इग्नू के दीक्षा समारोह में उपाधि पाकर खिल उठे चेहरे, फिर याद आए परीक्षा के वो दिन

Updated on 21-02-2024 12:33 PM
 भोपाल। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय का 37वां दीक्षा समारोह सोमवार को हुआ। कार्यक्रम इग्नू क्षेत्रीय केन्द्र के सभागार में आयोजित हुआ, जहां 1836 अहर्य अभ्यर्थियों में से 200 से भी अधिक विद्यार्थियों को व्यक्तिगत रूप से उपाधि प्रदान की गई। क्षेत्रीय केन्द्र के समारोह में कुलपति मध्यप्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय डा. संजय तिवारी विशिष्ट अतिथि ने उपाधि धारकों को संबोधित किया। भोपाल क्षेत्रीय केंद्र पर 710 मास्टर लेवल प्रोग्राम, 467 ग्रेजुएशन लेवल प्रोग्राम, 387 पीजी डिप्लोमा एवं डिप्लोमा तथा 272 उपाधियां सर्टिफिकेट अभ्यर्थियों को प्रदान किए गए। भोपाल केंद्र से 1056 विद्यार्थियों को प्रथम श्रेणी एवं 43 विद्यार्थियों को डिस्टिंक्शन के साथ उपाधियां प्रदान की गईं। इसके अतिरिक्त 33 उपाधियां जेल अध्ययन केंद्र के बंदी छात्रों को भी प्रदान हुई।
भोपाल क्षेत्रीय केन्द्र के तहत 117 विद्यार्थियों को सर्टिफिकेट इन कम्युनिटी हेल्थ की उपाधि प्रदान की गई, जिसके बाद इन अभियर्थियों को भारत सरकार की आयुष्मान योजना के तहत कम्यूनिटी हेल्थ आफिसर के रूप में पोस्ट किया गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा के पाठ्यक्रम ज्योतिष को सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने के लिए 18 विद्यार्थियों को उपाधि प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त पांच केन्द्रीय कारागारों पर संचालित इग्नू अध्ययन केन्द्र से संबंधित 33 बंदियों को भी उपाधि दी गई।इस उपाधि पाकर अभ्यर्थियों के चेहरे खिल उठे, सेवानिवृत्त विद्याथियों को परीक्षा के दिनों की यादें फिर से ताजा हो गई।

79 वर्षीय डा. जय सिंह ने प्राप्त की एमबीए की डिग्री

क्षेत्रीय केंद्र भोपाल पर 79 वर्षीय डा. जय सिंह परिहार ने एमबीए की डिग्री प्राप्त की। लगभग 10 अन्य ऐसे विद्यार्थी रहे, जिन्होंने 60 वर्ष के बाद अपनी जीवन शिक्षा को जारी रखा एवं ज्योतिष लोक प्रशासन तथा हिंदी साहित्य विषयों में डिग्री हासिल की। दीक्षांत समारोह पर एक प्रदर्शनी का भी आयोजन हुआ, इग्नू एमएसडीई प्रसार केन्द्र, जन शिक्षण संस्थान भोपाल एवं क्राइस्ट कालेज भोपाल के विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए हस्थ कलाओं का प्रदर्शन हुआ। इसके अतिरिक्त ब्रह्माकुमारी भोपाल द्वारा छात्रों में नशा मुक्त भारत एवं विनायक कृषि उत्पादक समूह ने मोटे अनाज के फायदे की जागरुकता छात्रों के मध्य में किया।

65 वर्ष की उम्र में पति-पत्नी ने एक साथ पाई उपाधि

इस मौके पर 65 वर्षीय पति-पत्नी ने एक साथ एमए ज्योतिष की उपाधि प्रदान की गई। इसमें स्टेट बैंक आफ इंडिया से सेवानिवृत राज बहादुर गोयल और उनकी पत्नी डा. साधना गोयल ने शामिल रहे। उन्होंने बताया कि हम दोनों ने एक साथ इसका फार्म भरा था। जीवन में कुछ नया करना चाहते थे। इसलिए हमने यह प्रयास किया, जो सफल रहा। उन्होंने बताया कि शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती। इस दौरान हमारी बचपन की यादें ताजा हो गई। वैसा ही किया जैसा बचपन में परीक्षा की तैयारी और परिणाम का इंतजार करते थे।

कविता मेरी जरूरत है, शौक नहीं

वहीं पूर्व आइएएस अशोक शाह ने हिंदी साहित्य में एमए की उपाधि प्राप्त की। वह 1990 बैच के आइएएस अधिकारी रहे। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपना जीवन हिंदी को समर्पित कर दिया है। वह बताते हैं कि आज मैं हिंदी साहित्य में दीक्षित हो गया। मैंने आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग की। साथ ही मुझे हिंदी में लिखने का बहुत शौक रहा। खासकर कविताएं लिखता हूं। मेरी 17 कविताओं की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। एक कहानी की किताब भी शामिल हैं। मैंने सोचा कि हिंदी के अन्य लेखक हैं वो क्या लिखते हैं यह जानने के लिए मैंने एमए हिंदी किया। अपने सेल्फ नालेज को बढ़ाने के लिए यह पढ़ाई की। यह कोर्स दो वर्ष का रहा। युवाओं को हमेशा पसंदीदा विषय की पढ़ना चाहिए। नौकरी को जीवन का उद्देश्य बनाकर नहीं चलना चाहिए। आज सबसे बड़ी चुनौती यहीं है कि लोगों को नहीं हमे उन्हें क्या अच्छा लगता है। हमारे बारे में दूसरा व्यक्ति बताता है। उन्होंने बताया कि कविता मेरी जरूरत है, शौक नहीं। शौक के लिए मैं फिटनेस पर ध्यान देता हूं, जिसमें टेनिस और गोल्फ खेलता हूं। साथ ही साइकिलिंग करता हूं। मेरे लिए मन के लिए कविता और फिटनेस के लिए खेल जरूरी है।

पढ़ाई से बचपन की यादें हुईं ताजा

साथ ही पूर्व आइएएस जगदीश चंद्र जाटिया ने भी हिंदी में एमए की उपाधि ग्रहण की। इग्नू का मैं पुराना विद्यार्थी रहा हूं, लेकिन अब लंबे अंतराल के बाद परीक्षा दी। मैंने हिंदी साहित्य इसलिए चुना कि हिंदी में कविताएं लिखता हूं। समकालीन हिंदी साहित्य के बारे में तो काफी कुछ पता है लेकिन साहित्यकारों के बारे में जानने के लिए यह प्रयास जरूरी था। शुरुआत से ही लगातार पढ़ते रहने का जज्बा था। इस दौरान बचपन की यादें फिर से ताजा हो गईं। आठ से नौ घंटे तक पढ़ाई करता था। मुझे लेखन के अलावा पक्षी दर्शन का भी शौक है। जो मेरे जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। मैं रहने वाला तो नीमच का हूं लेकिन अभी भोपाल में ही हूं। वैश्विक स्तर पर हिंदी ने अपनी अलग पहचान बनाई। हिंदी को लेकर अभिभावकों की सोच बदलने की जरूरत है। युवाओं को हिंदी से जोड़ने की आवश्यकता है। आजकल मेडिकल की पढ़ाई भी हिंदी में ही होने लगी है। आज विश्व के लगभग सभी देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या ज्यादा है।


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