शेख हसीना को सौंपने के लिए भारत को बाध्य नहीं कर सकते मोहम्‍मद यूनुस, अमेरिकी एक्सपर्ट ने बताया बांग्‍लादेश संग प्रत्यर्पण संधि का सच

Updated on 18-11-2025 02:19 PM
ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई है। आईसीटी ने उन्हें पिछले साल जुलाई-अगस्त में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन को हिंसक तरीके से कुचलने और करीब 1400 प्रदर्शनकारियों की मौत का जिम्मेदार ठहराया है। फैसला आते ही बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, जिसके सलाहकार मोहम्मद यूनुस हैं, उन्होंने भारत से शेख हसीना को सौंपने की मांग कर डाली है। बांग्लादेश तर्क दे रहा है कि ये कोर्ट का फैसला है और शेख हसीना 'मानवता के खिलाफ अपराध' को दोषी पाई गईं हैं।

'मानवता के खिलाफ अपराध', इस शब्द को मोहम्मद यूनुस ने शेख हसीना और भारत के खिलाफ हथियार बनाया है और चूंकी भारत-बांग्लादेश के बीच कैदियों के प्रत्यर्पण को लेकर 2013 में समझौता हुआ था, इसीलिए उस समझौते का हवाला दिया जा रहा है। लेकिन क्या भारत, शेख हसीना को बांग्लादेश को सौंपने के लिए मजबूर किया जा सकता है? आखिर मोहम्मद यूनुस की मंशा क्या है? दिल्ली के पास मोहम्मद यूनुस को काउंटर करने के लिए क्या दांवपेंच हैं, इसे समझना काफी जरूरी हो जाता है।
क्या बांग्लादेश के प्रत्यर्पण अनुरोध को माना जा सकता है वैध?
बांग्लादेश ने 2013 में हुई भारत–बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि का हवाला देते हुए आधिकारिक अनुरोध भेज दिया है, लेकिन कानूनी प्रावधानों, राजनीतिक अपवादों और भारत के घरेलू कानूनों को देखते हुए मामला उतना सीधा नहीं है। इस अनुरोध को इस समझौते के अनुच्छेद 1 और 2 की कसौटी पर जांचने से पता चलता है कि किसी भी व्यक्ति का प्रत्यर्पण तभी संभव है, जब उस पर प्रत्यर्पण योग्य अपराध का आरोप हो, अभियुक्त या दोषसिद्धि हो चुका हो। शेख हसीना के मामले में ICT ने ऐसा वारंट जारी किया है, इसलिए ढाका की ओर से अनुरोध भेजना प्रक्रिया के लिहाज से वैध है। लेकिन असली जटिलता डुअल क्रिमिनैलिटी की शर्त है। यानी अपराध, दोनों देशों के कानूनों में दंडनीय होना चाहिए।बांग्लादेश में "क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी" यानि मानवता के खिलाफ अपराध, देश के युद्ध अपराध कानून के तहत परिभाषित है। लेकिन भारत आमतौर पर ऐसे अपराधों को अंतरराष्ट्रीय अदालतों के संदर्भ में देखता है, घरेलू राजनीतिक घटनाओं के संदर्भ में नहीं। इसीलिए भारत के पास यहां अपने तर्क रखने की खिड़की खुलती है। भारत कह सकता है कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, इसीलिए शेख हसीना का मामला प्रत्यर्पण योग्य नहीं है।दिलचस्प बात यह है कि यह संधि 1971 के युद्ध अपराधों और सीमापार सक्रिय उग्रवादियों के प्रत्यर्पण को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। शायद इसीलिए, संधि बनाते समय शेख हसीना ने कभी अनुमान नहीं लगाया होगा कि इसका इस्तेमाल किसी उनके खिलाफ भी हो सकता है।
भारत के दिग्गज डिप्लोमेट एसडी मुनी से हमने इस मामले की गहराई समझने के लिए उनसे टेलीफोन पर बात की। उन्होंने नवभारत टाइम्स से बात करते हुए कहा कि "भारत किसी भी हाल में शेख हसीना को बांग्लादेश को नहीं सौंप सकता है।" उन्होंने कहा कि "भारत के पास तर्क ये है कि जिस इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ये फैसला सुनाया है, वो खुद वैध नहीं है। इसके अलावा, शेख हसीना पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने हिंसा को उकसाया है, तो फिर ये साबित कैसे होगा? उन्होंने इसको लेकर तो कोई सबूत नहीं दिए हैं। और फिर ग्राउंड पर जो पुलिसवालों पर लोगों को गोली मारने के इल्जाम लगाए गये हैं, वो पुलिसवाले ही हैं, ये कैसे साबित होगा? वो तो कोई भी हो सकता है। इसके अलावा भी देखिए तो इस मामले में तो फौज शामिल हो गई थी। तो जब सेना ऐसे मामलों में शामिल हो जाए तो फिर एक प्रधानमंत्री क्या कर सकता है?"
क्या भारत प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है?
कई एक्सपर्ट अनुच्छेद 6(1) और 8(3) का हवाला दे रहे हैं और यहां वाकई मामला थोड़ा संवेदनशील हो जाता है। अनुच्छेद 6(1) कहता है कि यदि अपराध "राजनीतिक प्रकृति" का है, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। चूंकि शेख हसीना को जब सत्ता से हटाया गया और उनके खिलाफ जो प्रदर्शन किया गया था, वो एक राजनीतिक प्रदर्शन ही था, जो बाद में जाकर शेख हसीना को सत्ता से हटाने की मांग पर आ गई थी और उसके बाद हिंसा शुरू हो गई, इसीलिए शेख हसीना की सत्ता से विदाई एक राजनीतिक आंदोलन का परिणाम है। वहीं, मौजूदा अंतरिम सरकार के सलाहकार मोहम्मद यूनुस शेख हसीना के राजनीतिक विरोधी माने जाते हैं, इसलिए भारत आसानी से तर्क दे सकता है कि पूरा मामला राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में है। अमेरिकी थिंक टैंक द विलसन सेंटर के साउथ एशिया एनालिस्ट माइकल कुलेगमैन यही तर्क दे रहे हैं।इसके अलावा इस संधि का अनुच्छेद 8(3) भी भारत को दांव-पेंच खेलने का बड़ा मौका देता है। इसमें कहा गया है कि अगर प्रत्यर्पण 'गुड फेथ' में मा हो और न्याय के हित में ना हो, तो प्रत्यर्पण रोका जा सकता है। मौजूदा परिस्थितियों में यह तर्क भारत के पास एक मजबूत आधार बन जाता है कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध जैसा प्रतीत होता है। हालांकि बांग्लादेश, अनुच्छेद 6(2) का सहारा लेकर यह दावा कर सकता है कि अपराध राजनीतिक नहीं है, लेकिन ऐसा साबित करना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत मुश्किल होता है और ऐसे मामले सालों साल इंटरनेशनल कोर्ट में चलते हैं। फिर अगर फैसला आ भी जाए तब तक या तो राजनीतिक स्थितियां बदल जाती हैं या फिर देश, अपने खिलाफ आए फैसले को मानने से इनकार कर देते हैं।

