4000 फिल्में कर चुके करण अर्जुन सिंह:12 की उम्र में 20-20 घंटे काम सीखा

Updated on 09-12-2022 07:44 PM

ये है फोली आर्ट। फोली आर्ट यानी फिल्मों में शूटिंग के बाद हर सीन को रियलिस्टिक टच देने के लिए हर चीज के साउंड को एक 10X16 के कमरे में डब किया जाता है। जैसे पैदल चलने से लेकर दरवाजा खुलने, कुर्सी सरकने तक की आवाज। फिल्म में जितना काम हीरो-हीरोइन करते हैं, उससे ज्यादा काम पर्दे के पीछे फोली आर्टिस्ट करते हैं। एक छोटे से स्टूडियो में ढाई घंटे की फिल्म में रियल साउंड इफेक्ट देने में करीब 150 घंटे का समय लगता है।

फिल्म मेकिंग के इस हिस्से के बारे में लोग कम ही जानते हैं। इंडिया में सबसे बड़े फोली आर्टिस्ट हैं करण अर्जुन सिंह। कृष-3, बाहुबली, दंगल, टाइगर जिंदा है जैसी फिल्मों से लेकर दिल्ली क्राइम, पाताल लोक जैसी वेब सीरीज तक, इन सभी में फोली आर्ट का काम इन्हीं ने किया है। ये इंडिया के टॉप फोली आर्टिस्ट हैं, लेकिन यहां पहुंचने का सफर इतना आसान नहीं था। 12 साल की उम्र से ये इस काम को सीख रहे हैं, तब इन्हें रोज 20 घंटे काम करना पड़ता था। इतना काम था कि स्कूल भी हफ्ते में एक-दो दिन ही जा पाते थे।

फोली आर्ट ने इन्हें नाम दिलाया, लेकिन जिंदगी कि शुरुआत एक गुरुद्वारे से हुई, जहां इनका पूरा परिवार एक कमरे में रहता था और वहीं काम करता था। किस्मत बदली और इनके परिवार को जबरन नामी फिल्म प्रोड्यूसर बी.आर. चोपड़ा के फार्म हाउस लाया गया, लेकिन ये जबरदस्ती ही जिंदगी बदलने वाली साबित हुई।

सबसे पहले ये जान लेते हैं कि फोली आर्ट क्या है और फोली आर्टिस्ट कौन होते हैं-

फोली आर्ट- फिल्मों में किरदारों के अलावा जो आवाजें होती हैं जैसे कि तलवारों की आवाज, चलने की आवाज, बारिश की आवाज, ये सभी फोली आर्ट का हिस्सा होती हैं। इसको आप ऐसे समझ लीजिए कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीजों का प्रयोग करके किसी भी फिल्म, शो या सीरीज के लिए आवाजें निकालना ही फोली आर्ट कहलाता है।

फोली आर्टिस्ट- ये काम शूटिंग खत्म होने के बाद पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान किया जाता है। जो कलाकार यह काम करते हैं, उन्हें फोली आर्टिस्ट कहते हैं।

फोली आर्ट में साउंड इफेक्ट्स कैसे तैयार किए जाते हैं

रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीजों का प्रयोग करके फोली इफेक्ट्स को क्रिएट किया जाता है। हवा के बहने की आवाज कपड़ों को लहराकर रिकॉर्ड की जाती है। सूखे पत्तों की आवाज के लिए रील को क्रश किया जाता है। खाली डिब्बों के आवाज के लिए फर्नीचर के टूटने की आवाज को रिकॉर्ड किया जाता है। कीचड़ के लिए पुराने अखबारों को पानी में भिगोकर इस्तेमाल किया जाता है। पत्ता गोभी और तरबूज का इस्तेमाल किसी को चाकू मारने की आवाज के लिए किया जाता है। इन सभी साउंड इफेक्ट्स को महज 10x16 फीट के स्टूडियो में क्रिएट किया जाता है।

आज की स्ट्रगल स्टोरी में पढ़िए, फोली आर्टिस्ट करण अर्जुन सिंह की कहानी, उन्हीं की जुबानी…

गुरुद्वारे में पले-बढ़े

मेरा जन्म मुंबई में हुआ था और वहीं पर मेरी पढ़ाई भी पूरी हुई। पापा मुंबई के ही एक गुरुद्वारे में काम किया करते थे और मेरा पूरा परिवार वहीं गुरुद्वारे में मिले एक कमरे में रहता था। वहां पर सभी सुख-सुविधाएं थीं। हम कुल पांच भाई-बहन थे।

बी.आर चोपड़ा के फार्महाउस पर सिक्योरिटी गार्ड थे पापा

एक दिन गुरुद्वारे में फिल्म प्रोड्यूसर बी.आर चोपड़ा आए थे। उस समय जुहू में उनका एक फार्म हाउस बन रहा था। उसी के लिए उन्हें एक भरोसेमंद सिक्योरिटी गार्ड की तलाश थी। जब बी.आर चोपड़ा ने गुरुद्वारे में मेरे पापा को काम करते हुए देखा तो उन्होंने उसी समय मन बना लिया कि वो उन्हीं को उस फार्म हाउस के लिए बतौर गार्ड रखेंगे। इसके बाद उन्होंने अपने कुछ आदमियों को पापा के पास भेजा और कहा कि कह दो बी.आर चोपड़ा मिलना चाहते हैं।

