राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू बोले- आपसी मसलों को सुलझाने के लिए हाई लेवल कमेटी बनाएंगे

Updated on 04-12-2023 02:07 PM

भारत सरकार ने मालदीव में मौजूद अपने 75 सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने COP28 क्लाइमेट समिट के दौरान भारतीय अधिकारियों की मौजूदगी में इस बात की जानकारी दी। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने फिलहाल इस पर कोई बयान नहीं दिया है।

चीन समर्थक माने जाने वाले राष्ट्रपति मुइज्जू ने कहा- भारत सरकार के साथ इस मुद्दे पर बातचीत हुई। भारत ने सैनिकों को वापस बुलाने पर सहमति जताई। हमने डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स से संबंधित मुद्दों को हल करने के लिए एक हाई लेवल कमेटी गठित करने पर भी सहमति जताई है।

मालदीव में क्या कर रहे हैं भारतीय सैनिक
भारत ने मालदीव को 2010 और 2013 में दो हेलिकॉप्टर और 2020 में एक छोटा विमान तोहफे के तौर पर दिया था। इस पर मालदीव में काफी हंगामा हुआ। मुइज्जू के नेतृत्व में विपक्ष ने तत्कालीन राष्ट्रपति सोलिह पर 'इंडिया फर्स्ट' नीति अपनाने का आरोप लगाया था।

भारत का कहना है कि उपहार में दिए गए विमान का इस्तेमाल खोज-बचाव अभियानों और मरीजों को लाने के लिए किया जाना था। मालदीव की सेना ने 2021 में बताया था कि इस विमान के संचालन और उसकी मरम्मत के लिए भारतीय सेना के 70 से ज्यादा जवान देश में मौजूद हैं।

इसके बाद मालदीव के विपक्षी दलों ने 'इंडिया आउट' अभियान शुरू कर दिया। उनकी मांग थी कि भारतीय सुरक्षा बल के जवान मालदीव छोड़ें।

COP28 में हुई मोदी- मुइज्जू की मुलाकात
UAE में चल रही COP28 क्लाइमेट समिट में शामिल होने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 नवंबर को दुबई पहुंचे थे। 1 दिसंबर को मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू से उनकी मुलाकात हुई थी। दोनों ने भारत-मालदीव के रिश्तों को मजबूत करने पर चर्चा की थी।

भारत और मालदीव की दोस्ती काफी पुरानी है। 1988 में राजीव गांधी ने सेना भेजकर मौमून अब्दुल गयूम की सरकार को बचाया था। 2004 में जब सुनामी आई तो भारत का ही पहला प्लेन मदद लेकर पहुंचा था। कोरोना महामारी के समय भारत ने मालदीव को कोविशील्ड वैक्सीन गिफ्ट के तौर पर दी थी।

क्या चीन के बढ़ते दखल की वजह से मालदीव ने भारतीय सैनिकों को निकालने का फैसला किया?
साल 2008 से पहले मालदीव में मौमून अब्दुल गयूम का शासन था। इस दौरान मालदीव संतुलनवादी नीति अपनाता था। यानी किसी भी देश का खुलकर समर्थन नहीं करता था, लेकिन 2008 में मोहम्मद नशीद मालदीव के राष्ट्रपति बने। इसके बाद से मालदीव ने भारत की ओर अपने झुकाव को सार्वजनिक किया। इस दौरान नशीद ने खुलकर चीन की आलोचना की।

वहीं 2013 में अब्दुल्ला यामीन सत्ता में आए। उन्होंने भी मुखर विदेश नीति की परंपरा अपनाई। हालांकि, उनका झुकाव चीन की ओर था। इस दौरान यामीन ने माले को हुलहुमाले द्वीप से जोड़ने वाले 2.1 किमी लंबे चार लेन वाले ब्रिज का उद्घाटन किया था।

यह एकमात्र ब्रिज है जो द्वीपसमूह में द्वीपों को जोड़ता है जहां लोग अलग-अलग एटोल के बीच नावों पर यात्रा करते हैं। बीजिंग ने इस प्रोजेक्ट के लिए 200 मिलियन डॉलर दिए। सालों तक चीन को इस छोटे देश में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यहां तक कि 2012 तक मालदीव में चीन का एक भी दूतावास नहीं था।

हालांकि, यामीन की सरकार के एक फैसले से सब कुछ बदल गया। यह फैसला फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA पर समझौते का था। इससे मालदीव से होने वाले मछली के निर्यात पर से शुल्क लगना बंद हो गया और द्वीपसमूह को चीनी वस्तुओं और सेवाओं के लिए खोल दिया गया।

चीन ने मालदीव में अन्य प्रोजेक्ट के अलावा ब्रिज और एक एयरपोर्ट बनाने के लिए एक अरब डॉलर से अधिक का कर्ज दिया। साल 2018 में फिर मालदीव की विदेश नीति भारत की ओर मुड़ गई। राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के सत्ता में आते ही भारत और मालदीव फिर पास आ गए।

सोलिह की सरकार ने यामीन पर देश को चीनी कर्ज के जाल में फंसाने का आरोप लगाया। 6.1 अरब GDP वाले मालदीव पर GDP का 113% कर्ज है। मालदीव सभी क्षेत्रों में भारत पर बहुत अधिक निर्भर है, चाहे वह बुनियादी ढांचे के विकास की बात हो या स्वास्थ्य और शिक्षा की, मालदीव भारत की मदद इन क्षेत्रों में लेता है।

वहीं एक्सपर्ट कहते हैं कि भारत का करीबी होने के साथ ही इब्राहिम मोहम्मद सोलिह सरकार किसी देश की विरोधी नहीं रही है। इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने कॉमनवेल्थ के साथ मालदीव के रिश्तों की फिर शुरुआत की। चीन के साथ बेहतर संबंध रखे और कई देशों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए।


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