जियो-पॉलिटिकल स्ट्रैटजी के सवाल पर प्रोफेसर एसडी मुनि ने नवभारत टाइम्स से कहा कि "भारत किसी भी हाल में शेख हसीना को नहीं सौंप सकता है। अगर भारत सौंपता है तो फिर बांग्लादेश से अवामी लीग का नामोनिशान ही मिट जाएगा। फिर वहां पर इस्लामिक ताकतें सत्ता में होंगी और चीन- पाकिस्तान पूरी तरह से वहां हावी हो जाएगा। भले ही बीएनपी को अमेरिका का समर्थन हासिल है, लेकिन अमेरिका कभी भी बांग्लादेश में एक बड़ी शक्ति नहीं बन सकता है। शेख हसीना को सौंपना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।"क्या भारत को बाध्य किया जा सकता है?
इस सवाल का जवाब है-- कानूनी तौर पर बिल्कुल नहीं। भारत के पास संधि के तहत भी और अपने घरेलू कानून के तहत भी पर्याप्त कारण उपलब्ध हैं जिनके आधार पर वह शेख हसीना का प्रत्यर्पण करने से साफ शब्दों में इनकार कर सकता है। ढाका भले ही प्रत्यर्पण की मांग करे, लेकिन इसे मानना या ना मानना पूरी तरह से भारत सरकार के विवेक पर निर्भर करेगा। इसीलिए ये मानकर चला जाए कि मोहम्मद यूनुस छटपटा कर रह जाएं, भारत किसी भी हाल में शेख हसीना को ढाका के हवाले नहीं करेगा।

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