इसके बाद पापा की उनसे मुलाकात हुई। बी.आर चोपड़ा ने उन्हें कहा कि वो परिवार समेत उनके फार्म हाउस पर चलें और वहां की सिक्योरिटी संभालें। रहने के लिए एक कमरा भी दिया जाएगा इसलिए वो परिवार समेत वहां आ जाएं। पापा ने उनके इस प्रस्ताव के लिए हामी भर दी थी, लेकिन जब ये बात उन्होंने मां को बताई तो वो भड़क गईं। उन्होंने कहा कि वो ऐसे कैसे अपना सब कुछ वहां से छोड़कर बी.आर चोपड़ा के यहां चली जाएं। जहां पर वो इतने सालों से रह रही हैं इसलिए उसे छोड़कर वो नहीं जा सकती हैं। पापा ने उन्हें बहुत मनाया, लेकिन वो नहीं मानी।

जब कुछ दिन बाद भी पापा नहीं गए तो बी.आर चोपड़ा ने अपने कुछ लोगों को भेज दिया था मेरे पूरे परिवार को उठाकर काम पर लाने के लिए। इसके बाद हम जहां रहते थे वहां पर उनके आदमी आ गए और बिना पूछे ही घर का सारा सामान अपनी गाड़ी में डाल दिया। आखिरकार हम लोगों को फार्म हाउस आना पड़ा और वहां पर पापा ने काम शुरू कर दिया।

मां का दिया हुआ शाप सच साबित हुआ

इसी घटना के दौरान ने मां एक आदमी को शाप दे दिया था और बाद में उनका शाप सच भी साबित हुआ था। दरअसल, जब बी. आर चोपड़ा ने हमारे घर को शिफ्ट करने के लिए कुछ लोगों को भेजा था, तब उसी दौरान मां ने उनमें से एक आदमी को शाप दे दिया था। उन्होंने कहा था, ‘जिस तरीके से तुम मुझे मेरे घर से दूर कर रहे हो वैसे ही एक दिन तुम्हारा भी सब कुछ खत्म हो जाएगा। खाने के लाले पड़ जाएंगे और तुम मेरे पास मदद की गुहार लगाने आओगे।’

कुछ सालों बाद मां का ये शाप सच भी हुआ। जब हमारी आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर हो गई थी, तब वही आदमी हमारे घर पर खाने के लिए पैसे मांगने आया था। उस आदमी की हालत बहुत खराब थी। उसको शराब की लत गई थी और पैसे की भी तंगी थी। ऐसी हालत देखकर मां ने उसकी मदद करते हुए कुछ पैसे दिए थे। साथ ही उन्होंने उस घटना का भी जिक्र किया था।

किस्सा फोली आर्ट से जुड़ने का

बी.आर चोपड़ा के फार्म हाउस पर आने के बाद दिन भर स्कूल और शाम को खेलने के बाद मैं उनके स्टूडियो में जाता था। रात में बस वहां फोली आर्टिस्ट ही रहते थे। एक दिन मैंने एक फोली आर्टिस्ट को देखा जो कई तरह की आवाजें निकाल रहा था। इन सभी चीजों को देखकर मैं अचंभित हो गया। इसी के बाद मैंने फैसला किया कि आगे जाकर मैं भी इसी में अपना करियर बनाऊंगा।

मैं सातवीं क्लास में फेल भी हो गया था। इसके बाद पापा मुझे स्टूडियो ले गए और मेरी मुलाकात वहां एक एक्शन डायरेक्टर से कराई। पापा ने कहा, ‘इसे कुछ सिखा दीजिए। पढ़ाई में कमजोर है, पता नहीं आगे जाकर ये कुछ करेगा या नहीं।’ उन्होंने पापा से कहा, ‘चिंता ना करो मै इसे सिखा दूंगा।’

इसके बाद मैं स्कूल से आने के बाद वहां रोज रात को जाता था। जो फोली करता था उसकी थोड़ी बहुत मदद भी करता था। कभी रस्सी लाकर दे देता था, कभी बाहर से पानी भरकर दे देता था। सुबह 3-4 बजे तक वहां रहता था, चीजों को सीखता था। साथ ही दिन में मैं रिकॉर्डिंग स्टूडियो में डबिंग सीखता था क्योंकि वहां काम करने के दौरान मैं एक-दो दिन छोड़कर ही स्कूल जाता था।

कम उम्र में हुई जुड़वां भाइयों की मौत

मेरा मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था। इसी वजह से मां-पापा को मेरे जुड़वां भाइयों से ज्यादा उम्मीद रहती थी, लेकिन उनकी ये उम्मीद भी बहुत जल्दी खत्म हो गई।

छुट्टियों में हम सभी भाई-बहन मां के साथ नानी के घर गए थे। एक दिन खेलते समय मेरे दोनों जुड़वां भाई एक कुएं में गिर गए। दोनों को बचाने की बहुत कोशिश की गई, लेकिन बचाया नहीं जा सका। जिसके बाद पूरा परिवार बिखर सा गया। बाद में मैं ही एकलौता बेटा बचा, जिससे पूरे परिवार को बहुत उम्मीद थी।

12 साल की उम्र में पढ़ाई और 20 घंटे की नौकरी

भाइयों के मौत के बाद मैं बी.आर चोपड़ा स्टूडियो में परमानेंट एम्प्लाई हो गया। दरअसल, वहां दोनों भाई पहले से ही काम करते थे। उन दोनों के निधन के बाद मैं वहां दिन में रिकॉर्डिंग स्टूडियो में डबिंग सीखता और रात में फोली। इस तरह मैं सुबह 8 बजे से लेकर अगली सुबह 4 बजे तक काम करता था। साथ में पढ़ाई भी चलती थी।


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