राजनीतिक दलों के लिए वन और वन्यप्राणी नहीं चुनावी मुद्दा, लेकिन चुनाव को करता है प्रभावित

Updated on 22-04-2024 01:01 PM
भोपाल। भले ही वन और वन्य जीव राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मुद्दा न हों लेकिन यह चुनाव को प्रभावित करता जरूर है। इसका ताजा उदाहरण शहडोल संसदीय सीट पर जंगल से सटे ग्रामीण अंचलों में घटता मतदान प्रतिशत है। शहडोल जिले के बुछरो गांव के ग्रामीणों ने बाघ के मूवमेंट को लेकर प्रशासन के समक्ष समस्या निवारण के लिए गुहार लगाई, लेकिन जब कोई हल नहीं निकला तो बाघ के बढ़ते मूवमेंट से परेशान ग्रामीणों ने मतदान से ही दूरी बना ली। यह इस गांव की नहीं बल्कि हर उस क्षेत्र की समस्या है, जो वनों से सटे हैं, वन संपदाओं पर निर्भर हैं, वन्य जीवों के खौफ से जूझ रहे हैं और सरकार की योजनाओं से वंचित हैं।

जंगल से सटे इन वनांचलों में ग्रामीणों की सुध लेने वाला कोई नहीं। यहां सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की हमेशा दरकार रही है, वहीं वन्यजीवों के हमले फसल और जनहानि, बड़ी समस्या है। आए दिन मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। विकास व अतिक्रमण के नाम पर जंगल लगातार नष्ट किए जा रहे हैं। शहर से सटे वनों को कंक्रीट के विकास ने नष्ट कर दिया है। प्रदेश में पेड़ काटकर जंगल को खेतों में परिवर्तित किया जा रहा है। अतिक्रमणकारियों के आगे मैदानी अमला भी नहीं टिक पा रहा है। जंगल घटने का मुख्य कारण विकास और निर्माण कार्यों के लिए सरकारी व निजी भूमि पर पेड़ों की कटाई, अवैध कटाई, खेती के लिए वनों की कटाई, जंगल की जमीन पर अतिक्रमण, अवैध उत्खनन और जंगली जानवरों का शिकार प्रमुख हैं। जंगल काटने का सीधा असर वन्य जीवों, नदियों और पर्यावरण पर पड़ता है और इससे मानव जीवन स्तर खासा प्रभावित होता है।

जंगल को खेत में परिवर्तित करने का सबसे बड़ा उदाहरण बुरहानपुर

प्रदेश में पेड़ काटकर जंगल को खेतों में तब्दील करने का सबसे बड़ा उदाहरण बुरहानपुर जिला है। यहां पिछले पांच वर्ष में दो हजार हेक्टेयर से अधिक जंगल में पेड़ काटकर मैदान बना दिया गया। अतिक्रमणकारी लगातार जंगल को बर्बाद कर रहे हैं। उन्हें रोकने का प्रयास करने वाले वनकर्मी और पुलिस पर हमले हो चुके हैं। इनमें वन अधिकार अधिनियम 2006 का व्यापक असर माना जा रहा है। इस कानून में वर्ष 2005 के पहले से वनभूमि पर काबिज परिवारों को पट्टे देने का प्रविधान है। पिछले वर्षों में मध्य प्रदेश सरकार ने ऐसे पांच लाख से अधिक परिवारों को पट्टे दिए हैं। इसके बाद से ही जंगलों में कटाई तेजी से शुरू हुई है।

बाघों के संरक्षण के लिए नए क्षेत्र करने होंगे विकसित

देश में सर्वाधिक 785 बाघ मध्य प्रदेश में हैं। प्रदेश लगातार टाइगर स्टेट बना हुआ है, लेकिन बाघों को बचाने और उनके संरक्षण की चुनौती भी बड़ा मुद्दा है। वर्ष 2023 में 34 से अधिक बाघों की मौत विभिन्न कारणों से हो चुकी है। पिछले 10 साल में यह आंकड़ा 306 से अधिक रहा है। इनमें अधिकतर मामले शिकार के हैं। जबकि आपसी लड़ाई, कुएं में गिरने या सड़क दुर्घटना में भी बाघों की मृत्यु हुई है। वन्य प्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों के संरक्षण के लिए नए क्षेत्र विकसित करने होंगे। वर्ष 2010 में मध्य प्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा छिना था, इसके बाद शुरू हुए बाघ संरक्षण के प्रयासों का नतीजा रहा कि पिछली गणना में प्रदेश की टाइगर स्टेट का दर्जा फिर मिल गया। हालांकि, बाघों के संरक्षण के लिए वन अमला भी बढ़ाना पड़ेगा। वर्तमान में वनरक्षक, वनपाल, उप वन क्षेत्रपाल और वन क्षेत्रपाल के डेढ़ हजार से अधिक पद रिक्त हैं।

इनका कहना है

वन्य प्राणियों का आवास खत्म कर दिया गया है। पार्क को छोड़ दें जो हमारे कुल वन क्षेत्र का लगभग दो प्रतिशत हैं, तो बाकी पूरा क्षेत्र क्षत-विक्षत हो गया है। यह बहुत बड़ा इकोलाजिकल असुंतलन है, जिसके बहुत अधिक दुष्प्रभाव आने वाले समय में देखने को मिलेंगे। जंगलों की अवैध कटाई, अतिक्रमण के चलते जंगलों में छोटे-बड़े सभी वन्य जीवों का प्राकृतिक रहवास खत्म हो रहा है। जंगल से उतना ही लेना चाहिए, जितना वह स्वत: छोड़ देता है। इस क्षेत्र में बहुत काम करने की जरूरत है।



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