F-35 का ऑफर ठुकराया, NATO सदस्यता को मारी लात... यूरोप के बाकी देशों की तरह अमेरिका का 'गुलाम' क्यों नहीं बना फ्रांस?

Updated on 23-09-2025 01:13 PM
पेरिस/वॉशिंगटन: यूरोप के ज्यादातर देश अमेरिका के पिट्ठू की तरह काम करते हैं। अमेरिका के आदेशों का अच्छे बच्चों की तरह पालन करते हैं। अमेरिका उठने को कहता है तो उठते हैं और बैठने कहता है तो बैठ जाते हैं। लेकिन फ्रांस, थोड़ा अलग है। क्योंकि अमेरिका और फ्रांस के बीच का रिश्ता हमेशा से जटिल रहा है। दोनों देश एक दूसरे को सहयोग भी करते हैं तो एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी रहते हैं। फ्रांस और अमेरिका, दोनों नाटो के सदस्य हैं, लेकिन फ्रांस, अमेरिका को अपनी विदेश नीति को कंट्रोल करने नहीं देता है। और इसी का सबसे बड़ा उदाहरण है एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट, जिसके ऑफर को फ्रांस से साफ शब्दों में इनकार कर दिया था और राफेल फाइटर जेट बनाकर अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब दिया था।

दरअसल, यूरोपीय देश अमेरिकी सुरक्षा की छत्रछाया में रहे हैं, लेकिन फ्रांस इसका उदाहरण है, जिसके लड़ाकू विमान से लेकर परमाणु बम तक स्वतंत्र है। ब्रिटेन को अपना परमाणु बम छूने से पहले भी वॉशिंगटन फोन करना होगा, लेकिन फ्रांस ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है। हालांकि, फ्रांस की विदेश नीति पहले से ही अमेरिकी दवाब से आजाद रही है, लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान फ्रांस ने कई ऐसे कदम उठाए, जिससे उसकी स्वतंत्रता और संप्रभुता बनी रहे। ये एक बड़ी वजह है कि फ्रांस ने अमेरिकी एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने से इनकार कर दिया।
अमेरिका से अलग फ्रांस की चाल
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यूरोपीय रक्षा स्वतंत्रता की वकालत शुरू कर दी थी और अमेरिकी हथियारों की जगह फ्रांसीसी राफेल को यूरोपीय विकल्प के रूप में पेश किया। हाल ही में उन्होंने बार बार यूरोप को फ्रांस की परमाणु छतरी के नीचे आने का ऑफर दिया है, जिसका मकसद यूरोप को अमेरिका के आसमान से बाहर निकालना है। दरअसल, फ्रांस का यह रुख नया नहीं है। 1966 में तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल ने फ्रांस को NATO की इंटीग्रेटेड सैन्य संरचना से बाहर निकाल लिया था। उनका मानना था कि NATO पर अमेरिकी हितों का बोलबाला है और इससे फ्रांस की संप्रभुता प्रभावित होती है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि फ्रांसीसी सेना, सिर्फ फ्रांस की सरकार के आदेशों का पालन करेगी, न कि किसी अमेरिकी सुप्रीम कमांडर का। इसी सोच ने फ्रांस को स्वतंत्र रक्षा नीति और अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह राष्ट्रीय नियंत्रण में रखने की दिशा में आगे बढ़ाया। हालांकि फ्रांस 2009 में फिर से राष्ट्रपति निकोलस सार्कोज़ी के कार्यकाल में NATO की सैन्य संरचना में शामिल हो गया, लेकिन राष्ट्रपति द गॉल का यह फैसला फ्रांस की डिफेंस की रीढ़ बन गया।
अमेरिकी फाइटर जेट को फ्रांस का इनकार
अमेरिका से फाइटर जेट नहीं खरीदने के पीछे कई वजहे हैं। पहली वजह है राष्ट्रीय गौरव- फ्रांस अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने और एक मजबूत घरेलू एयरोस्पेस उद्योग को बनाए रखने की वजह से अमेरिकी लड़ाकू विमान नहीं खरीदता है। वहीं, रणनीतिक लिहाज से फ्रांस अपनी रक्षा नीति में स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है। अमेरिकी जेट खरीदने से फ्रांस अमेरिकी सप्लाई चेन, मेंटिनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स और संभावित जियो-पॉलिटिकल प्रभाव से बंध जाएगा, उसे भी अमेरिका के इशारों पर काम करना होगा, जो वो करना नहीं चाहता।
दूसरा, आर्थिक पहलू। फ्रांस का घरेलू एयरोस्पेस उद्योग हजारों लोगों को रोजगार देता है और अरबों यूरो की कमाई करता है। यदि फ्रांस विदेशी फाइटर जेट खरीद लेता, तो उसका घरेलू उद्योग कमजोर हो जाएगा और निर्यात बाजार में फ्रांसीसी विमानों की साख घट जाएगी। तीसरा, तकनीकी नियंत्रण। अमेरिकी लड़ाकू विमानों पर कड़े निर्यात नियम और डेटा शेयरिंग नियंत्रण होते हैं। उदाहरण के लिए, F-35 का सॉफ्टवेयर और मरम्मत प्रणाली पूरी तरह अमेरिका की निगरानी में रहती है, जिससे खरीदार देश की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।

इसीलिए फ्रांस ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डसॉल्ट कंपनी में निवेश कर घरेलू विमानन उद्योग को लगातार डेवलप किया है। मिराज सीरीज की विमानों से लेकर उसने एडवांस राफेल फाइटर जेट बनाकर बार-बार साबित किया है कि वह विश्वस्तरीय जेट्स बना सकता है। 1980 के दशक में यूरोपीय साझेदारों के साथ मिलकर एक साझा लड़ाकू विमान बनाने की योजना बनी थी, लेकिन जब फ्रांस को अपने नौसेना के लिए कैरियर-सक्षम जेट की आवश्यकता महसूस हुई, तो उसने साझेदारी छोड़कर खुद राफेल विकसित करने का रास्ता चुन लिया। ऐसा ही उसने 1990 के दशक में भी किया था, जब उसने NATO देश अमेरिकी F-35 कार्यक्रम से दूरी बना ली थी। उसने तय किया कि वह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर होने की बजाय अपनी स्वदेशी क्षमता को आगे बढ़ाएगा।

फ्रांस बना रहा छठी पीढ़ी का फाइटर जेट
फ्रांस आज भी अपने इसी फॉर्मूले पर काम कर रहा है और अमेरिकी प्रभाव से अलग होकर छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का निर्माण करने के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) पर काम कर रहा है, जो छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने का प्रोडेक्ट है। हालांकि इस प्रोजेक्ट पर फ्रांस के जर्मनी के साथ मतभेद गहराते जा रहे हैं। डसॉल्ट एविएशन चाहता है कि इसका नेतृत्व पूरी तरह फ्रांस के हाथ में रहे, जबकि जर्मनी-स्पेन की तरफ से प्रोजेक्ट में शामिल एयरबस कंपनी, एक संतुलित साझेदारी की वकालत करती है। ऐसे में हो सकता है की आने वाले वक्त में फ्रांस खुद का छठी पीढ़ी का लड़ाकू निमान का अलग प्रोजेक्ट ही शुरू कर दे।


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