नई दिल्ली: सांसदों और विधायकों के दलबदल को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के प्रस्ताव पर घमासान तेज हो गया है। सिब्बल के प्रस्ताव का कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने स्वागत किया है। जबकि इस प्रस्ताव को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा, असुरक्षित लोकतंत्रों में दलबदल कानून होते हैं, जबकि परिपक्व लोकतंत्रों में ऐसे कानून नहीं होते हैं।कपिल सिब्बल के प्रस्ताव का स्वागत
सौरव दास ने एक्स पर पोस्ट कर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के उस प्रस्ताव का स्वागत किया, जिसमें पार्टी X के चुनाव चिह्न पर जीतने के बाद पैसे या दबाव में पार्टी Y में जाने वाले सांसदों और विधायकों पर 10 साल का प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। दास ने लिखा कि सीजेपी के पहले मांग-पत्र के पांचवें बिंदु में भी यही मांग की गई थी, लेकिन इसमें और सख्त प्रावधान सुझाया गया था।20 साल तक चुनाव लड़ने और सार्वजनिक पद पर रोक की मांग
सौरव दास ने कहा कि मांग-पत्र में दलबदल करने वालों को 20 साल तक किसी भी सार्वजनिक पद पर रहने और चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की मांग की गई थी। उन्होंने लिखा, 'राजनीतिक दलों को तोड़ना, 50-100 करोड़ रुपये देकर सांसदों को खरीदना और सरकारों को गिराना देश के साथ धोखा है।'
उन्होंने आगे कहा कि ऐसा धोखा कभी नहीं होना चाहिए। दास ने एंटी-डिफेक्शन कानून को पुराना बताते हुए आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल ने सत्ता में बने रहने की चाह में इसका दुरुपयोग सुनिश्चित किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि युवा इस व्यवस्था में बदलाव लाएंगे।'परिपक्व लोकतंत्रों में नहीं होता एंटी-डिफेक्शन कानून'
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने एक्स पर लिखा, 'कमजोर लोकतंत्रों में 'दल-बदल विरोधी' कानून होते हैं, जबकि परिपक्व लोकतंत्रों में ऐसे कानून नहीं होते।'
उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे परिपक्व लोकतंत्रों में पार्टी बदलने पर औपचारिक एंटी-डिफेक्शन अयोग्यता कानून नहीं हैं। उनके मुताबिक, इन देशों में वैधानिक दंड के बजाय राजनीतिक परंपराओं, पार्टी के आंतरिक अनुशासन और चुनाव के जरिए मतदाताओं की जवाबदेही पर भरोसा किया जाता है।सिब्बल ने क्या कहा था?
कपिल सिब्बल ने केरल के कोच्चि में 'हॉर्स ट्रेड एंड डेमोक्रेसी' (खरीद-फरोख्त और लोकतंत्र) विषय पर व्याख्यान देते हुए संविधान की 10वीं अनुसूची में बदलाव की वकालत की थी, ताकि पार्टी विलय को 'सामूहिक पलायन के लिए रास्ता' बनाने वाली खामी के रूप में इस्तेमाल न किया जा सके।
उन्होंने कहा था कि मौजूदा कानून के तहत किसी विधायक दल के दो-तिहाई सदस्य यदि दूसरी पार्टी में चले जाते हैं, तो उन्हें दलबदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाता, क्योंकि इसे विलय माना जाता है।