यूक्रेन का वह हिस्सा भी है, जहां रूसी भाषा बोलने वाली आबादी सबसे ज्यादा संख्या में है और कई इलाकों में यूक्रेन का हमेशा से विरोध होता रहा है। डोनबास को वापस रूस में मिलाने की भी बात सालों से होती रही है। यही वजह है कि 2014 में क्रीमिया पर कब्जे के बाद व्लादिमीर पुतिन ने जब यूक्रेन को अस्थिर करने की शुरुआत की, तो डोनबास उनके लिए सबसे आसान लक्ष्य बन गया। डोनबास भले यूक्रेन के लिए अहम हो, लेकिन डोनबास की एक बड़ी आबादी में यूक्रेन के लिए कोई अपनापन या प्रेम नहीं है। वो रूस में मिल जाना चाहते हैं।
इसी का फायदा उठाकर रूस ने कई सालों तक डोनबास को अस्थिर रखा और जब फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमला किया तो स्थानीय लोगों की मदद का फायदा उठाकर रूसी सैनिक पूरे इलाके में फैल गये। डोनबास के दो हिस्से हैं, लुहान्स्क और डोनेट्स्क... इन दोनों पर रूस का नियंत्रण हो गया। यूक्रेन के मुताबिक 2014 के बाद से डोनबास में जो मिलिशिया युद्ध शुरू हुआ, उसमें कम से कम 14 हजार से ज्यादा लोग मारे गये हैं। 2014 के बाद से कम से कम 15 लाख यूक्रेनियन इस क्षेत्र को छोड़कर जा चुके हैं और 30 लाख से ज्यादा रूसी भाषी लोग अभी भी इस क्षेत्र में रहते हैं। डोनबास के जिन क्षेत्रों पर रूस का नियंत्रण होता गया, रूस ने उन क्षेत्रों के नागरिकों को रूसी पासपोर्ट देना शुरू कर दिया।\
डोनबास पर रूस के कब्जे की कहानी
फरवरी 2022 में हमले से ठीक पहले पुतिन ने डोनबास के दोनों क्षेत्रों लुहान्स्क और डोनेत्स्क को अलग देश के तौर पर मान्यता दे दी और फिर फर्जी जनमत संग्रह कराकर लुहान्स्क और डोनेत्स्क को रूस में शामिल कर लिया। उसके बाद उसने यूक्रेन पर हमला किया और डोनबास के ज्यादातर हिस्सों पर कब्जा कर लिया और अब रूस चाहता है कि यूक्रेन, डोनबास को पूरी तरह से भूल जाए। आज भी रूस के पास डोनेत्स्क का लगभग 70% और लुहान्स्क का लगभग पूरा हिस्सा है, लेकिन कई औद्योगिक शहर जैसे स्लोवियांस्क और क्रामाटोर्स्क अब भी यूक्रेन के नियंत्रण में हैं। स्लोवियांस्क और क्रामाटोर्स्क, दो ऐसे शहर हैं, जिसे भेदने में अभी तक रूस नाकाम रहा है। यूक्रेन ने अमेरिका की मदद से इन दोनों क्षेत्रों को किला बना दिया है।

यानि अगर जेलेंस्की डोनबास को छोड़ देते हैं तो इसका मतलब ये होगा कि यूक्रेन का मध्य मैदान रूस के अगले हमले के लिए पूरी तरह से खुल जाएगा। यही वजह है कि जेलेंस्की बार-बार कहते हैं कि यह संघर्ष सिर्फ यूक्रेन की जमीन का नहीं बल्कि पूरे यूरोप के "रूल-बेस्ड इंटरनेशनल ऑर्डर" का है। यानी अगर रूस को युद्ध के बदले जमीन मिलती है तो यह मिसाल आने वाले दशकों में यूरोप और एशिया दोनों के लिए बेहद खतरनाक होगी। यानी डोनबास ही वो क्षेत्र है जो युद्ध को रूकने नहीं दे रहा है। रूस के लिए यह भूभाग अपनी राष्ट्रीय पहचान और रणनीतिक गहराई का प्रतीक है, जबकि यूक्रेन के लिए यह उसकी संप्रभुता और राजनीतिक अस्तित्व का सवाल है। जबकि पश्चिमी देश अगर डोनबास पर हार मान लेते हैं तो ये उनकी सामूहिक हार होगी और रूस का अगला वार उनपर होने का रास्ता खुल जाएगा।


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